पढ़ीस

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बलभद्र प्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस' (जन्म: 25 सितम्बर 1898; मृत्यु: 09 जनवरी 1943) एक आधुनिक अवधी भाषा कवि थे।[1][2]

परिचय[संपादित करें]

पढ़ीस जी का जन्म १८९८ ई. में उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिला में अम्बरपुर गाँव में हुआ था। खड़ी बोली, हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू का ज्ञान होने के बाद भी पढ़ीस जी कविता अपनी मातृभाषा यानी अवधी में ही लिखते थे। पढ़ीस जी ने अपने आदर्शों के अनुसार सरकारी नौकरी छोड़कर जनता के बीच रहकर उसे शिक्षित करने, उसी की तरह खेतों में काम करने और गांव में रहते हुये साहित्य लिखने का निश्चय किया। पढी़सजी ने कुलीन ब्राह्मणों की रूढ़ियां तोड़कर हल की मुठिया पकड़ी। अछूत बालकों को घर पढ़ाने लगे। उनके दुबले-पतले मुख पर परिश्रम की थकान दिखने लगी पर आंखों में नई चमक आयी, वाणी में नया ओज आया।[3]

१९३३ ई. में पढ़ीस जी का काव्य संग्रह 'चकल्लस‘ प्रकाशित हुआ, जिसकी भूमिका निरालाजी ने लिखी थी और साफ तौर पर कहा था कि ये संग्रह हिन्दी के तमाम सफल काव्यों से बढ़कर है। पढ़ीस जी की ग्रंथावली उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से आ चुकी है।

बलभद्र दीक्षित 'पढ़ीस ' का देहावसान सन्‌ १९४३ में हुआ।

"दीक्षित के लिये बहुत सोचता हूं, मगर वह नस मेरी कट चुकी है जिसमें स्नेह सार्थक है। अपने आप दिन-रात जलन होती है। किसी से अपनी तरफ़ से प्राय: नहीं मिलता। मिल नहीं सकता। कोई आता है तो थोड़ी सी बातचीत। आनेवाला ऊब जाता है। मुझे भी बातचीत अच्छी नहीं लगती। कभी रात भर नींद नहीं आती। तम्बाकू छूटती नहीं। खोपड़ी भन्नाई रहती है। चित्रकूट में एक दफा बीमारी के समय छोड़ दिया था खाना, फिर आदत पड़ गयी।”

बलभद्र प्रसाद दीक्षित के देहावसान पर परम प्रिय मित्र सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ने लिखा।


सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "When he recorded Nirala?s voice clandestinely". हिंदुस्तान टाइम्स (अंग्रेज़ी में). अक्टूबर 07, 2006. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  2. "लरिकउनू ए.मे. पास किहिनि". Awadhi.com (अवधी में).
  3. "'तुम हे साजन!'-पढ़ीस". Awadhi.com (अवधी में).

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]