निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम

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निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (निबीप्रगानि / Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation) भारत का एक सार्वजनिक प्राधिकरण है। यह भारतीय रिज़र्व बैंक की सम्पूर्ण स्वामित्व वाला सहयोगी संगठन है। यह परिसमापनाधीन बीमाकृत बैंकों के जमाकर्तांओं के दावों के निपटान से संबंधित कार्यपध्दति में अतिरिक्त आशोधन करता है।

निगम का प्रधान कार्याल मुंबई में है। एक कार्यपालक निदेशक/मुख्य महाप्रबंधक इसके वरिष्ठ अधिकारियों के समग्र दैनंदिन कार्यों के लिए प्रभारी अधिकारी है। निगम की चार शाखाएं हैं - कोलकाता, चेन्नई, नागपुर और नई दिल्ली। इनमें से कोलकाता, चेन्नई और नागपुर स्थित शाखाएं 30 नवम्बर 2006 से बंद कर दी गयी है चूंकि लगभग सभी बैंकों ने ऋण गारंटी योजना से बाहर निकल गए और कई लंबित दावों का निपटान कर दिया गया। जबकि, इन तीनों शखाओं के प्रमुख कार्य मदों को निगम के मुख्य कार्यालय द्वारा किया जा रहा है कुछ अवशेष कार्य मद निबीप्रगानि के कक्ष के पास हैं जिन्हें विशेष रूप से भारत्यी रिज़र्व बैंक के ग्रामीण आयोजना और ऋण गारंटी निगम के संबंधित केंद्रों में स्थापित किया गया है।

विधि संरचना/उद्देश्य[संपादित करें]

निबीप्रगानि के कार्य 'निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961' (निबीप्रगानि अधिनियम) और निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम सामान्य नियमावली, 1961 के प्रावधानों के जरिए नियंत्रित है जिन्हें उक्त अधिनियम की धारा 50 की उप - धारा (3) द्वारा प्रदत्त अधिकारियों के प्रयोग से रिज़र्व बैंक द्वारा तैयार किया गया है।

निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961 की प्रस्तावना में यह उल्लिखित है कि यह ऐसा अधिनियम है जिसे किसी निगम के प्रतिष्ठान को ज़माराशियों के बीमा और ऋण सुविधाओं के बीमा तथा तत्संबधी अन्य मामलों या उसके प्रासंगिक के लिए उपलब्ध कराया गया है।

संगठन और कार्यपद्धति[संपादित करें]

निगम का प्राधिकृत पूंजी 50 करोड़ है जो पूर्णत: भारतीय रिज़र्व बैंक (भारिबैं) द्वारा जारी और अभिदत्त है। निगम का प्रबंधन निदेशक बोर्ड के पास है जिसमें भारिबैं का उप गवर्नर अध्यक्ष है। निबीप्रगानि अधिनियम के अनुसार बोर्ड में अध्यक्ष के अलावा निम्न शामिल होने चाहिए-

i) भारिबैं का एक अधिकारी (सामान्यत: कार्यपालक निदेशक के स्तर का)

ii) केंद्र सरकारा का एक अधिकरी

iii) भारिबैं के परामर्श से केंद्र सरकार द्वारा नामित पांच निदेशक जिनमें से तीन ऐसे जो वाणिज्य बैंकिंग, बीमा, वाणिज्य, उद्योग, वित्त की विशेष जानकार हों और दो सहकारी बैंकिंग या सहकारी आंदोलन की विशेष जानकार या अनुभवी हो और कोई भी केंद्र सरकार या भारिबैं के कर्मचारी या निगम या किसी बैंकिंग कंपनी या सहकारी बैंक के कर्मचारी हों अथवा अन्यथा किसी बैंकिंग कंपनी या सहकारी बैंक के साथ सक्रिय रूप से संबद्ध हो और

iv) भारिबैं के परामर्श से केंद्र सरकार द्वारा नामित चार निदेशक जो लेखा, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बैंकिंग, सहकारिता, अर्थ शास्त्र, वित्त, विधि या लषु उद्योग या कोई अन्य मामला जिसे निगम के लिए उपयोगी समझा जाए के जानकर हों।

इतिहास[संपादित करें]

1948 में बंगाल में बैंकिंग संकट के बाद पहली बार बैंक में रखी गयी जमाराशियों का बीमा कराने की संकल्पना पर विशेष ध्यान दिया गया। 1949 में इस विषय पर पुनः विचार किया गया परंतु बैंकों का निरीक्षण करने हेतु रिज़र्व बैंक द्वारा पर्याप्त व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने तक इसे आस्थगित रखा गया। बाद में 1950 में ग्रामीण बैंकिंग जांच समिति ने भी इस संकल्पना का समर्थन किया। तथापि, 1960 में पलाइ सेंट्रल बैंक लिमि. और लक्ष्मी बैंक लिमि. के विफल हो जाने के बाद रिज़र्व बैंक और केंद्र सरकार द्वारा जमाराशियों का बीमा करने के संबंध में गंभीरतापूर्वक विचार किया गया। 21 अगस्त 1961 को संसद में निक्षेप बीमा निगम (डीआइसी) बिल प्रस्तुत किया गया। संसद द्वारा इसे पारित किये जाने के बाद 7 दिसम्बर 1961 में इस बिल को राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हुई और 1 जनवरी 1962 से निक्षेप बीमा अधिनियम, 1961 लागू हुआ।

प्रारंभ में जमा बीमा स्कीम मात्र कार्यकारी वाणिज्य बैंकों तक ही लागू की गयी। इसमें भारतीय स्टेट बैंक तथा इसके सहायक बैंक और अन्य वाणिज्य बैंक एवं भारत में कार्यरत विदेशी बैंकों की शाखाएं सम्मिलित थीं।

निक्षेप बीमा निगम (संशोधन) अधिनियम, 1968 के अधिनियमन के बाद निगम से यह अपेक्षित था कि वह अधिनियम की धारा 13ए के प्रावधानों के अंतर्गत ' पात्र सहकारी बैंकों ' को बीमाकृत बैंकों के रूप में पंजीकृत करें। ऐसे राज्य में जहां पात्र सहकारी बैंक वह है (चाहे वह राज्य सहकारी बैंक हो या मध्यवर्ती सहकारी बैंक हो), निबीप्रगानि अधिनियम, 1961 की अपेक्षानुसार अपने सहकारी समिति अधिनियम में इस आशय से संशोधित करते हुए समर्थकारी कानून पारित किया है ¹ˆÅ राज्य सरकार रिज़र्व बैंक को यह अधिकार दे सके कि राज्यों /संघ शासित क्षेत्रों की समितियों के रजिस्ट्रार को वह यह आदेश दे सके कि किसी सहकारी बैंक का समापन कर दे अथवा इसके प्रबंध समिति को अधिक्रमित करे और रजिस्ट्रार से अपेक्षित है कि वह रिज़र्व बैंक से लिखित पूर्व स्वीकृति के बिना किसी सहकारी बैंक के समापन, समामेलन या पुनर्निमाण के लिए कोई कार्रवाई न करें।

इसके अतिरिक्त भारत सरकर ने रिज़र्व बैंक के परामर्श से जुलाई 1960 में एक ऋण गारंटी योजना तैयार की। भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 17(11ए) (ए) के अंतर्गत केंद्र सरकार के एजेंट के रूप में स्कीम का संचालन रिज़र्व बैंक को सौपा गया तथा बैंकों और अन्य ऋण संस्थाओं द्वारा लघु उद्योगों को स्वीकृत अग्रिमों को गारंटी प्रदान करने हेतु ऋण गारंटी संगठन (सीजीओ) के रूप में प्राधिकृत किया गया। रिज़र्व बैंक ने 31 मार्च 1981 तक स्कीम का परिचालन किया।

रिज़र्व बैंक ने 14 जनवरी 1971 को भारतीय ऋण गारंटी निगम (सीजीआइसी) नामक एक पब्लिक लिमि., कंपनी भी प्रारंभ किया। भारतीय ऋण गारंटी निगम लिमि., द्वारा प्रारंभ की गयी ऋण गारंटी स्कीमों का प्रधान उद्देश्य था प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र के अंतर्गत शामिल लघु और जरूरतमंद उधारकर्ताओं को ऋण संस्थाओं द्वारा स्वीकृत ऋणों और अग्रिमों को गारंटी सुरक्षा प्रदान कर, अब तक उपेक्षित क्षेत्रों विशेषकर, उद्योगेतर क्रियाकलापों से संबध्द समाज के कमजोर वर्गें की ऋण आवश्यकताओं को पूरा (प्रदान) करने हेतु प्रोत्साहित करना। जमा बीमा और ऋण गारंटी के कार्यों को समेकित करने के उद्देश्य से उपर्युक्त दोनों संगठनों (डीआइसी और सीजीसीआइ) के विलय से 15 जुलाई 1978 के निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अस्तित्व में आया। इसके परिणामस्वरूप जमा बीमा अधिनियम, 1961 का नाम बदलकर "निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961" कर दिया गया।

1 अप्रैल 1981 से निगम ने भारत सरकार की ऋण गारंटी स्कीम के रद्द हो जाने के बाद लघु उद्योगों को स्वीकृत ऋण को भी गारंटी प्रदान की। भार्तीय रिजर्व बैंक की परिभाषा के अनुसार 1 अप्रैल 1989 से समग्र प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र को भी गारंटी सुरक्षा प्रदान की जाने लगी। दिनांक 1 अप्रैल 1995 से सभी आवास ऋणों को निगम की गारंटी सुरक्षा की परिधि से निकाल दिया गया।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]