परहितवाद

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
(पर्यायवाद से अनुप्रेषित)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
गरीबों को दान देना एक परहितवादी क्रिया मानी जाती हैं

परहितवाद या निःस्वार्थता, जिसे परोपकारिता या आत्मोत्सर्ग भी कहते हैं, दूसरों की भलाई हेतु चिन्ता का सिद्धान्त या प्रथा हैं। यह कई संस्कृतियों में एक पारम्पारिक गुण हैं और विभिन्न धार्मिक परम्पराओं और धर्मनिरपेक्ष विश्वदृष्टियों का मूल पहलू हैं; हालांकि "दूसरें" जिनके प्रति चिन्ता निर्देशित होनी चाहियें, यह संकल्पना अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों में भिन्न-भिन्न हैं। परहितवाद या निःस्वार्थता स्वार्थता के विपरीत हैं।

परोपकार[संपादित करें]

राजा रवि वर्मा कृत "चैरिटी" (Charity)

परोपकार का अर्थ है दूसरों की भलाई करना। कोई व्यक्ति जीविकोपार्जन के लिए विभिन्न उद्यम करते हुए यदि दूसरे व्यक्तियों और जीवधारियों की भलाई के लिए कुछ प्रयत्‍‌न करता है तो ऐसे प्रयत्‍‌न परोपकार की श्रेणी में आते है। परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है। मन, वचन और कर्म से परोपकार की भावना से कार्य करने वाले व्यक्ति संत की श्रेणी में आते है। ऐसे सत्पुरुष जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों पर उपकार करते है वे देवकोटि के अंतर्गत कहे जा सकते है। परोपकार ऐसा कृत्य है जिसके द्वारा शत्रु भी मित्र बन जाता है। यदि शत्रु पर विपत्ति के समय उपकार किया जाए तो वह भी उपकृत होकर सच्चा मित्र बन जाता है। भौतिक जगत का प्रत्येक पदार्थ ही नहीं, बल्कि पशु पक्षी भी मनुष्य के उपकार में सदैव लगे रहते है। यही नहीं सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, फल, फूल आदि मानव कल्याण में लगे रहते है। इनसे मानव को न केवल दूसरे मनुष्यों बल्कि पशु-पक्षियों के प्रति भी उपकार करने की प्रेरणा मिलती है। असहाय लोगों, रोगियों और विकलांगों की सेवा परोपकार के अंतर्गत आने वाले मुख्य कार्य है।

सच्चा परोपकारी वही व्यक्ति है जो प्रतिफल की भावना न रखते हुए परोपकार करता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि शुभ कर्म करने वालों का न यहां, न परलोक में विनाश होता है। शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है। चाणक्य के अनुसार जिन सज्जनों के हृदय में परोपकार की भावना जागृत रहती है, उनकी आपत्तियां दूर हो जाती है और पग-पग पर उन्हे संपत्ति और यश की प्राप्त होती है। तुलसीदास ने परोपकार के विषय में लिखा है -

परहित सरिस धरम नहिं भाई।

परपीड़ा सम नहिं अधमाई॥

दूसरे शब्दों में, परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है। विज्ञान ने आज इतनी उन्नति कर ली है कि मरने के बाद भी हमारी नेत्र ज्योति और अन्य कई अंग किसी अन्य व्यक्ति के जीवन को बचाने का काम कर सकते है। इनका जीवन रहते ही दान कर देना महान उपकार है। परोपकार के द्वारा ईश्वर की समीपता प्राप्त होती है। इस प्रकार यह ईश्वर प्राप्ति का एक सोपान भी है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]