नौवां ग्रह

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सभी ग्रहो में सबसे ज्यादा तूफानी वातावरण रखने वाला ग्रह : नेप्ट्यून[मृत कड़ियाँ] , पृथ्वी से अबजो किलोमीटर दूर नेप्ट्यून के बारे में हमारे वैज्ञानिको को अभी बहुत कुछ जानकारी लेना बाकि है। 1989 में वॉयेजर यान ने जो थोड़ी बहुत जानकारिया नेप्ट्यून[मृत कड़ियाँ] के बारे में दी वह भी बहुत रोमांचक है , जो आज iqlevel  की इस पोस्ट में हम आपको विस्तार से बताएँगे।


 हमारे सौरमंडल का सबसे आखरी सभ्य कौन सा है ? इसका जवाब है नेप्ट्यून यानि की वरुण जो इस ग्रह का हिंदी नाम भी है।  और जनवरी , 1999 तक हमारे सौरमंडल का आखरी सभ्य कौन था ? ofcours neptyune ही था।[मृत कड़ियाँ]

history of neptyune planet[मृत कड़ियाँ][संपादित करें]

     आपको हमारा ये जवाब थोड़ा सा अटपटा लगा तो पढ़िए उसका पूरा सामायिक स्पस्टीकरण : साल था 1978 और नवम्बर महीना चल रहा था। अंतिरक्ष में 16,790 किलोमीटर की गति से अपनी नियत भ्रमणकक्ष में प्रवास करता हुआ सौरमंडल का सबसे आखरी ग्रह प्लूटो उसके पडोशी ग्रह नेप्ट्यून की भ्रमणकक्षा में पहुँच गया था।  थोड़े ही दिनों में प्लूटो नेप्ट्यून की भ्रमणकक्षा को काटकर उसमे दाखिल होने वाला था। उसके बाद सौरमंडल का सबसे आखरी कहा जाने वाला गृह प्लूटो 22 साल तक आखरी से आगे वाला रहने वाला था।  दूसरी और आठवे ग्रह नेप्ट्यून की गणना सौरमंडल के सबसे आखरी ग्रह में होने वाली थी।  

    आखिर वह दिन आया ,नवम्बर 28 , 1978 के दिन pluto ने neptyune[मृत कड़ियाँ] की भ्रमणकक्षा काटी। सौरमंडल का बहुत दूर का ग्रह प्लूटो सूर्य के नजदीक आया,   नेप्ट्यून सूर्य का सबसे दूरी वाला ग्रह बन गया। 22 साल तक नेप्ट्यून की गणना आखिरी ग्रह के तौर पर हुई।  आखिर में ,जनवरी 1999 को प्लूटो नेप्ट्यून की भ्रमणकक्षा  बहार निकला।  परिणामस्वरूप नेप्ट्यून फिर से सौरमंडल का अथवा सभ्य बना। इसलिए , हम लोग भले ही नेप्ट्यून को आठवे ग्रह के तौर पर जानते हो मगर , शरेरास 145 सालो के बाद नेप्ट्यून को 9 नंबर का स्थान सौरमंडल में मिलता है।   

   साल 1978 में विलियम हर्षल ने युरेनस को खोज निकाला उसके बाद 65 सालो के बाद नेप्ट्यून की जानकारी मानवसमाज को मिली। उसके बाद विज्ञानं जगत के संशोधक सौरमंडल के आठवे ग्रह  के बारे में सिर्फ अनुमान लगा रहे थे।  ज्होन एडम्स नामक एक खगोलशास्त्री जो अभी पढाई कर रहा  था और वह भी सौरमंडल के आठवे ग्रह का वह भी युरेनस ग्रह का मार्गदर्शन करके।

  यह खगोलशास्त्री ने देखा की ग्रह सूर्य की चारो और स्थिर गति से घूम रहा है , मगर फिर भी वह अपने निश्चित मार्ग से थोड़ा सा दूर हो जाता था।  जैसे उसके थोड़ा सा गुरुत्वाकर्षण का जतका लगा हो ऐसे थोड़ा सा दूर खिंच जाता था। और उसकी भ्रमण की गति में भी कईबार कम तो कभी कभी ज्यादा हो जाती थी।  एडम्स ने तक़रीबन दो साल तक नेप्ट्यून की तपास की , गणना की और 1843 में उसने यह तारण निकाला की भ्रमणकक्षा में युरेनस की गति कभी बढ़ जाती है , और उसके बाद कम होती है और आखिर में स्थिर हो ;जाती  है मतलब  गति है ठीक वैसी ही हो जाती है। यह परिवर्तन आठवे ग्रह के कारण होना चाहिए क्योकि युरेनस  की भ्रमणकक्षा यानि गुरुत्वाकर्षण  करे तब खिंचाई के कारन उसकी गति बढ़ जाती होगी। और उसके बाद जब वह धीरे धीरे दूर जा रहा होगा तब आठवे ग्रह का गुरुत्वाकर्षण उसे चिपकाये रखने की कोशिश कर रहा होगा तब उसकी गति खिंचाव के कारन कम हो जाती होगी।  और आखिर में युरेनस  बंधन से मुक्त होता होगा तब उसकी गति पहले जैसी हो जाती होगी। और इसका मतलब यह होता था की युरेनस ग्रह के उस पार कोई बड़ा ग्रह अवश्य होगा यह तारण लगाया गया था।  

कौन से वैज्ञानिक ने  नेप्ट्यून की शोध की थी ?[मृत कड़ियाँ][संपादित करें]

      ज्होन एडम्स ने जो तारण बताया था वह एकदम सही था उसने अंतरिक्ष में नेप्ट्यून का जो एक्ज़िट स्थान भी बताया था।  फिर भी अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है की एडम्स की उस बात को उस वक्त किसी ने भी सीरियसली नहीं लिया। एक भी खगोलशास्त्री ने उसकी बात की और ध्यान भी नहीं दिया।  परिणाम स्वरूप एडम्स ने किया हुआ परिश्रम निष्फल गया।  

  उसके बाद urbei लवेरियर नामक एक खगोलशास्त्री ने अंतरिक्ष में आठवे ग्रह का खोज निकाला। एडम्स के जैसे ही इस वैज्ञानिक ने भी यह प्रयास 1843 से शुरू कर दिया था।  फिर भी कोई ठोस पुरवा न मिलने के कारण विश्व को यह वैज्ञानिक आठवे ग्रह के बारे में जानकारी न दे सका। 1846 में फिर एक मौका आया। आठवे ग्रह के स्थान के बारे में लेवेरियर ने जो तारण  ही तारण ज्होन एडम्स के भी थे दोनों के तारण मिलते थे।  अंतरिक्ष में आठवे ग्रह के स्थान भी एकसमान मील रहे थे।  लेवेरियर ने अपने तारण खगोलशास्त्रीओ के सामने दिखने में थोड़ा सा भी विलम्ब नहीं किया। नए ग्रह के शोधक के तौर पर उसका नाम अमर बने ऐसा वह सोचता था जिसके लिए उसने एक तरकीब भी निकाली थी। दुनियाभरकी वैज्ञानिक संस्थाओ को उसने रातोरात पत्र लिखा और बताया की " युरेनस के बाद का अथवा ग्रह उसने शोध निकला है।  और संभवत उस ग्रह की तलाश के  लिए आप लोग मेरी मदद कीजिए ! "

  उस पत्र में लावेरियर ने आठवे ग्रह का अवकाश स्थान भी लिखा था।  इसलिए सभी खगोलशास्त्रिओने उसी दिशा की और अपने टेलिस्कोप लगाकर जांच पड़ताल शुरू की। और  आइडिआ से लावेरियर ने सबको काम पर लगा दिया और वह आराम से बैठकर किसी भी वैज्ञानिक संस्था के प्रत्युत्तर की राह देखने लगा।  आखिर में सेप्टेम्बर 23 , 1846 के दिन लवेरियर को जर्मनीकी वैज्ञानिक संस्था से खगोलशास्त्री जोहान गेली का पत्र मिला। सौरमंडल का अथवा ग्रह खोजने के लिए धन्यवाद ! ऐसे उस पत्र में लिखा हुआ था।  आखिर में नया ग्रह नेप्ट्यून के नाम से ज्ञांत हुआ , और urbei लवेरियर का नाम इस ग्रह के सोधक के नाम पर प्रसारित हुआ। और इस पूरी घटना में ज्होन एडम्स को किसीने याद भी नहीं किया। आठवे ग्रह नेप्ट्यून का स्थान उसीने खोज निकाला , फिर भी उस ग्रह का सोधक लावेरियर को  बनाया गया। इसे हम एडम्स का बेड लक भी कह सकते है !

      बर्लिन की वैज्ञानिक संस्था के खगोलशास्त्री ज्होन गेलि ने प्रथम बार जब नेप्ट्यून को देखा तो उसको वह ग्रह धुंधला डॉट्स के रूप में दिखाई दिया।उस वख्त ग्रह का रंग ठीक तरह से दिखाई नहीं दिया था।  क्योकि यह  नया ग्रह पृथ्वी से 4.43 अब्ज किलोमीटर दूर था , और फिर उस ज़माने में बहुत शक्तिशाली टेलेस्कोप नहीं बने हुए  थे। इसीलिए आठवा  ग्रह मील जाने के बाद कई सालो तक उसके बायो -डेटा  से मानव समाज को वंचित रहना पड़ा। 1989 में अमेरिका के वॉयेजर यान ने यह कमी पूरी कर दी।  

voyejar[मृत कड़ियाँ][संपादित करें]

      वॉयेजर ने सारी कमी भी पूरी नहीं की क्योकि नेप्ट्यून की मुलाकात के दरम्यान वॉयेजर ने जो विश्लेषण किया वह सीमित था।  इससे पहले[मृत कड़ियाँ]

गुरु , शनि और प्लूटो का पूरा बायो-डेटा वॉयेजर ने दे दिया था। जबकि नेप्ट्यून की मुलाकात के दौरान  वॉयेजर को नेप्ट्यून के बारे में पूरी जानकारी मिली नहीं।  और इसका जवाब अभी तक नासा के पास भी नहीं है.परिणाम स्वरूप अब्जो किलोमीटर दूर अंतरिक्षमें नेप्ट्यून के बारे में वॉयेजर ने जो भी जानकारी प्रदान की उससे ही संतोष रखना पड़ा।[मृत कड़ियाँ]

details about neptyune planet[मृत कड़ियाँ][संपादित करें]

            49,528 किलोमीटर का व्यास वाला आसमानी ग्रह नेप्ट्यून साइज में प्लूटो से थोड़ा ही  छोटा है, जबकि पृथ्वी की तुलना में यह ग्रह पृथ्वी से चार गुना ज्यादा बड़ा है।  सूर्य से करीब 4. 5 अबज किलोमीटर दूर से उसकी भ्रमणकक्षा में घूम रहा है। प्रदक्षिणा के दौरान जो गोलाकार वृत्त बनता है उसमे उसका एक साल पृथ्वी के 164. 79 सालो जितना है! पृथ्वी पर 365. 26 दिनों में एक साल होता है , जबकि नेप्ट्यून पर  60,189,54 दिनों के बाद एक साल होता  है। 23 घाटे और 56 मिनिट में पृथ्वी परिक्रमा पूरा करती है और  पर एक महीना 30 या 31 दिन का होता है , जबकि 16 घंटे और 7 मिनितमे परिक्रमा पूरी करने वाला नेप्ट्यून का एक महीना 5,015. 79 दिनों का होता है। एक और आश्चर्य की बात सुनलो : 1846 में मानवजात को नेप्ट्यून के बारे में पता चला और उस बात को करीबन  153 साल और 8 महीने बीत चुके है। दूसरी और नेप्ट्यून का अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ है। पृथ्वी को उसने जब पहली बार दर्शन दिए उस स्थान पर पहुंचने में अभी उसको 11  साल और लग जायेंगे। भ्रमणकक्षा में आगे  बढ़ता  हुआ नेप्ट्यून जब दूसरी बार पृथ्वी   जायेगा तब उसका  पृथ्वी  के ऊपर पहला जन्मदिन होगा !  

   नेप्ट्यून  सूर्य से इतना दूर है की यदि कोई अवकासयात्री नेप्ट्यून के ऊपर से सूर्य को देखे तो सूर्य उसे सिर्फ एक छोटे से तारे जितना ही दिखेगा।  सूर्य का प्रकाश नेप्ट्यून की सतह तक बहुत ही कम मात्रा में पहुंचता  है। और उसके  उपरांत नेप्ट्यून  मीथेनयुक्त बादल सूर्य की किरणों को नेप्ट्यून तक पहुंचने में अवरोधक का काम करते है।  बहुत ही विशाल कद का नेप्ट्यून ग्रह हम को एक सफ़ेद बिंदु के रूप में दीखता है।  

प्रलयकारी तूफान on  neptyune planet or voyejar यान[मृत कड़ियाँ][संपादित करें]

वॉयेजर यान[मृत कड़ियाँ]

         लॉन्चिंग होने के बारह साल बाद वॉयेजर यान नेप्ट्यून के पास पहुंचा।  वॉयेजर नेप्ट्यून ग्रह से 5000 किलोमीटर दूर से निकला उस दरम्यान उसके वीडियो केमराने मानवजात को पहली बार नेप्ट्यून की तस्वीर भेजी। मिथेयुक्त बादल भी खगोलशास्त्रीओ को ंनज्दीक से देखने को मिले। उसकी ऊपर की सपाटी की और बदल यहाँ से वहां ऐसे घुमारी लगा रहे थे , क्योकि वातावरण एक़दम प्रलयकारी था। नेप्ट्यून  के ऊपर कई जगह चक्रवातों को भी देखा गया। वॉयेजर यान के  सेंसर्स ने नेप्ट्यून की सपाटी पर पवन स्पीड का संसोधन किया तो उसकी गति 1900 से 2000 किलोमीटर प्रतिकालक थी ! नासा के वैज्ञानिको को  यह देखकर आश्चर्य हुआ ! दूर से बेहद सांत दिख रहा नेप्ट्यून इतना प्रलयकारी होगा यह  किसी ने भी नहीं सोचा था। हम्हारे  सौरमंडल  के किसी भी ग्रह में इतनी तेजी से तूफ़ान नहीं आता है, इसलिए इस बाबत में नेप्ट्यून सबसे अलग है।

    सबसे अलग ही नहीं , नेप्ट्यून को रिकॉर्ड - ब्रेकर  भी गिनना चाहिए, क्योकि पुरे ग्रह पर प्रलयकारी तूफान 2160 किलोमीटर  की स्पीड से आता है ! इस चक्रवात ने नेप्ट्यून के विषुववृत्त के नजदीक गोलाकार चक्कर बना दिया है। और उसी को वैज्ञानिक ग्रेट डार्क स्पॉट कहते है। यह चक्क्र पहली बार वॉयेजर ने खोज निकाला था। इसलिए सौरमंडल में नेप्ट्यून ग्रह मिला उसके सालो बाद ग्रेट डार्क स्पॉट के बारे में पता चला। 1993 के साल में अमेरिका के हर्बल टेलेस्कोप ने नेप्ट्यून की उपलि सपाटी में ग्रेट डार्क स्पॉट का तूफ़ान दिखा। हर्बल के पॉवरफुल टेलेस्कोप  ने उसके कई तर्स्वीरें खींची। घंटो के बाद ली हुई ग्रेट डार्क स्पॉट की तस्वीर जब नासा के वैज्ञानिको ने देखि तब उन्हें दिखाई पड़ा की नेप्ट्यून का बवह चक्र स्थिर रहने की बजाय पश्चिम से पूर्व की और यात्रा कर रहा था। इसका मतलब यह था की नेप्ट्यून की सपाटी के ऊपर एक घंटे में कई हजारो किलोमीटर की गति  से तूफ़ान आता होगा।  सपाटी के ऊपर  आया हुआ तूफ़ान ही ग्रेट  को पूर्व की और धक्का लगा रहा हो ऐसा अनुमान निकला गया। 1989 में वॉयेजर ने नेप्ट्यून  की सपाटी के ऊपर कई मिथेयुक्त बदलो को देखा , इसीलिए जो संसोधकोंने जो परिणाम निकला था वह सही था। और नेप्ट्यून के तूफानी  मिजाज के बारे में वॉयेजर ने जो फोटो भेजी वह भी सही।  

वॉयेजर ने नेप्ट्यून के बारे में जो रिपोर्ट भेजे उससे खगोलशास्त्रीओ को जो रिपोर्ट दिए उसके आधार पर यह पता चला की गुरु , शनि और प्लूटो के जैसे नेप्ट्यून ग्रह भी हाइड्रोजन  और हीलियम का बना हुआ है। मीथेन की मात्रा वहां पर 2% है इस ग्रह का ज्यादातर मीथेन वातावरण में बादलो के रूप में कैद है , जहा का तापमान -193 ' सेल्सियस जितना होने से मीथेन हिमकणों में बदल गया है। बादलो के निचे हाइड्रोजन और हीमियम का हजारो किलोमीटर का गहरा वातावरण है , जिसका अंत कहा होगा िसी को भी नहीं पता। अलबत , वॉयेजर ने नेप्ट्यून का अभ्यास करके इतना तो बता दिया की वातावरण के निचे पानी , ऐमोनिया और मीथेन बहुत ज्यादा प्रमाण में होगा।वहां पर समुद्र का अस्तित्व होगा की नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन वॉयेजर के अभ्यास के मुताबिक हम देखे तो लगता  है की उसकी सपाटी पर प्रवाही रूप में मीथेन होना चाहिए।  

      मीथेन प्रवाही रूप में क्यों होना चाहिए ? यह भी पढ़े : वॉयेजर ने किरणों के आधार पर खोज निकाला की नेप्तुने का अंदर का हिस्सा पृथ्वी के हिस्से से थोड़ा सा ही बड़ा है जहा पर गर्मी नहीं है। नेप्ट्यून पर खड़क 7000 सेल्सियस का  तापमान धारण कर रहे है।  जिसके परिणाम स्वरूप नेप्ट्यून के अंदरूनी  बहुत ही ज्यादा ऊर्जा उत्पन्न होती होगी। और क्रमशः यह ऊर्जा सतह से ऊपर उठाकर वातावरण में प्रवेश करके बादलो को चीरती हुई निकलती है और ऐसे बदलो के अंदर रहा हुआ पानी , ऐमोनिया , और मीथेन की बारिश होती होगी। वाह पर मीथेन का समुद्र होगा की नहीं यह कहना तो मुश्किल है ? मगर हां , संशोधक यह तो बताते है की करोडो किलोमीटर दूर नेप्ट्यूनर को जितनी ऊर्जा सूर्य से  मिलती है उससे कई ज्यादा ऊर्जा वह खुद उत्पन्न करता है !गुरु ग्रह   के जैसे ही नेप्ट्यून की अंदर की गर्मी भी धीरे धीरे खत्म हो रही है।  

       नेप्ट्यून की एक और खासियत वैज्ञानिको को तब पता चली जब वॉयेजर ने नेप्ट्यून के वलयो को खोज निकाला।  नेप्ट्यून  ग्रह के पास वलय है। .यह बात 1989 तक किसी भी खगोलशास्त्री को पता नहीं थी।  और इसीलिए वॉयेजर यान ने अगस्त 26 , 1989 के दिन पहली बार मानवजात को नेप्ट्यून के वलयो के बारे में अवगत कराया। वलयो को उसने बारीकी से देखा तो उसे पता चला की उसमे धुल , पत्थर और कुछ अवकाश चीज़े थी।  नेप्ट्यून की बाह्य सपति से करीबन 42000 किलोमीटर दूर यह बेल्ट रचा हुआ था। प्लूटो की तुलना में नेप्ट्यून के वाले इतने बारीक़ है की पृथ्वी पर  से उसे देखने के लिए  अत्यंत पॉवरफुल टेलेस्कोप की मदद के बिना नहीं   देख सकते।

     नेप्ट्यून  बायो-डेटा ख़त्म करके वॉयेजर आगे बढ़ा। नेप्ट्यून के आठ उपग्रहों में सबसे बड़े titron की और वॉयेजर आगे बढ़ा। इस उपग्रह को 1847 में लेसेल नामक खगोलशास्त्री ने खोज निकाला था लेकिन उसके बाद titron के बारे  में कुछ अभ्यास नहीं हुआ था  . उसके सालो के बाद वॉयेजर के जरिए 40000 किलोमीटर दूर से ही वॉयेजर ने उसका पूरा अभ्यास किया। करीबन 1680 किलोमीटर का व्यास रखने  वाले  titron पर वातावरण के बारे में जब वॉयेजर ने बताया तो खगोलशास्त्री भी आशचर्य चकित हो गए। ज्यादातर नाइट्रोजन और बदलो का बना हुआ titron  का वातावरण उसकी सपाटी से करीबन 800 किलोमीटर ऊंचाई तक है। मतलब , इस  ग्रह का गुरुत्वाकर्षण इतना कमजोर है की उसके वातावरण के वायु को भी खिंच कर नहीं रख सकता। पृथ्वी से 10000 भाग जितना कम है। इसीलिए titron के ऊपर से निकलते वख्त वॉयेजर को उसकी सपति पूर्णत दिखाई  पड़ी। titron की भूमि पर उसको चारो और बर्फ दिखाई दी। सतह का तापमान वॉयेजर ने -235 नॉट किया। बही वॉयेजर को सतह के अंदर से नाइट्रोजन वायु के 8 किलोमीटर ऊँचे फुवारे भी दिखाई पड़े। विसुव्वृत के नजदीक वॉयेजर को हिमवर्ष भी दिखाई  दी , और ग्रह क्र दक्षिण गोलार्ध में ज्वालामुखी भी दिखाई दिया। ज्वालामुखी किस रसायन के है वह यंत्रो से पता नहीं चल पाया फिरभी ठन्डे प्रदेश में ज्वालामुखी हो यह एक आश्चर्यजनक बात है।

    नेप्ट्यून से 354000 किलोमीटर दूर भ्रमणकक्षा में titron 6 दिन में अपनी प्रदक्षिणा पूरी करता है। कद की दृष्टिमे नेप्ट्यून का सबसे बड़ा ग्रह titron ही है। बाकि रह गए 7 ग्रह को खड़क कहे तो कैसा रहेगा , क्योंकि उन सातो में से किसी का भी व्यास 200 से भी ज्यादा नहीं है ,सबसे छोटा उपग्रह मात्र 29 किलोमीटर का व्यास रखता है। और दूसरी तरह देखे तो titron सूर्य का 90% प्रकाश परावर्तित कर देता है। 1847 में इसीलिए खगोलशास्त्री लेसेल को यह दिख गया होगा। बाकि रहे उपग्रह 1989 तक नहीं मिले इन सबको वॉयेजर ने ढूंढ निकाला। आठवे ग्रह नेप्ट्यून के बाद वॉयेजर आगे बढ़ा नव्वे ग्रह प्लूटो की और बढ़ा लेकिन उसके वह पहुंचने से पहले हु प्लूटो बहुत हु दूर निकल चूका था। 1977 लांच किये हुए वॉयेजर की यात्रा अभी भी चालू है  लेकिन वह हम्हारी सौर्यमाला से अबजो किलोमीटर दूर है  और जीवसृष्टि की तलाश कर रहे।  

नौवां ग्रह
Planet Nine
Planet nine artistic plain.png
नौवें ग्रह का काल्पनिक चित्रण
उपसौर1,200 AU (अनुमान)[1]
अपसौर 200 AU (अनुमान)[2]
अर्ध मुख्य अक्ष 700 AU (अनुमान)[3]
विकेन्द्रता 0.6 (अनुमान)[2]
परिक्रमण काल 10,000 से 20,000 वर्ष[2]
झुकाव 30 ° से सूर्यपथ (अनुमान)[2]
उपमन्द कोणांक 150
भौतिक विशेषताएँ
माध्य त्रिज्या 13,000–26,000 km
(8,100–16,000 mi)
पृथ्वी से 2-4 गुना (अनुमान)[2]
द्रव्यमान 6×१०25 kg (est.)[2]
पृथ्वी के द्रव्यमान से ≥10 गुना (अनुमान)
सापेक्ष कांतिमान >22 (अनुमान)[1]

नौवां ग्रह (Planet Nine) एक सम्भावित ग्रह है जो शायद हमारे सौर मंडल के बाहरी भाग में काइपर घेरे से भी आगे स्थित हो। कई खगोलशास्त्रियों ने कुछ वरुण-पार वस्तुओं की विचित्र कक्षाओं (अरबिटों) का अध्ययन कर के यह प्रस्ताव दिया है कि इन कक्षाओं के पीछे सूरज से सुदूर क्षेत्र में परिक्रमा करते हुए एक बड़े आकार के ग्रह का गुरुत्वाकर्षक प्रभाव ही हो सकता है। उनका कहना है कि यह एक महापृथ्वी श्रेणी का ग्रह होगा और इसका द्रव्यमान (मास) हमारी पृथ्वी से लगभग १० गुना अधिक हो सकता है। इसके पास हाइड्रोजन और हीलियम का बना एक घना वायुमंडल हो सकता है और सम्भव है कि यह इतना दूर हो कि इसे सूरज की एक परिक्रमा करने के लिये १५,००० से २०,००० वर्ष लग जाएँ।[4]

चित्रदीर्घा[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Where is Planet Nine Archived 30 जनवरी 2016 at the वेबैक मशीन.?". findplanetnine.com.
  2. Witze, Alexandra (20 January 2016). "Evidence grows for giant planet on fringes of Solar System". Nature 529 (7586): 266–7. doi:10.1038/529266a. PMID 26791699.
  3. Batygin, Konstantin; Brown, Michael E. (20 January 2016). "Evidence for a distant giant planet in the Solar system Archived 30 अगस्त 2019 at the वेबैक मशीन.". The Astronomical Journal 151 (2): 22. doi:10.3847/0004-6256/151/2/22.
  4. "मिलिए नौवें ग्रह से : पृथ्वी से बड़े इस ग्रह की मौजूदगी के सबूत मिले Archived 25 जनवरी 2016 at the वेबैक मशीन.," NDTV इंडिया, जनवरी 22, 2016
  5. Williams, David R. (18 November 2015). "Planetary Fact Sheet - Ratio to Earth". NASA/Goddard Space Flight Center. मूल से 18 जुलाई 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2016-07-18.