बढ़ोह

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बढ़ोह पठारी वास्तव में पास- पास लगे दो गाँव है। यह कुल्हार रेलवे स्टेशन से १२ मील की दूरी पर पुरब की तरफ एक छोटी- सी पहाड़ी की तलहटी में बसा है। दोनों गाँवों के मध्य में एक रमणीय सरोवर है।

बढ़ोह के दक्षिण में एक दूसरा सरोवर है। इस सरोवर के चारों तरफ मिले कई मंदिरों के अवशेष यह प्रमाणित करते हैं कि मध्यकाल में यह एक समृद्ध नगर हुआ करता था तथा निकट स्थित पठारी, जहाँ कई अन्य स्मारक मिले हैं, इसी नगर का एक हिस्सा था। स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार इस नगर का प्राचीन नाम बटनगर था। लेकिन इस बात का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिला है। यहाँ के मध्यकालीन के स्थानीय राजा तथा पुराने स्मारकों के निर्माता के बारे में भी हमारी जानकारी कम है।

बढ़ोह के महत्वपूर्ण प्राचीन स्मारकों का विवरण इस प्रकार है :-

  1. . गरुड़मल मंदिर
  2. . सोला खम्भी
  3. . दशावतार मंदिर
  4. . सतमढ़ी मंदिरें
  5. . जैन मंदिर

== गरुड़मल मंदिर :-

स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर को एक गड़ेरिये ने बनवाया था, इसलिए इसका नाम गरुड़मल मंदिर है। इसे यहाँ ध्वस्तावस्था में विद्यमान सभी मंदिरों में यह मंदिर सबसे बड़ा है। वर्तमान में यह पूरी तरह अपने मूल अवस्था में नहीं रहा। गर्भगृह के नीचे का हिस्सा तथा दालान ९ वीं सदी के हैं, जबकि उसको शिखर का आसपास के हिंदू तथा जैन मंदिरों से प्राप्त मलवों से पुनर्निमाण किया गया है। मुख्य मंदिर सात छोटी मंदिरों से घिरा था, जो अब ध्वस्त हो चुके हैं।

मंदिर के सामने वाले हिस्से को देखने से लगता है कि चबूतरे की दीवार पर बने ताखों को मूर्तियों से सजाया गया था। परिसर के मध्य में एक चबूतरा बना है, जिसमें उत्तर की तरफ बने दरवाजे से जाने का प्रावधान है। सामने की तरफ एक पुराना सरोवर है। बाहर चबुतरे के चारों तरफ कई हिंदू देवी- देवताओं को उकेड़ा गया है। चारों तरफ स्थित मंदिरों में उत्तर- पश्चिम कोने पर सूर्य भगवान का मंदिर ही सिर्फ अस्तित्व में है। दरवाजे के धरण (लिंटल) पर गोद में बच्चा लिए मातृदेवी के साथ अन्य कई देवियों की प्रतिमाएँ बनाई गई थी। यह अब ग्वालियर संग्रहालय में रखी गई है।

इस मंदिर की योजना अन्य सामान्य मंदिरों से अलग है। कुछ हद तक यह ग्वालियर के तेली के मंदिर से मिलती- जुलती है। मुख्य मंदिर वर्गाकार न होकर लंबाई में है। दलान के प्रवेश द्वारा के बाद सभा मंडप भी नहीं बना है।

सोला खम्भी[संपादित करें]

इस इमारत में १६ खंभे एक सपाट छत को सहारा दिये हुए है। अतः इसे सोला खम्भी के नाम से जाना जाता है। वास्तुकला के आधार पर इसे ८ वीं या ९ वीं सदी का कहा जा सकता है।

इस भवन का निर्माण किस उद्देश्य से किया गया था, इसका कोई साक्ष्य नहीं मिलता, परंतु जैसा कि यह जलाशय के किनारे अवस्थित है, अतः हो सकता है कि यह एक मनोरंजक स्थल के रूप में बनाया गया हो।

= दशावतार मंदिर[संपादित करें]

८ वीं से १० वीं सदी के मध्य बना इस मंदिर में विष्णु के सभी दशावतारों को समर्पित है। इसका अधिकांश भाग अब नष्ट हो चुका है।

सतमढ़ी मंदिरें[संपादित करें]

"सतमढ़ी' नाम सात मंदिरों के समूह का द्योतक है। वर्तमान में इनमें से सिर्फ छः ही अस्तित्व में हैं। बचे हुए अवशेष अन्य मंदिरों के अस्तित्व को प्रमाणित करते हैं। मंदिरों का यह समूह दशावतार मंदिर के उत्तर- पूर्व दिशा में लगभग १ मील की दूरी पर अवस्थित है। ये मंदिरें दशावतार मंदिर की ही समकालीन है।

ध्वंसावशेषों में कुछ मंदिर वैष्णव संप्रदाय से संबद्ध है, तो कुछ शैव संप्रदाय से भी। मूर्तियों में विष्णु के नौवें अवतार बुद्ध तथा गणेश की प्रतिमा भी मिलती है।

जैन मंदिर[संपादित करें]

इस मंदिर में एक लंबे आंगन के चारों तरफ कुल २५ अलग- अलग कक्ष बने हैं तथा मध्य में एक उठे हुए चबूतरे के रूप में वेदी है। मंदिर के ये कक्ष अलग- अलग समय में बने मालूम पड़ते हैं, जो ९ वीं सदी से लेकर १२ वीं सदी या उसके बाद के काल का भी हो सकता है। कुछ कक्ष का छत शिखरनुमा है, कुछ का गुम्बदाकार तथा अन्य का सपाट। सबसे प्रमुख कक्ष, जो दक्षिण की ओर स्थित है, का मुख उत्तर दिशा की तरफ है। इन कक्षों में जैन तीथर्ंकरों की प्रतिमाएँ बनी हुई है।

पठारी स्थित महत्वपूर्ण स्मारकों का उल्लेख इस प्रकार है 
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१. सप्त मातृका २. प्रस्तर स्तंभ ३. विशाल अपूर्ण प्रतिमा ४. शिव मंदिर

सप्त मातृका[संपादित करें]

पत्थर को काटकर तथा उत्कीर्ण की गई सप्तमातृका की प्रतिमा ५ वीं सदी में बनाई गई थी। यह बढ़ोह तथा पठारी के मध्य पहाड़ी के दक्षिणी हिस्से में अवस्थित है। यहाँ मिले एक अभिलेख में राजा जयतसेन का उल्लेख है।

= प्रस्तर स्तंभ[संपादित करें]

यह गाँव के अंदर ही अवस्थित है। इस पर मिले अभिलेख में यह उल्लेख किया गया है कि ८इस स्तंभ की स्थापना सन् ८६१ (वि. सं. ९१७) में राष्ट्रकूट राजा प्रबल के महामंत्री ने गरुड़ध्वज के रूप में की थी। स्थानीय लोग इसे भीम गदा के नाम से जानते हैं। प्राचीन काल में यह स्तंभ किसी मंदिर के सामने स्थापित रहा होगा। इस स्तंभ पर अनेक राजाओं की प्रशस्तियाँ उत्कीर्ण है, जिससे इसके भव्य इतिहास पता चलता है।

वराह की विशाल अपूर्ण प्रतिमा[संपादित करें]

यह गाँव से आधे मील की दूरी पर पुरब की तरफ स्थित है। संभवतः यह उत्तर गुप्त काल की है।

शिव मंदिर[संपादित करें]

यह स्थान गाँव के दक्षिण- पूर्व दिशा में आधे मील की दूरी में स्थित है। सन् १९४७ ई. से पूर्व इस स्थान पर नवाबों का शासन था, जिनके राज्य में २८ गाँव थे। उनमें ९० ऽ गाँव ऊजड़ थे। जनता नवाबों के अत्याचार से त्रस्त होकर यह स्थान छोड़कर ग्वालियर राज्य में आकर बस गये।