परमेश्वरीलाल गुप्त

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डॉ परमेश्वरीलाल गुप्त (२४ दिसम्बर १९१४ - २९ जुलाई २००१) भारत के स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी, मुद्राशास्त्री, इतिहासकार एवं हिन्दी साहित्यकार थे।

जीवनवृत[संपादित करें]

उनका जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुआ था। सन् १९३० में जब वे 'वेजली हाई स्कूल' में थे, नेहरू की गिरफ्तारी के विरुद्ध उन्होने विरोध आयोजित किया था जिसके कारण उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया। उसके बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बने और कई बार अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल भेजा।। वे आजमगढ़ में इतने लोकप्रिय हुए कि 'आजमगढ़ के नेहरू' कहलाने लगे।

सन् १९४७ में जब भारत स्वतंत्र हो गया, उन्होने राजनीति से संयास ले लिया। इसके उपरान्त उन्होने अपना पूरा जीवन अपनी ज्ञानपिपासा को बुझाने में लगा दिया। उन्होने पुनः विद्याथीजीवन में प्रवेश किया और प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विषय लेकर प्रथम श्रेणी में एमए की परीक्षा उतीर्ण की। इसके उपरान्त उन्होने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएचडी की।

समाज सुधार एवं पत्रकारिता[संपादित करें]

आजादी की लड़ाई के साथ-साथ श्री गुप्त सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध भी लड़े। इसके लिये उन्होने 'अग्रवाल सेवक मण्डल' और 'अग्रवाल युवक संघ' भी बनाया। उन्होने आजमगढ़ के लोगों के की शिक्षा के विकास पर भी ध्यान दिया और वहाँ एक सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना की। बालिका शिक्षा के लिये उन्होने एक बालिका प्राइमरी स्कूल की स्थापना की जो आगे चलकर महाविद्यालय बन गया।

उन्होने वाराणसी से छपने वाले 'आज' तथा आगरा से प्रकाशित 'सैनिक' नामक दैनिकों के सम्पादकीय मण्डल में भी लगभग १५ वर्षों तक अपनी सेवाएँ दीं।

मुद्राशास्त्री[संपादित करें]

डॉ गुप्त ने वाराणसी के भारत कलाभवन में सन् १९५० से सन् १९५४ तक सहायक संग्रहालयाध्यक्ष (क्यूरेटर) के पद पर काम किया। उसके बाद सन् १९६२ तक उन्होने प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम में मुद्राशास्त्री के रूप में कार्य किया। सन् १९६३ से १९७२ तक वे पटना संग्रहालय के अध्यक्ष रहे। सेवानिवृत्ति के बाद वे नासिक में रहने लगे और वहीं भारतीय मुद्राशास्त्रीय अध्ययन शोध संस्थान (Indian Institute of Research in Numismatic Studies) की स्थापना की। आज यह एशिया में अपने तरह का अकेला प्रतिष्ठान है।

उनका प्रथम शोधपत्र सन् १९४२ में भारतीय मुद्राशास्त्रीय सोसायटी के जर्नल में प्रकाशित हुआ था। उसके बाद उन्होने ३२ पुस्तकें एवं कोई ढ़ाई सौ शोधपत्र लिखे। अति प्राचीन भारतीय पंच-मार्क सिक्कों के तो वे सर्वश्रेष्ठ विद्वान थे।

सम्मान एवं पुरस्कार[संपादित करें]

डॉ गुप्त को अनेकों सम्मान एवं पुरस्कार मिले। भारतीय मुद्राशास्त्रीय सोसायटी (Numismatic Society of India) ने उन्हें सन् १९५४ में 'चक्रविक्रम' मेडल प्रदान किया। फिर सन् १९६२ में 'नेल्सन राइट मेडल' (Nelson Wright Medal) प्रदान किया और सन् १९७२ में अपना अवैतनिक फेलो बनाया। 'रॉयल नुमिस्मैटिक सोसायटी' ने भी उन्हें सन् १९७५ में अपना अवैत्तनिक फेलो चुना। उसी वर्ष कोलकाता की एशियाटिक सोसायटी ने उन्हें 'यदुनाथ सरकार स्वर्न पदक' प्रदान किया। सन् १९८६ में डॉ गुप्त को अन्तरराष्ट्रीय मुद्राशास्त्रीय आयोग का अवैतनिक सदस्य बनाया गया। सन् १९८७ में उन्हें अमेरिकी मुद्राशास्त्रीय सोसायटी का मेडल (Archer M. Huntington Medal) प्रदान किया गया। सन् १९९३ में उन्हें मुम्बई की एशियाटिक सोसायटी का अवैतनिक फेलो चुना गया।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]