पाठालोचन

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साहित्यिक क्षेत्र में, पाठालोचन (= पाठ+आलोचन, टेक्सचुअल क्रिटिसिज़म) इस बात का वैज्ञानिक अनुसन्धान या विवेचन करता है कि किसी साहित्यिक कृति के संदिग्ध अंश का मूलपाठ वास्तव में कैसा और क्या रहा होगा। अर्थात किसी ग्रंथ के मूल और वास्तविक पाठ का ऐसा निर्धारण जो पूरा छान-बीन करके किया जाय। इस प्रकार का पाठालोचन मुख्यतः प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थों की अनेक प्रतिलिपियों के मामले में किया जाता है अथवा ऐसी साहित्यिक कृतियों के सम्बन्ध में होता है जिनका प्रकाशन तथा मुद्रण स्वयं लेखक की देख-रेख में न हुआ हो। ग्रन्थों की भूमिकाओं में पाठ तय करने के लिए प्रयुक्त साधनों, सामग्रियों, सिद्धान्तों एवं विधियों आदि का विवरण दिया जाता है।

श्युडो-अपुलिअस हर्बेरिअस (Pseudo-Apuleius Herbarius) की पाण्डुलिपियों की वंशानुगति का चित्रात्मक निरूपण (हेनरी ई. सिजरिस्त द्वारा १९२७ में पाठालोचन)

पाठालोचन की समस्या उन्हीं कृतियों को लेकर होती है, जिनके लेखकों ने अपने सामने कृति का प्रकाशन नहीं करा पाया है। ऐसी कृतियां, जिनका प्रकाशन लेखक या कवि के उत्तरवर्तियों द्वारा कराया गया है, उनमें पाठ का अन्तर हो जाता है। सबसे अधिक समस्या प्राचीन कृतियों को लेकर है। संस्कृत ही नहीं सभी साहित्यिक भाषाओं की बहुत सी कृतियां पाठालोचन की समस्या से अंतर्ग्रस्त हैं। मनुस्मृति के बहुत से पाठ मिलते हैं। हिन्दी साहित्य की आदिकालीन और मध्यकालीन साहित्यकारों की कृतियां पाठालोचन की परिधि में आती हैं। रामचरितमानस के भी अनेकों पाठ मिलते हैं। पाठभेद व मानस व्याकरण सहित श्री रामचरितमानस के निवेदन में हनुमानप्रसाद पोद्दार ने लिखा है ‘जितने पाठभेद इस ग्रंथ के मिलते हैं, उतने कदाचित् किसी प्राचीन ग्रंथ के नहीं मिलते। इससे इसकी सर्वोपरि लोकप्रियता सिद्ध होती है।’

पाठालोचन के दो स्तर हैं। पहले स्तर पर त्रुटियों का पता लगाया जाता है, जबकि दूसरे स्तर पर समानता के आधार पर मूल पाठ का निर्धारण किया जाता है। शोध प्रमाण पर आधारित होता है, इसलिए पाठालोचन शोध प्रविधि का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पाठालोचन तथा साहित्यालोचन (लिटरेरी क्रिटिसिज्म) एक ही नहीं हैं। डॉ कन्हैया सिंह ने 2008 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘पाठ सम्पादन के सिद्धान्त’ [1]में लिखा है पाठालोचक जहां प्राचीन लेखकों एवं कवियों के मूल पाठ के निर्धारण मात्र का प्रयास करते हैं, वहीं साहित्यालोचक उस निर्धारित पाठ के आधार पर उस लेखक या कवि का मूल्यांकन करते हैं तथा उसकी विशेषताओं, उसके गुणों एवं दोषों का उद्घाटन करते हैं। इस प्रकार जहां पाठालोचन का कार्य समाप्त होता है, वहां से साहित्यालोचन का कार्य प्रारम्भ होता है। पाठालोचन के पूर्व साहित्यालोचन का कार्य उस विशेष कवि या लेखक के सन्दर्भ में असम्भव होता है। जब तक कवि या लेखक की रचनाओं का मूल पाठ निर्धारित नहीं हो जाता, तब तक उसकी कृति के सम्बन्ध में किस आधार पर मत व्यक्त किया जा सकता है।

डॉ सत्यकेतु सांकृत ने कहा है कि मूल पाठ से प्रतिलिपि करने पर लगभग तीन प्रतिशत तक अशुद्धि रहने की संभावना रहती है। इस प्रकार जब प्रतिलिपियों से प्रतिलिपियां तैयार की जाती हैं तो अशुद्धियों के बढ़ते रहने की संभावना बनी रहती है। वरिष्ठ आलोचक नलिन विलोचन शर्मा ने इसे तात्विक शोध की संज्ञा दी है।

१९४२ से डॉ. माताप्रसाद गुप्त ने पश्चिमी देशों की वैज्ञानिक पद्धति से पाठालोचन का कार्य शुरू किया और अनेक विद्वानों ने इसे अपनाया भी।

पाठभेद[संपादित करें]

वर्तमान में तकनीकी के आविष्कार और उसके क्रमशः विकास के बाद थोड़े समय में ही अल्प श्रम में भाषा लिपिबद्ध होने लगी है। कभी कृतिकारों ने अपने हाथ से अपना ग्रन्थ लिखा और कभी बोलकर लिखवाया। प्रतिलिपि निर्माण के क्रम में प्रमादवश भूलें होती रहीं जो स्वाभाविक भी है। अगले प्रतिलिपिकार ने पिछली भूल को यथावत अपनी प्रति में जोड़ दिया। कभी-कभी जानबूझकर प्रति में प्रक्षेप हुए। मूल प्रति जब नष्ट हो गई हों और उसकी निकटवर्ती प्रतिलिपियां भी अनुपलब्ध हो गईं हों तो प्राप्त प्रतियों के पाठों में इतना वैषम्य और विरोध मिलता है कि रचनाकार के मूलपाठ की कल्पना भी दूभर हो जाती है।

इतिहास[संपादित करें]

पाठालोचन का कार्य कम से कम दो हजार वर्ष से किया जा रहा है। पाठालोचन के प्रयास सभी भाषाओं में हुए और इस क्षेत्र में हुए अनुसन्धानों के परिणामस्वरूप इस विधा ने ने एक शास्त्र का रूप धारण कर लिया। आधुनिक काल में अंग्रेजी भाषा के अनुभव से यह शास्त्र १८वीं-१९वीं शताब्दी में विकसित हुआ। विशेषतः चॉसर, स्पेन्सर और शेक्सपीयर की कृतियों का पाठ-सम्पादन हुआ। चॉसर की कृतियों पर चिरहिट नामक विद्वान का कार्य बहुत महत्वपूर्ण है।[2]

पद्धतियाँ[संपादित करें]

लकमैन (Lachmann) ने पाठालोचन की जिस पद्धति को प्रचलित किया, उसे वंशानुक्रम पद्धति (जेनियोलॉजिकल मेथड) कहा जाता है। इस प्रणाली ने बड़ी लोकप्रियता प्राप्त की। इस पद्धति का सिद्धान्त है कि जिन प्रतियों में एक सी पाठ विकृतियां मिलती हैं, उनकी आदर्श या पूर्वज प्रति एक ही होती है और जहां समान पाठ-विकृतियां न भी मिलें, पर विशेष पाठों की उपलब्धि में प्रतियां समान हों, उनकी पूर्वज प्रति भी एक होती है। जहां विशेष पाठ भी न हां और प्रतियां समान पाठों में ही समान हों, उनकी एक पूर्वज प्रति होती है।

हेनरी क्विण्टन ने इस प्रणाली को आगे बढ़ाया। इन्होंने प्रतियों के शाखा निर्धारण हेतु सिद्धान्त दिया कि यदि एक प्रति का पाठ दूसरी से मिलता है, फिर वही पाठ तीसरी प्रति से मिलता है और कुछ अंश तक वह दोनों से मिलता है। परन्तु विपरीत क्रम में वह फलशून्य या अर्द्धशून्य मिलता है तो प्रथम प्रति या तो द्वितीय और तृतीय दोनों की आदर्श प्रति है और ये दोनों एक दूसरे में से किसी की आदर्श प्रतियां नहीं हैं, अथवा प्रथम प्रति द्वितीय एवं तृतीय में से एक की प्रतिलिपि और दूसरी की आदर्श प्रति होगी।

आगे चलकर सर वाल्टर ग्रेग ने बताया कि एक प्रकार की प्रतियां जो परस्पर समान हैं, पर दूसरे प्रकार की परस्पर समान प्रतियों से भिन्न हैं, उनके अलग-अलग समान पूर्वज होते हैं। अतः पाठों की समानता से पूर्वज प्रतियों के सुनिश्चित हो जाने की कोई नपी-तुली प्रविधि नहीं है।

आर्किबैल्ड हिल ने प्रतिपादित किया कि जहां प्रतियों के पाठ संबंध एकाधिक प्रकार से स्थापित हो सकते हैं, वहां उन संबंधों के महत्व को आकलित करने से पाठ समस्या सरल हो जाती है।

अमरीकी प्रोफेसर विण्टन ए. डीयरिंग (Vinton A Dearing) ने अपनी प्रविधि को उपर्युक्त सभी प्रविधियों से विशिष्ट बताते हुए उसे ‘पाठ विश्लेषण’ कहा है। उन्होंने ‘प्रति’ और ‘पाठ’ के अन्तर को ध्यान में रखते हुए प्रति-परंपरा और पाठ-परम्परा को दो वस्तुएं प्रतिपादित किया। प्रोफेसर डीयरिंग की यह प्रविधि वैज्ञानिकता के समीप है।[3]

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]