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नॉर्वे में 2011 का भयंकर आतंगवादी हमला

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2011 में नॉर्वे में हुए आतंकी हमलों के बाद ओस्लो कैथेड्रल के बाहर फूलों का एक समुद्र उमड़ पड़ा। यह श्रद्धांजलि और एकजुटता का प्रतीक था, जहाँ हज़ारों लोगों ने मौन और प्रेम के साथ पीड़ितों को याद किया। 2011 में नॉर्वे में हुआ हमला एक दोहरी त्रासदी थी, जिसमें ओस्लो में सरकारी मुख्यालय के पास एक बम धमाका और उटोया द्वीप पर गोलीबारी शामिल थी। इस हमले में 77 से ज़्यादा लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश युवा थे, जो एक राजनीतिक शिविर में भाग ले रहे थे। हमलावर, एंडेर्स बेह्रिंग ब्रेविक, ने नफरत और कट्टरपंथी विचारधारा के तहत यह हमले किए।

नॉर्वे में 2011 का भयंकर आतंगवादी हमला देश के इतिहास में द्वीतीय विश्व युद्ध के बाद से सबसे बड़ी मानवता-विरोधी कारवाही थी।

हमले की तारीख

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यह हमले 22 जुलाई 2011 को हुए थे। यह दो बड़े आतंकवादी हमले थे, जिन्हें एंडर्स बेहरिंग ब्रेविक (Anders Behring Breivik) नाम के एक दक्षिणपंथी चरमपंथी ने अंजाम दिया।

पहला हमला: ओस्लो बम धमाका

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  • समय: लगभग दोपहर 3:25 बजे।,
  • स्थान: नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में सरकारी कार्यालयों के पास।
  • विवरण: एक कार बम से धमाका किया गया, जो नॉर्वे के प्रधानमंत्री कार्यालय और अन्य सरकारी भवनों के पास था।
  • मृत्यु: 11 लोग मारे गए, कई घायल।
  • नुकसान: सरकारी इमारतों को गंभीर क्षति।[1] [2] [3]

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दूसरा हमला: यूटोया द्वीप गोलीबारी (Utøya Island Shooting)

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  • समय: लगभग शाम 5:30 बजे
  • स्थान: Utøya द्वीप, जहाँ लेबर पार्टी की युवा शाखा का शिविर चल रहा था।
  • विवरण: ब्रेविक पुलिस की वर्दी में आया और शिविर में शामिल युवाओं पर गोलियां चलाने लगा।
  • मृत्यु: 69 लोग मारे गए, अधिकतर किशोर; 100 से अधिक घायल।
  • हमले की अवधि: पुलिस के आने तक यह हमला एक घंटे से अधिक चला। [5] [6] [7]

हमलावर: एंडर्स बेहरिंग ब्रेविक

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  • हमलावर दक्षिणपंथी चरमपंथी विचारधारा वाला व्यक्ति था।
  • इस्लाम-विरोधी, बहुसंस्कृतिवाद-विरोधी और मार्क्सवाद-विरोधी था।
  • हमले से पहले इसने एक 1,500 पन्नों का घोषणापत्र (Manifesto) ऑनलाइन पोस्ट किया।
  • 2012 में उसे अपराध का दोषी पाया गया और 21 साल की सजा दी गई (नॉर्वे में यह अधिकतम सजा है, जिसे बढ़ाया जा सकता है)[8] [9] [10]

परिणाम और प्रभाव

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  • नॉर्वे और पूरी दुनिया में इस घटना ने गहरा शोक और सदमा पैदा किया।
  • नॉर्वे ने चरमपंथ और सुरक्षा प्रणाली को लेकर अपनी नीतियाँ बदलीं।
  • पीड़ितों के परिजन और बचे हुए लोग लोकतंत्र, सहिष्णुता और खुलेपन के पक्षधर बनकर सामने आए।[11]
  • नॉर्वे के जनसंहारक एंडर्स बेहरिंग ब्रेविक ने भारत के हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन (हिन्दुत्व) की सराहना की और उसे दुनिया भर में लोकतांत्रिक शासन को गिराने के वैश्विक संघर्ष में एक प्रमुख सहयोगी बताया।[12]

सन्दर्भ

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बाहरी कड़ियाँ

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