न्याय (बौद्ध)

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बौद्धन्याय, अवैदिक भारतीय न्याय की श्रेणी में आता है। (जैनन्याय भी अवैदिक न्याय है।)

बौद्धन्याय चार संप्रदायों में विभक्त है- वैभाषिक, सौत्रांतिक, योगाचार और माध्यमिक। इनमें प्रथम दो हीनयान के तथा अंतिम दो महायान के अंतर्गत हैं। हीनयान का संबंध स्थविरवादी संघ से और महायान का संबंध महासांघिक संघ से है। पहला संघ बुद्धविषयों को परिवर्तनार्ह तथा दूसरा संघ उसे अपरिर्वनार्ह मानता है।

वैभाषिक[संपादित करें]

वैभाषिक न्याय में पदार्थ के "विषयी" और विषय के रूप में दो भेद मानकर दोनों का पृथक् अस्तित्व माना गया है। "विषयी" में रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पाँच स्कंधों का; चक्षु आदि छ: इंद्रियों तथा रूप आदि इनके छ: विषयों, इन बारह आयतनों का तथा इंद्रिय, विषय और विज्ञान इन तीन धातुओं का समावेश होता है। "विषय" में रूपधर्म, चित्तधर्म, चैत्तधर्म और रूपचित्तविप्रयुक्तधर्म इन चार "संस्कृत" हेतुप्रत्ययजन्य धर्मों का समावेश होता है। इस न्याय में जगत् को त्रैधातुक, संस्कृत तथा असंस्कृत धर्मों का समष्टि रूप, सत्य, प्रत्यक्षवेद्य तथा क्षणभंगुर मानकर "अर्हत्" पद की प्राप्ति और दु:खाभाव रूप निर्वाण को मानव जीवन का चरम लक्ष्य माना गया है।

वैभाषिक न्याय की विशेष जानकारी के लिए कात्यायनीपुत्र, वसुबंधु, स्थिरमति, दिंनाग, यशोमित्र तथा संघभद्र आदि बौद्ध विद्वानों के ग्रंथों का अवलोकन करना चाहिए।

सौत्रांतिक[संपादित करें]

"सौत्रांतिक न्याय" में बुद्ध के सूत्रात्मक वचनों के यथाश्रुत अर्थ को विशेष महत्व दिया जाता है। इसकी पदार्थ कल्पना वैभाषिक के समान ही है, अंतर केवल इतना है कि वैभाषिक न्याय में "ज्ञेय" और "ज्ञान" दोनों को प्रत्यक्ष माना जाता है और सौत्रांतिक न्याय में ज्ञान को प्रत्यक्ष तथा ज्ञेय को अतींद्रिय एवं ज्ञानानुमेय माना जाता है।

सौतांत्रिक न्याय का समुचित परिचय प्राप्त करने के लिए कुमारलात, श्रीलाभ, धर्मत्रात, बुद्धदेव और यशोमित्र आदि बौद्ध पंडितों के ग्रंथों का अनुशीलन करना चाहिए।

योगाचार[संपादित करें]

"योगाचार न्याय" में "विज्ञानवाद" को दार्शनिक सिद्धांत के रूप में स्वीकृत किया गया है। विज्ञानवाद के अनुसार "विज्ञान" ही एकमात्र सत्य वस्तु है। चित्त, मन और विज्ञप्ति उसी के नाम है। विज्ञान के दो भेद हैं- प्रवृत्तिविज्ञान और आलयविज्ञान। संसार के समस्त व्यवहार प्रवृत्तिविज्ञान से संपन्न होते हैं। "अहम्" आकार का ज्ञान आलयविज्ञान है। आलयविज्ञान ही इस न्याय के अनुसार आत्मा है। दोनों ही विज्ञान स्वप्रकाश एवं क्षणिक है। जगत् की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वह विज्ञान का विवर्त मात्र है। उसकी सत्ता केवल व्यावहारिक है। परमार्थ सत्ता केवल विज्ञान की ही है। इस न्याय के अनुसार आत्मभूत ज्ञानप्रवाह को नितांत निर्मल बनाना ही मनुष्य का अंतिम ध्येय है।

योगाचार न्याय को पूर्णतया अवगत करने के लिए मैत्रेयनाथ, असंग, वसुबंधु, स्थिरमति, दिंनाग, शंकर स्वामी, धर्मपाल तथा धर्मकीर्ति आदि बौद्ध मनीषियों के ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए।

माध्यमिक[संपादित करें]

"माध्यमिक न्याय" ने "शून्यवाद" को दार्शनिक सिद्धांत के रूप में अंगीकृत किया है। इसके अनुसार ज्ञेय और ज्ञान दोनों ही कल्पित हैं। पारमार्थिक तत्व एकमात्र "शून्य" ही है। "शून्य" सार, असत्, सदसत् और सदसद्विलक्षण, इन चार कोटियों से अलग है। जगत् इस "शून्य" का ही विवर्त है। विवर्त का मूल है संवृति, जो अविद्या और वासना के नाम से भी अभिहित होती है। इस मत के अनुसार कर्मक्लेशों की निवृत्ति होने पर मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर उसी प्रकार शांत हो जाता है जैसे तेल और बत्ती समाप्त होने पर प्रदीप।

माध्यमिक न्याय के विस्तृत और विशद ज्ञान के लिए नागार्जुन, आर्यदेव, बुद्धपालित, भावविवेक, चंद्रकीर्ति, शांतिदेव और शांतिरंक्षित आदि बौद्ध विपश्चितों के ग्रंथों का परिशीलन अपेक्षित है।

चारों संप्रदायों की कुछ समान मान्यताएँ[संपादित करें]

प्रमाण[संपादित करें]

बौद्ध न्याय में दो प्रमाण माने गए हैं - प्रत्यक्ष और अनुमान। प्रत्यक्ष के दो भेद हैं -निर्विकल्पक और सविकल्पक। उनमें स्वलक्षण वस्तुमात्र का ग्राहक होने के कारण "निर्विकल्पक" प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। "सविकल्पक जाति" आदि कल्पित पदार्थों का ग्राहक होने के कारण अप्रमाण ही है।

व्याप्ति[संपादित करें]

बौद्ध न्याय में व्याप्ति का क्षेत्र वैदिक न्याय की अपेक्षा सीमित माना गया है। उसके अनुसार तदुत्पत्ति और ततदात्म्य ही व्याप्ति के उपजीव्य हैं। अर्थात् जिन पदार्थों में परस्पर कार्यकारण भाव या तादात्म्य होता है, उन्हीं में व्याप्य-व्यापक-भाव होता है।

न्याय[संपादित करें]

बौद्ध न्याय में न्याय (अनुमानवाक्य) के दो ही अवयव माने गए हैं- उदाहरण और उपनय। इस अवयवद्वयात्मक न्याय से ही विश्व की क्षणिकता, विज्ञानमात्रता, पुद्गलनैरात्म्य तथा धर्मनैरात्म्य आदि का साधन कर सर्वशून्यता सिद्धात की प्रतिष्ठा की गई है।

सत्ता[संपादित करें]

बौद्ध न्याय में अर्थक्रियाकारित्व को ""सत्ता"" का लक्षण मानकर तथा स्थिर पदार्थ में उसे असंभव कहकर भावात्मक पदार्थों को क्षणिक माना गया है।

सद्धेतु[संपादित करें]

बौद्ध न्याय में किसी हेतु को सद्धेतु होने के लिए तीन अनुमापक रूपों से संपन्न होना आवश्यक माना गया है। वे तीन रूप पक्षसत्व, सपक्षसत्व एवं विपक्षसत्व हैं। गौतमीय न्याय में स्वीकृत "असत्प्रतिपक्षत्व" तथा "अबाधितत्व" को अनावश्यक कहा गया है।

हेत्वाभास[संपादित करें]

बौद्ध न्याय में वैशेषिक की भाँति तीन ही हेत्वाभांसविरुद्ध असिद्ध और व्यभिचारी- माने गए हैं।

कथा[संपादित करें]

बौद्ध न्याय में भी कथा के बाद, जल्प एवं वितंडा- भेदों का वर्णन किया जाता है, किंतु अंत में सिद्धांतत: वादकथा को ही ग्राह्य मानकर जल्प और वितंडा को हेप बताया गया है। कथानिरूपण के संदर्भ में छल, जाति तथा निग्रहस्थान का प्रतिपादन और विवेचन किया गया है। इन विषयों के संबंध में बौद्ध न्याय के दृष्टिकोण को उचित रूप में समझने के लिए उपायहृदय, प्रमाणसमुच्चय, न्यायविंदु और वादन्याय आदि ग्रंथ द्रष्टव्य हैं।

आर्यसत्य[संपादित करें]

बौद्ध न्याय के सभी संप्रदायों में चार आर्यसत्य माने गए हैं - दु:ख, दु:खसमुदय, दु:खनिरोध और दु:खनिरोध का मार्ग। इनमें दु:खसमुदय का अर्थ है - दु:खकारण। भवचक्र ही दु:ख का कारण है। उसका दूसरा सांप्रदायिक नाम है - "प्रतीत्यसमुत्पाद"। इसका अर्थ है- "किसी चेतन कर्ता की अपेक्षा न कर कारण के स्वाभाविक संनिधान से कार्य का उत्पन्न होना।"

"भवचक्र" के 12 अंग होते हैं।

1. अविद्या, 2. संस्कार, 3. विज्ञान, 4. नामरूप, 5. आयतन 6. स्पर्श, 
7. वेदना, 8 तृष्णा, 9. उपादान, 10. भव, 11. जातिजन्म, 12. जरामरण। 

इनमें प्रथम दो पूर्वजन्म से, मध्य के आठ वर्तमान जन्म से और अंत के दो भाव जन्म से संबद्ध होते हैं। चौथे आर्यसत्य को अष्टांगयोग के यप में वर्णित किया गया है। उनके नाम हैं- सम्यग्जन्म, सम्यक्संकल्प, सम्यग्वचन, सम्यक्कर्मांत, सम्यग्आजीव, सम्यग्व्यायाम, सम्यक्स्मृति, तथा सम्यक्समाधि। इन योगांगों के सेवन से यथार्थ प्रज्ञा का आविर्भाव होता है और उससे भवचक्र का विनाश होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

चार भावनाएँ[संपादित करें]

मोक्षमार्ग पर आरूढ़ होने के लिए चार भावनाओं को आवश्यक माना गया है। वे हैं- सब कुछ दु:खमय है, सब क्षणिक है, सब स्वलक्षण है तथा सब शून्य है। इन भावनाओं के अभ्यास से सांसारिक आसाक्ति का क्षय होता है और उसके फलस्वरूप मनुष्य मोक्ष मार्ग का पथिक बन अपने चरम लक्ष्य निर्वाण की ओर अग्रसर होता है।

त्रिरत्न[संपादित करें]

बुद्ध, संघ और धर्म ये तीन रत्न माने जाते हैं। इन तीनों का आश्रयण मनुष्य की सर्वाविध उन्नति विशेषत: आध्यात्मिक उत्थान का मूल है। बुद्ध के स्वरूप पर चित्त को केंद्रित करने से मनुष्य के मन में वितृष्णता और स्थिरता आती है, "संघ के प्रभाव से साधक में विश्वास और उत्साह का उदय होता है, धर्म के सेवन से उसके आत्मिक बल की वृद्धि होती है।"

बौद्ध न्याय मागधी, पालि और संस्कृत इन तीन भाषाओं में पल्लवित और विकसित हुआ है। अत: विकासक्रम से उनके विशद और विस्तृत ज्ञान के लिए इन तीनों भाषाओं का अध्ययन आवश्यक है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]