पंचामृत

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दूध, दही, मधु, घृत और गन्ने के रस से बने द्रव्य को ही पंचामृत कहा जाता है। भारत के कई घरों में पूजा-पाठ के समय इसे भगवान को अर्पित कर पीया जाता है। दीपावली आदि प्रमुख त्योहारों के दिन इसका विशेष महत्त्व है, उस दिन मंदिरों मे यह भगवान को अर्पित कर प्रशाद के रूप में सबको वितरित किया जाता है। इस सामग्री में तुलसी पत्र अवश्य होता है गन्ने का रस पूरे वर्ष उपलब्ध नहीं होता है अतः इसके स्थान पर बूरा शक्कर ग्राह्य है मधु और शर्करा में से केवल एक ही ग्राह्य है पंचामृत सामग्री यथा है दूध दही घी मधु तुलसीपत्र पंचामृत का ही विस्तृत रूप सप्तामृत है जिसमें सात पदार्थ होते हैं 1 गेहूं चना जौ का घी में भुना आटा 2 . दही 3 . घी 4 . शर्करा या मधु 5 . तुलसी पत्र 6 . केला 7 . छोटी इलायची

यह  एक  सम्पूर्ण  संतुलित  आहार  भी है  जिसे  प्रसादम  कहा  जाता है  

इसमें दुग्ध संयुक्त नहीं किया गया है क्यों कि दही उसका पूरक है अगर इस सप्तामृत प्रसादम को छिलका युक्त चने के आटे से बनाया जाए तो सर्वोत्तम है इसमें आहार के छह रस विद्यमान होते हैं चने का भुना आटा - लवण कषाय दही - अम्ल मधुर घी रस रहित शर्करा या मधु - मधुर तुलसी पत्र - कटु तिक्त कषाय छोटी इलायची नारियल मधुर कटु केला मधुर अम्ल

इस प्रकार यह  एक  सम्पूर्ण  आहार  है  

इसमें केले के साथ ऋतुनुसार पपीता अंगूर खरबूजा आम मीठे शहतूत खिन्नी आदि फल लिए जा सकते हैं यह सप्तामृत वैदिक परम्परा का संसार का सर्वोत्तम आहार है जिसमें शरीर के प्रत्येक अंग प्रत्येक उम्र इसे बिना दांत बाले बृद्ध बालक सभी खा सकते हैं इसमें सभी रस सभी पोषक तत्व उपस्थित हैं वास्तव में यह सप्तामृत वैदिक सात्विक सम्पूर्ण संतुलित आहार है जिसे खाने के बाद मनुष्य को पौष्टिकता हेतु कुछ भी खाने की आवश्यकता नहीं है इसमें अन्न्न यानि कार्बोज घी यानि फैट दही यानि कार्बोहाइड्रेट वसा प्रोटीन विटामिन सी जीवनोपयोगी बैक्टीरिया शर्करा में कार्बोज विटामिन्स तुलसी में विटामिन्स मिनरल छोटी इलायची नारियल सूखे मेवे में वसा विटामिन्स प्रोटीन मिनरल फलों में विटामिन्स मिनरल फ्रुक्टोज सभी का समावेश है

निर्माण[संपादित करें]

पयोदधि घृतं चैव मधु च शर्करायुतम्।
पञ्चामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
अर्थ : दूध, दही, घी, मधु, और शर्करा-युक्त पञ्चामृत मैं (आपके) स्नान के लिए लाया हूँ, कृपया ग्रहण करें।

महात्म्य[संपादित करें]

पंचामृत देते समय देवपूजक अर्थात पुजारी जिस मंत्र का उच्चारण करता है, उसका अर्थ है- अकाल मृत्यु का हरण करने वाले और समस्त रोगों के विनाशक, श्रीविष्णु का चरणोदक पीकर पुनर्जन्म नहीं होता। दूसरे शब्दों में, श्रद्धापूर्वक पंचामृत का पान करने वाला मनुष्य संसार में समस्त ऐश्वर्यों को प्राप्त करता हुआ शरीरपात के बाद जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।' यह पंचामृत का माहात्म्य है। गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, शर्करा और मधु के सम्मिश्रण में रोग निवारण गुण विद्यमान होते हैं, यह पुष्टिकारक है, चिकित्सा शास्त्र की मान्यता है यह। लेकिन जब यह देवमूर्ति का स्पर्श करता है तो मुक्ति प्रदाता हो जाता है-यह आध्यात्मिक सत्य है।


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