पटिसंभिदामग्ग

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पटिसंभिदामग्ग, खुद्दक निकाय का 12वाँ ग्रंथ है। इसमें आर्यभूमि की प्राप्ति में सहायक चार प्रकार के ज्ञान का निरूपण है। इसलिये यह ग्रंथ "पटिसंभिदाभग्ग" कहलाता है।

परिचय[संपादित करें]

अनुभूति को दृष्टि से सभी धर्मों का विभाजन पाँच प्रकार से किया गया है -

  • अभिंञय्या धम्मा (अभिज्ञेय धर्म),
  • परिंञय्या धम्मा (परिज्ञेय धर्म),
  • महातव्या धम्मा (प्रहातव्य धर्म),
  • भावतब्बा धम्मा (भवितव्य धर्म) और
  • सच्छिकातव्या धम्मा (साक्षात् कर्तव्य धर्म)।

ख्यादि जिन धर्मों का स्वलक्षण संबंधी ज्ञान प्राप्त करना है, वे परिज्ञेय हैं। अकुशल धर्म जो कि देय है प्रहातव्य हैं। कुशल धर्म जिनका अभ्यास करना है, भवितव्य है। कुशल धर्म जिनका अभ्यास करना है, भवितव्य है। ध्यान, विमोक्ष, मार्ग फलादि धर्म और विशेषत: निर्वाण साक्षात् कर्तव्य हैं।

इस अनुभूति की प्राप्ति से चार प्रकार की पटिसंभिदाएँ (प्रतिसंविद् ज्ञान) सहायक होती हैं - धम्म-पटिसंभिदा (धर्म प्रतिसंविद ज्ञान), अत्थ पटिसंभिदा (अर्थ प्रतिसंविद् ज्ञान), निरुत्ति पटिसंभिदा (निरुक्ति प्रतिसंविद् ज्ञान) और पटिभान-पटिसंभिदा (प्रतिभान प्रतिसंविद् ज्ञान)।

तत्वावबोध के लिये सभी धर्मपर्यायों का ज्ञान आवश्यक है। इसकी प्राप्ति धम्म पटिसंभिदा से होती है। धर्मों के अर्थ की गहराई में प्रवेश करते है। और उनका यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं: यह अत्थ पटिसंभिदा कहलाता है। धर्म और अर्थ दोनों भाषा पर आश्रित हैं। इसलिये धर्मज्ञान और अर्थज्ञान की प्राप्ति के लिये भाषा का ज्ञान भी अपेक्षित है। यह निरुत्ति पटिसंभिदा से संभव है। उक्त तीनों पटिसंभिदाओं का एकमात्र उद्देश्य तत्वदर्शन हैं, जिसकी, प्राप्ति पटिभान पटिसंभिदा कहलाती है। सभी आर्य पुद्गलों को अपनी अपनी अवस्था के अनुसार प्रतिसंविद् ज्ञान होता है। लेकिन अर्हत्व की अवस्था में ही वह पूर्णता को प्राप्त होता है।

पटिसंभिदामग्ग के तीन वग्ग (वर्ग) हैं, जिनका नामकरण परिमाण के अनुसार हुआ है। महावग्ग, मज्झिमवग्ग और चुल्लवग्ग। दूसरा और तीसरा क्रमश: युगनद्धवग्ग और महापंञावग्ग भी कहलाते हैं। प्रत्येक वग्ग के दस दस विभाग हैं, जो कथाएँ कहलाते हैं, वे निम्न प्रकार हैं-

1. महावग्ग : ञाणकथा, विट्ठिकथा, आनापानसतिकथा, इंद्रियकथा, विमोक्खकथा, गतिकथा, कम्मकथा, विपल्लासकथा, मग्गकथा और मंडपेय्यकथा।

2. मज्झिम वग्ग : युगनद्धकथा, सच्चकथा, बोज्झंगकथा, मेत्तकथा, विरागकथा, पटिसंभिदाकथा, धम्मचक्ककथा, लोकुत्तरकथा बलकथा और सुम्मकथा।

3. चुल्लवग्ग : महापंञाकथा, इद्धिकथा, अभिसमयकथा, विवेककथा, चरियाकथा, पाटिहारियकथा, समसीसकथा सतिपट्ठानकथा विपस्सनाकथा और मातिकाकथा।

कथाएँ क्रमबद्ध हैं। अट्ठकथा के अनुसार 30 कथाओं में ञाणकथा को पहला स्थान इसलिये दिया गया है, क्योंकि सम्यक् दृष्टि ही बुद्धदेशित मार्ग का प्रथम अंग है। ज्ञान से मिथ्यादृष्टि दूर हो जाती है। इसलिये ञाणकथा के बाद ही विट्टिकथा दी गई है। मिथ्यादृष्टि के दूर होने से चित्त समाधिस्थ होता है। समाधिभावना में सतिपट्ठान (स्मृत्युपस्थान) का प्रमुख स्थान है। इसलिये दिट्टिकथा के बाद ही आनापानसतिकथा दी गई है। श्रद्धादि पाँच इंद्रियों के अभ्यास से आनापान स्मृति पुष्ट हो जाती है। इसलिये आनापानसतिकथा के बाद ही इंद्रियकथा दी गई है। इंद्रियों के अभ्यास से चित्त बंधनमुक्त हो जाता है। इसलिये इंद्रियकथा के बाद ही विमोक्खकथा दी गई हैं। सभी योनियों के जीव मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। जो सुगतियों में जन्म लेते हैं, ये ही उसे प्राप्त कर सकते हैं। इसलिये विमोक्खकथा के बाद ही गतिकथा दी गई है। किसी जीव की गति उसके कर्मानुसार होती है। इसलिये गतिकथा के बाद ही कम्मकथा दी गई है। चार प्रकार के विपर्यसों (अथवा ज्ञान) के कारण जीव कर्मसंचय करते हैं। इसजिये कम्मकथा के बाद दी विपल्लास कथा और मग्ग कथाएँ दी गई हैं। इस वग्ग की अंतिम कथा मंडपेय्य कथा है। मंड का अर्थ है सार। इसका प्रोग सारभूत आर्यमार्ग के लिये हुआ है। इसी प्रकार अन्य कथाओं की भी क्रमबद्धता दिखाई गई है।

इन कथाओं में वर्णित अधिकांश विषय एक न एक सुत्त पर आश्रित हैं। वास्तव में किसी सुत्त के विवरण के रूप में ही विषय की व्याख्या की गई है। इन व्याख्याओं का बड़ा महत्व है। इसलिये बाद की अट्ठकथाओं में उन विषयों के विवरण में पटिसभिदामग्ग की व्याख्याओं का उल्लेख किया गया है। विशुद्धिमार्ग में तो इनकी बहुलता है।

पटिसंभिदामग्ग की शैली, जो विश्लेषणात्मक है, अभिधम्म की शैली से मिलती है। इसलिये कुछ विद्वानों ने इसे अभिधम्म पिटक के अंतर्गत करने की उपयुक्तता बताई है। लेकिन, जैसा ऊपर उल्लेख किया गया है, प्रत्येक विषय का विवरण किसी न किसी सुत्तंत पर आधारित है। कहीं कही धर्म पर्यायों का विश्लेषण अभिधर्म प्रणाली की दृष्टि से भी हुआ है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि प्राचीन सुत्तंतों के संग्रह के बाद और अभिधर्मपिटक के संपादन के पहले, मध्य युग में, इस ग्रंथ की रचना हुई होगी।

अट्ठकथा में सारिपुत्त थेर को पटिसंभिदामग्ग का रचयिता बताया गया है। आधुनिक विद्वान् इसे मानने को तैयार नहीं है। लेकिन अट्ठकथा की मान्यता भी निराधार नहीं है। इस ग्रंथ की शैली सारिपुत्त थेर के सुत्तंतों की शैली के समान है। संमादिट्ठि, संपसादनिया संगीतिपरियाय, दसुत्तर और महावेदल्ल सुत्त इसके कतिपय उदाहरण हैं। हाँ भगवान और उनके कतिपय अन्य शिष्यों के सुत्तंत भी इसमें संगृहीत हैं लेकिन सारिपुत्त थेर के सुत्तंतों की ही प्रमुखता है। संभवत: इसी बात के कारण प्राचीन परंपरा सारिपुत्त थेर को पटिसंभिदामग्ग का रचयिता बताने के पक्ष में रही होगी।