नैपोलियन तृतीय

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नैपोलियन तृतीय

लुई नैपोलियन् बोनापार्ट (२० अप्रैल, १८०८ - ९ जनवरी, १८७३ ई.) फ्रांसीसी रिपब्लिक का प्रथम राष्ट्रपति तथा नैपोलियन तृतीय के रूप में द्वितीय फ्रांसीसी साम्राज्य का शासक था। वह नैपोलियन प्रथम का भतीजा तथा उत्तराधिकारी था।

परिचय[संपादित करें]

चार्ल्स लूई नेपोलियन बोनापार्ट यूरोप के उन्नीसवीं शताब्दी के शासकों में सबसे अधिक साहसिक और विलक्षण था। यह नैपोलियन महान् के भाई लुई बोनापार्ट तथा नैपोलियन की सौतेली लड़की जोसेफीन की पुत्री हार्टेस ब्यूहारनेइस से पेरिस में १८०८ ई. में उत्पन्न हुआ था। उस समय इसका चाचा नैपोलियन महान् अपने गौरव के शिखर पर था। नैपोलियन के निष्कासन पर लुई नैपोलियन अपनी माँ के साथ स्विट्जरलैंड चला गया। वहीं अपनी मां की देखभाल में इसने शिक्षा पाई। कुछ काल तक यह जर्मनी तथा इटली में भी रहा। लुई नैपोलियन उस वातावरण में शिक्षित एवं दीक्षित हुआ जहाँ उसकी पारिवारिक परंपराएँ फ्रेंच क्रांति एवं राष्ट्रीयता की पर्यायवाची बनीं। फ्रांस से वियना की व्यवस्था को समाप्त कर बोनापार्ट वंशीय शासन स्थापित करना लुई नैपोलियन का जीवन लक्ष्य बना। इटली के क्रांतिकारी दल कारबोनारी के सदस्य की हैसियत से लुई नैपोलियन ने पोप के विरूद्ध चलाऐ गए १८३१ के असफल आंदोलन में भाग लिया। लुई नैपोलियन ने स्ट्रासवर्ग (Strasbourg) के दुर्गरक्षकों द्वारा एक असफल विद्रोह कराया जिसके परिमाणस्वरूप फ्रांस के शासक लुई फिलिप द्वारा उसे अमरीका भेज दिया गया। वहाँ से १८३७ में वह स्विट्जरलैंड लौटा और १८३८ में इंग्लैंड पहुँचा।

सन् १८३९ में लुई नैपोलियन ने एक पुस्तक की रचना की जिसमें नैपोलियन बोनापार्ट के विचारों की व्याख्या करते हुए 'बोनापार्टवाद', समाजवाद तथा शांतिवाद का विचित्र सम्मिश्रण उपस्थित किया गया था। इस रचना के परिणाम स्वरूप सारे फ्रांस में नैपोलियम को लेकर कुछ रुढ़िगत एवं पौराणिक गल्प चलने लगे। नैपोलियन अजेय स्वीकार किया गया और उसकी तथाकथित पराजय शत्रुओं का षड़यंत्र मात्र बतायी गयी। तत्कालीन फ्रेंच शासक लुई फिलिप ने भी औपचारिक रूप से इस तथ्य को संमुख अपनी आस्था प्रकट की तथा अगस्त, १८४० ई. में सेंट हेलेना से नेपोलियन महान की अस्थियाँ मँगवाकर उन्हें पूर्ण पवित्रता के साथ स्थापित किया। इसी समय लुई नैपोलियन बोलोन (Boulogne) में सैनिक विद्रोह कराने में असफल हुआ और बंदी बनाकर हैग के किले में बंद कर दिया गया। कारागार में लुई ने राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर कुछ पुस्तकें लिखीं। छ: वर्ष के उपरांत १८४६ में वह किसी प्रकार से निकल भाषा और लंदन में शरण ली।

१८४८ की फ्रेंच क्रांति में इसे अपने लक्ष्य तक पहुँचने का अवसर मिला। इस बार उसने मौन ग्रहण करना ही श्रेयस्कर समझा तथा इंगलैंड के निवासियों के संमुख विधान और व्यवस्था की शपथ खाई। सितंबर १८४८ ई. में वह पाँच डिपार्टमेंट से नेशनल विधान परिषद का सदस्य हुआ तथा अगले दिसंबर में एक बहुसंख्यक मत के साथ वह नई गणतंत्रीय व्यवस्था का अध्यक्ष बना। अब धीरे धीरे नैपोलियन ने सेना के नेताओं को अपनी ओर आकर्षित करना प्रारंभ किया तथा २ दिसंबर १८५१ ई. में माँरनी (Morny), सेंट आरनाड (Saint Arnaud) सरीखे मंत्रियों तथा पुलिस प्रमुख मॉपास (Maupas) की सहायता से एक षड़यंत्र कर शासनसत्ता हथिया ली और ठीक एक वर्ष बाद स्वयं को नैपोलियन तृतीय के नाम से फ्रांस का सम्राट घोषित किया।

नैपोलियन की गार्हस्थिक नीति का उद्देश्य फ्रांस को धनधान्य से समृद्धशाली बनाना था। उसने आर्थिक उदारता का सिंद्धांत अपनाया, लुई फिलिप के सभी मध्यम वर्गीय सुधारों को अपना योगदान दिया, वैयक्तिक उद्योगों एवं व्यवसाओं से सारे नियंत्रण हटा लिए और उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में मशीनों का प्रयोग तथा औद्योगिक कारपोरेशन की स्थापना को बढ़ावा दिया। क्रेडिट लियानेस (CreditLyonnais) क्रेडिट-फानसियर (Credit foncier) तथा सोसाइटी जनरल (Societe Generale) ऐसी ऐजेंसीज़ की स्थापना कर उसने फ्रांस की राष्ट्रीय पूँजी बढ़ायी। १८५५ और १८६७ की औद्योगिक प्रदर्शनी इस बात का साक्ष्य देती थी कि नैपोलियन के तत्वावधान में फ्रांस की कितनी भौतिक समृद्धि हुई।

किंतु अपनी वैदेशिक नीति में लुई नैपोलियन ने नैपोलियन महान् की भाँति कुछ ऐसी साहसिक छलांगे लीं जिनके परिणाम स्वरूप उसका पतन हुआ तथा यूरोपीय राष्ट्र उसे भी नैपोलियन महान की ही भाँति स्वातंत्र्य अपहरण करनेवाला समझने लगे। क्रीमिया के युद्ध में उसने ब्रिटेन के साथ रूस के विरुद्ध तुर्की साम्राज़्य की सहायता कर फ्रांस की वैदेशिक प्रतिष्ठा बढ़ायी। इटली के एकीकरण में कावूर (Cavour) का समर्थन किया तथा सैवाय (Savoy) और नीस (ग़्त्ड़ड्ढ) के प्रदेश प्राप्त किए किंतु कावूर की मंजिल आधी ही पार हुई थी कि इसने उसे संधि के लिए विवश किया। परिणाम स्वरूप यूरोप में इसे विश्वासघाती और प्रतिक्रियावादी समझा गया। जब बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया को परास्त कर दिया तो नैपोलियन इसे अपनी ही पराजय समझ बैठा। अतएव बिस्मार्क की गणना में जर्मनी का एकीकरण फ्राँस को खदेड़ देने में ही पूर्णत्व को पहुँचता था। लुई नैपोलियन ने बिस्मार्क से अंतत: युद्ध छोड़ ही दिया और १८७१ के सीडन (Sedan) के युद्ध क्षेत्र में उसे बिस्मार्क के सामने नत होना पड़ा और फ्रांस में तृतीय गणतंत्र की स्थापना हुई। लुई नैपोलियन ने ब्रिटेन के साथ ओपीयम (opium) युद्ध में भाग लेकर (१८५८ से ६०) सुदूर पूर्व चीन में फ्रेंच प्रभुत्व स्थापित किया और कंबोडिया में फ्रेंच प्रोटेक्टोरेट (French Protectorate) बनाया। लुई नैपोलियन का मेक्सिको अभियान यद्यपि फ्रेंच प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करने का उपक्रम था किंतु इसमें भी नेपोलियन को लज्जित होना पड़ा।