पराप्राकृतिक विश्वास का वैज्ञानिक अध्ययन

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
विज्ञान और धर्म में समरसता दिखाती आस्ट्रिया के चित्रकार पॉल ट्रौगेर की कलाकृति

पराप्राकृतिक विश्वास का वैज्ञानिक अध्ययन मानव जीवन और धर्म के मधुर सम्बंधों पर नयी खोजों का संक्षेप में परिचय है।[1][2][3] वैज्ञानिकों का मानना है कि पराप्राकृतिक विश्वास का लोगों के जीवन में लम्बे समय से महत्त्व रहा है, [4][5] शामन या ओझा के पुनःनिर्मित इतिहास के आधार पर यह अवधि ६५००० वर्ष होगी। [6] सभ्यता के विकास के साथ-साथ पराप्राकृतिक विश्वास ने धर्म का रूप लिया, और साहित्य, कला तथा समाज को प्रभावित किया।[7] अनुमान है कि पूरे विश्व में लगभग १०००० धर्म हैं, और प्रत्येक धर्म में अनेकों अलौकिक तत्व (देव और असुर)।[8] वैज्ञानिकों की सोच है कि, अधिकतर देवी-देवता छोटे-छोटे समुदायों (गाँव) तक सीमित हैं, परन्तु कुछ देवता लगभग १२००० वर्ष पहले से बड़े धर्मों में विकसित होना शुरू हुए होंगे और विश्व में फ़ैल गए।[9]

पिछले कुछ दशकों में, पराप्राकृतिक विश्वास[10] के जैविक और सांस्कृतिक उद्विकास [11] पर नई खोजों में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि उनका आशय किसी अलौकिक तत्व की भौतिक सत्ता से नहीं था, उन्होंने पाया कि देवी-देवताओं में विश्वास समूह के सदस्यों में सहयोग, मानसिक स्वास्थ्य तथा स्नेह की भावना के विकास में सहायक है।[12][13]

साहित्य[14] और कला[15] में हुई खोज से पता चलता है कि इनके अन्दर भी पराप्राकृतिक विश्वास की गहरी पैठ है, और अलौकिक तत्वों का अनोखा समावेश है, जैसे, रसल की चायदानी, उड़न तश्तरी, स्पाइडर-मैन, आदि।


देवी-देवताओं में विश्वास पर हुए इन अध्ययनों के चार मुख्य पहलू ग्रामीण परिवेश, मानसिक स्वास्थ्य, सहयोग, और स्नेह की भावना हैं।

ग्रामीण परिवेश[संपादित करें]

शिमला जिले की जुब्बल तहसील में देवता बनाड़ के जागरे में रात्रि पूजा

पराप्राकृतिक विश्वास से जुड़े अनगिनत लेख इस पहलू में आते हैं और स्थानीय समूहों की जीवन शैली के परिचायक हैं। ऐसे परिचय विश्व[16], तथा क्षेत्रीय, जैसे पश्चिम हिमालय [17], स्तर पर, विस्तृत रूप में उपलब्ध हैं। इन में एक ग्रामीण देवता में अलौकिक, न्यायविद, चिकित्सक, महावीर, भविष्यवक्ता, आदि गुण बताये गए हैं। इनका विस्तृत वर्णन भी है, जैसे भारत में, हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के लोक देवता, और उनसे सम्बंधित, गीत, कथाएं, लोकोक्तियां, नाट्य, भाषा, तथा परम्पराएं, और इनके अभिप्राय।[18] एक अन्य प्रयास में, किन्नौर के देवी-देवता वहां की मुख्य जीवन शैली, अरण्यक भेड़-बकरी पालन के प्रमुख अंग हैं।[19] इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए, एक इतिहासकार की राय है कि स्थानीय विकास के कार्यक्रमों में, लोक चेतना की निर्णय लेने में भूमिका हो[20]

मानसिक स्वास्थ्य[संपादित करें]

ओझा या शामन द्वारा बीमार का इलाज, दक्षिण अमेरिका

दूसरे पहलू के अन्तरगत वह अध्ययन हैं जिनमें पराप्राकृतिक विश्वास, अलौकिक तत्वों की विविधता, तथा इनमें होने वाले बदलाव को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़कर देखा गया। अशिस नंदी के लेख में भारत के तैंतीस करोड़ देवी-देवता जो छोटे-छोटे समूहों की जीवन शैलियों के प्रतिबिंब हैं, जिनमें इस बदलाव के साक्ष्य इन देवी-देवताओं के बाहरी प्रतीकों और परम्पराओं, तथा जन मानस की गहराई में देखे गए।[21] एक अन्य सन्दर्भ लेकर, सुधीर ककड़ झाड़-फूंक में लगे ओझाओं तथा मुक्ति का सन्देश देते अध्यात्म गुरूओं को खोज की परीधि में लाकर, भारत जैसे देश में, अलौकिक तत्वों की मानसिक स्वास्थ्य में भूमिका ही तय नहीं की, इनका मनोविश्लेषण की विचारधारा के अनुरूप सटीक अध्ययन भी किया।[22] मन की अन्य विचारधाराओं, मनोचिकित्सा [23] तथा नृविज्ञान [24], में हुए अध्ययन मानसिक स्वास्थ्य में अलौकिक तत्वों की सकारात्मक भूमिका के पक्षधर हैं।[25][26][27]

सहयोग[संपादित करें]

जटिल और मंहगा अनुश्ठान, एक कवाड़ी भक्त

तीसरा पहलू पराप्राकृतिक विश्वास तथा स्थानीय परम्पराओं पर सामाजिक जीव-विज्ञान तथा उद्विकास मनोविज्ञान में हुई खोजों के परिपेक्ष में है। माधव गाडगिल और उनके साथियों द्वारा देव वन की प्रथा और इसका जैविक सम्पदा के संरक्षण में योगदान का अध्ययन, जैविक और सांस्कृतिक, दोनों पक्षों को जोड़ता है।[28][29] अलौकिक तत्वों से जुड़े जटिल और महंगे अनुष्ठान वैज्ञानिक खोजों में सहयोग के उद्विकास में उपयोगी पाए गए।[30] जाईगलातास और उसके साथियों ने, हिन्दुओं के थैपुसम त्यौहार में जटिल और मंहगे अनुश्ठान करने वाले कवाड़ी के भक्तों की तुलना साधारण भक्तों से की, कवाड़ियों में सहयोग की भावना ज्यादा थी।[31] इनका विकास समूह चयन द्वारा संभव है, एक व्यक्ति नहीं, पूरा समूह (जिसमें ऐसे अनुष्ठानों की परम्परा है) फैलेगा या विलुप्त होगा।।[32][33] दुनिया में लोगों के छोटे-छोटे समूह, जिनमें देवता की छवि व्यक्ति के मन में सर्वोच्च ज्ञानवान, दंड देने वाले, तथा मर्यदारक्षक के रूप में है, आपसी सहयोग में सहायक है[34]। संक्षेप में, इन खोजों का मुख्य बिन्दु, पराप्राकृतिक विश्वास और समाज में आपसी मेल-जोल है।

स्नेह की भावना[संपादित करें]

गोकुलवासियों को आसरा देते श्रीकृष्ण, हिन्दुओं के प्रिय देवता

चौथा पहलू उन अध्ययनों पर केन्द्रित है जिनमें पराप्राकृतिक विश्वास और लोगों में आपसी स्नेह पर खोज हुई। मनोविज्ञान और इससे जुड़े दूसरे विषयों के संयुक्त प्रयास से, मन तथा व्यवहार पर देव आस्था का प्रभाव जानने के लिए ये नए प्रयोग हुए।[35] इन मैंसे बहुत सी खोजों का मुख्य आधार, जॉन बाल्बी के स्नेह के सिद्धान्त[36] को अलौकिक तत्वों के प्रति आस्था से जोड़ना है।[37] स्नेह सिद्धान्त के चार संज्ञानात्मक या आतंरिक प्रारूप हैं, बच्चे का माँ, या भक्त का देवता, से निकट संबंध, इससे बिछुड़ने पर विरह वेदना, इसके सहारे परिसर की खोज, तथा, बाहरी भय से इसमें आसरा लेना।[38][39] इन आतंरिक प्रारूपों को, मनोवैज्ञानिकों ने भक्त का उसके अराध्य देवता से प्रेम समझने के लिए, प्रयोगों का आधार बनाया, जिसके सकारात्मक परिणाम मिले।[40]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Ramachandran, V.S. (2010). The tell-tale brain. Unlocking the mystery of human nature. Noida, UP: Random House India.
  2. Wilson, E.O. (2012). The social conquest of earth. New York: Liveright Publishing Corporation.
  3. Norenzayan, A. (2013). Big gods: How religion transformed cooperation and conflict. Princeton, New Jersey: Princeton University Press.
  4. Bering, J.M. (2011). "The folk psychology of souls". Behavioral and Brain Sciences (29): 453–498.
  5. Bloom, P. (2012). "Religion, morality, evolution". Annual Review of Psychology (63): 179–199.
  6. Witzel, M. E.J. (2011). "Shamanism in northern and southern Eurasia: Their distinctive methods of change of consciousness". Social Science Information (50(1)): 39–61.
  7. Kandel, E.R. (2012). The age of insight: The quest to understand the unconscious in art, mind, and brain, from Vienna 1900 to the present. New York: Random House.
  8. Epley, N.; Waytz, A.; Cacioppo, J.T. (2007). "On seeing human: a three-factor theory of anthropomorphism". Psychological Review (114): 864–886.
  9. Norenzayan, A.; एवं अन्य (2016). "The cultural evolution of prosocial religions". Behavioral and Brain Sciences. पाठ " doi:10.1017/S0140525X14001356, e0" की उपेक्षा की गयी (मदद)
  10. Sperry, R.W. (1992). "Paradigms of belief, theory and metatheory". Zygon (27(3)): 245–259.
  11. Haidt, J. (2007). "The new synthesis in moral psychology". Science (316): 998–1002.
  12. Norenzayan, A.; Shariff, A.F. (2008). "The origin and evolution of religious prosociality". Science (322): 58–62.
  13. Bering, J.M. (2006). "The cognitive psychology of belief in the supernatural". American Scientist (94): 142–149.
  14. Narayan, K. (1997). Mondays on the Dark night of the moon: Himalayan foothill folktales. New York: Oxford University Press.
  15. Goswamy, B.N. (2014). The spirit of Indian painting. Close encounters with 101 great works 110-1900. Gurgaon, Haryana, India: Penguin Books India/Allen Lane.
  16. Frazer, J. G. (1926). The worship of nature. Volume 1. London: Macmillan.
  17. Rose, H. A. (1919/1999). A glossary of the tribes and castes of the Punjab and North-West Frontier Province. Volume 1-3. Delhi: Low Price Publication. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  18. शर्मा, बं.रा. (१९७६). किन्नर लोक साहित्य. बिलासपुर, हि. प्र.: ललित प्रकाशन.
  19. नेगी, वि. (२००७). पश्चिमोत्तर हिमालय के आरण्यक-भेड़पलक: किन्नौर के सम्बन्ध में (सामाजिक सांस्कृतिक अध्ययन). सारनाथ, वाराणसी: केंद्रीय उच्च तिब्बति शिक्षा संस्थान.
  20. Singh, C. (2006). "Long-term dynamics of geography, religion, and politics. A case study of Kumharsain in the Himachal Pradesh". Mountain Research and Development (26): 328–335.
  21. Nandy, A. (1997). "Facing extermination: A report on the present state of the gods and goddesses in South Asia". Manushi (99): 5–19.
  22. Kakar, S. (1982). Shamans, mystics and doctors. Delhi: Oxford University Press.
  23. Kapur, R. L. (2007). "Mental health care in rural India: A study of existing patterns and their implications for future policy". British Journal of Psychiatry (127): 286–293.
  24. Sax, W.S. (2009). God of justice. Ritual healing and social justice in the central Himalayas. New Delhi: Oxford University Press.
  25. Kapur, M. (2001). Mental health, illness and therapy. In J. Pandey (Ed.), Psychology in India revisited. Developments in the discipline. Volume 2. Personality and health psychology (pp. 412- 472). New Delhi: Sage.
  26. Sundararajan, L.; Misra, G.; Marsella, A.J. (2013). "Indigenous approaches to assessment, diagnosis, and treatment of mental disorders. In F. A. Paniagua and A-M, Yamada (Eds.), Handbook of multicultural mental health: Assement and treatment of diverse populations (pp. 69-87)". Academic Press: Oxford.
  27. Srinivasa Murthy, R. (2004). "Mental health in the new millennium: Research strategies for India". Indian Journal of Medical Research (120): 63–66.
  28. Gadgil, M.; Berkes, F.; Folke, C. (1993). "Indigenous knowledge for biodiversity conservation". Ambio (22): 151–156.
  29. Joshi, N.V.; Gadgil, M. (1991). "On the role of refugia in promoting prudent use of biological resources". Theoretical Population Biology (40): 211–229.
  30. Sosis, R. (2013). "Does religion promote trust? The role of signaling, reputation and punishment". Interdisciplinary Journal of Research on Religion (1): 1–30.
  31. Xygalatas, D.; एवं अन्य (2013). "Extreme rituals promote prosociality". Psychological Science (24(8)): 1602–1605.
  32. Nowak, M.A. (2012). "Why we help". Scientific American (July): 34–39.
  33. Wilson, D.S.; Wilson, E. O. (2008). "Evolution "for the good of group"". American Scientist (96): 380–389.
  34. Purzycki, B. G.; एवं अन्य (2016). "Moralistic gods, supernatural punishment and the expansion of human sociality". Nature. डीओआइ:1038/nature16980 |doi= के मान की जाँच करें (मदद).
  35. Shariff, A. F.; Norenzayan, A. (2007). "God is watching you: Priming God concepts increases prosocial behavior in an anonymous economic game". Psychological Science (18): 803–809.
  36. Bowlby, J. (1969/1997). Attachment and loss. Volume 1. Attachment. London: Pimlico. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  37. Kirkpatrick, L. A. (1998). "God as a substitute attachment figure: A longitudinal study of adult attachment style and religious change in college students". Personality and Social Psychology Bulletin (24): 961–973.
  38. Ainsworth, M.D.S.; Bowlby, J. (1991). "An ethological approach to personality development". American Psychologist (46): 333–341.
  39. Cicirelli, V.G. (2004). "God as the ultimate attachment figure for older adults". Attachment & Human Development (6(4)): 371–388.
  40. Weingarten, C. P.; Chisolm, J.S. (2009). "Attachment and cooperation in religious groups". Current Anthropology (50(6)): 759–785.