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पश्चाताप

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विलियम-एडोल्फ बोगुएरो द्वारा रचित "ओरेस्टेस का पश्चाताप" (1862)

पश्चाताप एक ऐसी कष्टदायक भावना है जो तब होती है जब व्यक्ति अपने अतीत के किसी काम या गलती पर शर्म, दुख या पछतावा महसूस करता है।[1] यह भावना अपराधबोध और अपने ऊपर गुस्सा आने से जुड़ी होती है। जब किसी को लगता है कि उसने गलत काम किया है या सही काम नहीं किया, तो वह अपने व्यवहार पर पछताता है। कभी-कभी यह पछतावा सज़ा मिलने के डर या उसके परिणामों को देखकर भी होता है। लोग अपने पश्चाताप को माफी मांगकर, नुकसान की भरपाई करके या खुद को दंड देकर व्यक्त कर सकते हैं।

कानूनी मामलों में भी पश्चाताप को महत्व दिया जाता है। अदालतें मुकदमे, सजा, पैरोल या सुधारात्मक न्याय की प्रक्रिया के दौरान यह देखने की कोशिश करती हैं कि अपराधी को अपने किए पर सच में पछतावा है या नहीं। हालाँकि, अपराधी के पश्चाताप के स्तर का आकलन करने में ज्ञानमीमांसा संबंधी समस्याएँ हैं। लेकिन किसी के मन की सच्ची भावना को पूरी तरह समझ पाना आसान नहीं होता।[2]

मनोविज्ञान के अनुसार, जिन व्यक्तियों में मनोविकार (साइकोपैथी) के लक्षण होते हैं, उनमें अक्सर डर और पश्चाताप की भावना कम या बिल्कुल नहीं होती। वहीं बीमा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भी माफी और पश्चाताप की अभिव्यक्ति का अध्ययन किया गया है, क्योंकि इससे कानूनी मामलों और आर्थिक परिणामों पर असर पड़ सकता है।

माफी मांगने पर किए गए अध्ययन

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क्षमा मांगने पर कई शोध किए गए हैं। उदाहरण के लिए, द फाइव लैंग्वेजेस ऑफ अपोलॉजी जिसे गैरी चैपमैन और जेनिफर थॉमस ने लिखा है,[3] तथा ऑन अपोलॉजी जिसे आरोन लाज़ारे ने लिखा है।[4] इन अध्ययनों के अनुसार, एक प्रभावी क्षमा याचना में कुछ महत्वपूर्ण बातें शामिल होती हैं।

सबसे पहले, व्यक्ति को अपनी गलती साफ-साफ बतानी चाहिए। उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि उसके कारण किसी को चोट या नुकसान पहुँचा है। साथ ही, उसे अपने काम या लापरवाही की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए और अपनी भूमिका को स्पष्ट रूप से मानना चाहिए।

इसके अलावा, सच्ची माफी में खेद और पश्चाताप की भावना झलकनी चाहिए, क्षमा की विनती होनी चाहिए और भविष्य में गलती न दोहराने का पक्का वादा भी शामिल होना चाहिए। यदि संभव हो तो नुकसान की भरपाई या किसी प्रकार का मुआवजा भी देना चाहिए।

जॉन क्लीफल्ड (अक्सर “चार आर” के रूप में समझाया गया) के अनुसार एक अच्छी माफी में चार बातें जरूरी हैं— अफ़सोस, जिम्मेदारी, सुधार का संकल्प और क्षतिपूर्ति।[5] यदि माफी मांगने में बहुत देर की जाती है, तो सामने वाले के मन में चोट और भी गहरी हो सकती है। इसे कभी-कभी बढ़ा हुआ या संवर्धित पश्चाताप भी कहा जाता है।

आधुनिक समय में “क्षमा” या “पश्चाताप” शब्द का उपयोग अक्सर हल्की अंतरात्मा की चुभन या अंदरूनी ग्लानि के अर्थ में किया जाता है।[6] लेकिन पहले इसका अर्थ अधिक गहरा और सक्रिय होता था।[7] पुराने समय में पश्चाताप का मतलब केवल मन ही मन दुखी होना नहीं था, बल्कि अपनी गलती स्वीकार करने के लिए उस व्यक्ति के पास स्वयं जाकर खेद प्रकट करना भी शामिल था।

मध्ययुगीन काल में यह भावना लोगों को स्वीकारोक्ति या प्रायश्चित जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने के लिए प्रेरित करती थी। विशेष रूप से कैथोलिक चर्च में इसे आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक सुधार का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता था।[8]

2024 में पोप फ़्रांसिस ने चर्च को लिखे एक धार्मिक पत्र में “सच्चे” पश्चाताप की व्याख्या करते हुए कहा कि:

पश्चाताप केवल अपराधबोध नहीं है जो व्यक्ति को निराश या हीन भावना से भर दे। बल्कि यह एक लाभकारी और भीतर तक झकझोर देने वाला अनुभव है, जो हृदय को शुद्ध करता है और उसे स्वस्थ बनाता है।[9]

झूठे भाव

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ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर लीन टेन ब्रिंक के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में यह जांच की गई कि लोग जब सच में पश्चाताप करते हैं और जब केवल दिखावा करते हैं, तो उनके व्यवहार और चेहरे के हाव-भाव में क्या अंतर होता है।

शोध में पाया गया कि असली और बनावटी पश्चाताप के चेहरे के भाव अलग होते हैं। जब लोग झूठा पश्चाताप दिखाते हैं, तो उनके चेहरे पर भावनाएँ कुछ ज़्यादा ही दिखाई देती हैं और उनमें खुशी या आश्चर्य जैसी सकारात्मक भावनाएँ भी झलक सकती हैं।[10] ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि वे दुखी दिखने की कोशिश करते समय अपनी असली भावनाओं को पूरी तरह छिपा नहीं पाते। उदाहरण के लिए, कुछ प्रतिभागी दुखी दिखने के लिए केवल अपनी भौहें उठाते थे, जिससे वे आश्चर्यचकित या हल्के से मुस्कुराते हुए दिखाई देते थे।[10]

इसके विपरीत, सच्चे पश्चाताप में भावनाएँ कम और नियंत्रित रूप में दिखती हैं। असली नकारात्मक भाव चेहरे के निचले हिस्से में दिखाई देते हैं, लेकिन जल्दी ही सामान्य भाव में बदल जाते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि झूठा पश्चाताप दिखाने वाले लोगों की बातचीत में हिचकिचाहट और असंगतियाँ अधिक थीं, जो उनके कथन की असत्यता का संकेत देती थीं।[10]

इन निष्कर्षों का उपयोग अदालतों में किया जा सकता है। न्यायाधीश, जूरी सदस्य, पैरोल अधिकारी और मनोवैज्ञानिक इन संकेतों की मदद से यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि किसी अपराधी का पश्चाताप सच्चा है या केवल दिखावा।

सन्दर्भ

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  1. remorse, कैम्ब्रिज डिक्शनरी
  2. ओ'हियर, माइकल एम (1996–1997), Remorse, Cooperation, and Acceptance of Responsibility: The Structure, Implementation, and Reform of Section 3E1.1 of the Federal Sentencing Guidelines, vol. 91, एनडब्ल्यू. यूएल रेव, p. 1507, 2013-12-18 को मूल से पुरालेखित
  3. गैरी चैपमैन, जेनिफर थॉमस (2006). क्षमा याचना की पाँच भाषाएँ. मूडी. ISBN 1-881273-57-1. गैरी चैपमैन (2007) द्वारा लिखित "नाउ यू आर स्पीकिंग माई लैंग्वेज: ऑनेस्ट कम्युनिकेशन एंड डीपर इंटिमेसी फॉर ए स्ट्रॉन्गर मैरिज " (बी एंड एच.एस.आई.एन.एस. ) भी देखें। ISBN 978-0-8054-4460-5.
  4. आरोन लाज़ारे (2004). क्षमा याचना पर. न्यूयॉर्क: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस. ISBN 978-0-1951-7343-7.
  5. जॉन क्लीफल्ड (2007). "एक इंसान की तरह सोचना: ब्रिटिश कोलंबिया का माफी अधिनियम " ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय विधि समीक्षा 40 (2): 769–808, 790. http://ssrn.com/abstract=1937545.
  6. प्रोएव, माइकल; ट्यूडर, स्टीवन (8 अप्रैल 2016) [2010]. "पश्चाताप का विश्लेषण: एक दार्शनिक दृष्टिकोण: पश्चाताप और उसके निकटवर्ती रूपों को परिभाषित करना". Remorse: Psychological and Jurisprudential Perspectives (reprint ed.). एबिंगडन: रूटलेज. p. 34. ISBN 9781317066644. अभिगमन तिथि: 19 अगस्त 2024. [...] 'compunction' seems to mean much the same thing as 'remorse,' but can be distinguished from it in two ways. First, 'compunction' can be used to refer to milder cases of remorseful feelings. Second, it can be used to refer to a kind of pre-emptive or anticipatory bad conscience which arises before one does wrong and which can thereby (help to) prevent that wrongdoing. [...] Compunction can thus be seen as both retrospective and prospective, whereas in the normal case, remorse seems to be essentially a retrospective emotion.
  7. विलियम्स, ग्राहम; स्टीनब्रुगे, शार्लोट (15 अक्टूबर 2020). "परिचय: अंग्रेजी में शब्द". In विलियम्स, ग्राहम; स्टीनब्रुगे, शार्लोट (eds.). Cultures of Compunction in the Medieval World. मध्यकालीन अध्ययन में नई दिशाएँ।. लंदन: ब्लूम्सबरी पब्लिशिंग. p. 12. ISBN 9781350150379. अभिगमन तिथि: 19 अगस्त 2024. In Middle English on the other hand, compunction and contrition are almost always used in a positive context, especially to exemplify ideals of Christian emotional culture, frequently in combination with the outward sign of tears.
  8. आर्चेम्बो, निकोल (15 अप्रैल 2021). "मास्टर डूरंड एंड्री और प्रायश्चित का संस्कार खतरे के क्षण के रूप में: स्वीकारोक्ति की प्रेरणा". Souls under Siege: Stories of War, Plague, and Confession in Fourteenth-Century Provence. इथाका: कॉर्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस. ISBN 9781501753671. अभिगमन तिथि: 19 अगस्त 2024. What is clear in Master Durand's testimony, and in much of the penitential literature, is that the sacrament of penance started before priest and penitent met. The internal state of the penitent before confession mattered, and ideally a penitent should feel compunction. Compunction was not a gentle emotion. Theologians described it as 'a puncture provoked by the thorns of sins; it was like the spur in the flank of the ox or horse in order to drive it free of the mud.' [...] The noble ladies who had gathered to pray, 'having been pierced on the inside, wished to confess immediately, without any delay, and they made confession of their sins.'
  9. पोप फ्रांसिस, Dilexit nos, पैराग्राफ 159, published on 24 अक्टूबर 2024, accessed on 3 मार्च 2025
  10. 1 2 3 ब्रिंक,;,; ।, एल; मैकडोनाल्ड, एस; et al. (2012), "Crocodile tears: Facial, Verbal and Body Language Behaviours Associated With Genuine and Fabricated Remorse", कानून और मानव व्यवहार, 36 (1): 51–59, डीओआई:10.1037/h0093950, पीएमआईडी 22471385, एस2सीआईडी 15232035{{citation}}: CS1 maint: multiple names: authors list (link)

बाहरी कड़ियाँ

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