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निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम

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निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम
संस्था अवलोकन
स्थापना1978; 48 वर्ष पूर्व (1978)
अधिकार क्षेत्रभारतीय रिज़र्व बैंक, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार
मुख्यालयमुंबई, भारत
संस्था कार्यपालकएम. डी. पात्र, भारतीय रिज़र्व बैंक के उप-गवर्नर
वेबसाइट
www.dicgc.org.in

निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (DICGC) भारतीय रिज़र्व बैंक का एक विशेषीकृत प्रभाग (Specialised Division) है, जो भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत कार्य करता है। इसकी स्थापना **15 जुलाई 1978** को ‘‘निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961’’ के अंतर्गत की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य बैंकों में जमा धन का बीमा करना और ऋण सुविधाओं की गारंटी देना है।

DICGC सभी प्रकार की बैंक जमा राशि — जैसे बचत खाता, सावधि जमा, चालू खाता, आवर्ती जमा आदि — का बीमा करती है। प्रत्येक जमाकर्ता को एक बैंक में कुल **₹5,00,000 (पाँच लाख रुपये)** तक की सुरक्षा प्राप्त होती है। यह सीमा **1 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये** की गई थी (4 फरवरी 2020 को)।[1][2]

सांख्यिकी

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जमा बीमा सीमा (Deposit Insurance Limit)[3]
वर्ष सीमा (₹)
1 जनवरी 1962 1500
1 जनवरी 1968 5000
1 अप्रैल 1970 10000
1 जनवरी 1976 20000
1 जुलाई 1980 30000
1 मई 1993 100000
4 फरवरी 2020 500000
प्रत्येक ₹100 जमा पर बीमा प्रीमियम
वर्ष राशि (₹)
1 जनवरी 1962 0.05
1 अक्टूबर 1971 0.04
1 जुलाई 1993 0.05
1 अप्रैल 2004 0.08
1 अप्रैल 2005 0.10
1 अप्रैल 2020 0.12

कार्य और शक्तियाँ

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निगम के कार्य ‘‘निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961’’ तथा ‘‘निगम सामान्य विनियम, 1961’’ के अंतर्गत निर्धारित हैं। यह नियम भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा अधिनियम की धारा 50(3) के तहत बनाए गए हैं। निगम प्रत्येक जमाकर्ता के मूलधन एवं ब्याज सहित कुल ₹5,00,000 तक की राशि का बीमा करता है। यदि किसी ग्राहक के एक ही बैंक की विभिन्न शाखाओं में खाते हैं, तो सभी खातों की राशि को मिलाकर कुल ₹5,00,000 तक का बीमा किया जाता है।[4]

बीमा प्रीमियम बैंक स्वयं DICGC को चुकाते हैं, इसलिए जमाकर्ता से कोई शुल्क नहीं लिया जाता। यदि कोई बैंक लगातार तीन अर्धवार्षिक अवधियों तक प्रीमियम का भुगतान नहीं करता, तो निगम उसकी पंजीकरण रद्द कर सकता है। बैंक द्वारा बकाया प्रीमियम और ब्याज चुका देने पर पंजीकरण पुनः बहाल किया जा सकता है।

सुधार और नीतिगत परिवर्तन

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भारत सरकार ने **वित्त मंत्रालय** के माध्यम से **वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (FSLRC)** का गठन 24 मार्च 2011 को किया था, ताकि भारत के वित्तीय क्षेत्र की कानूनी और संस्थागत संरचना का पुनर्लेखन किया जा सके। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सात नियामक संस्थाओं की सिफारिश की थी, जिनमें एक **निक्षेप बीमा एवं समाधान निगम (Resolution Corporation)** भी शामिल था, जो वर्तमान DICGC का स्थान ले सकता है।

यह प्रस्ताव एकीकृत समाधान निगम (Unified Resolution Corporation) का सुझाव देता है जो बैंकों, बीमा कंपनियों, पेंशन फंडों और भुगतान प्रणालियों जैसे संस्थानों की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करे।

भारत सरकार ने इन सुधारों को लागू करने के लिए **वित्तीय समाधान और निक्षेप बीमा विधेयक, 2017 (FRDI Bill)** संसद के मानसून सत्र, 2017 में पेश किया था।[5]

हालाँकि, इस विधेयक को लेकर कुछ चिंताएँ भी उठाई गईं, जैसे:

  1. विधेयक में यह स्पष्ट नहीं था कि किसी बैंक के बंद होने पर जमाकर्ताओं को कितनी राशि दी जाएगी।
  2. "बेल-इन" (Bail-in) प्रावधान जमाकर्ताओं के हितों के विरुद्ध माना गया।[6]

अन्य तथ्य

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  • DICGC का मुख्यालय मुंबई में है।
  • यह भारतीय रिज़र्व बैंक की **पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक इकाई** है।
  • इसका प्रशासनिक नियंत्रण भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधीन है।
  • निगम का उद्देश्य जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना और बैंकिंग प्रणाली में विश्वास बनाए रखना है।

बाहरी कड़ियाँ

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  1. सुब्रत पांडा (2 फरवरी 2020). "Budget 2020: Govt increases deposit insurance to ₹5 lakh". बिज़नेस स्टैंडर्ड.
  2. "DICGC - About Us - Profile". DICGC. मूल से से 16 अप्रैल 2021 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 4 नवंबर 2025.
  3. "Deposit Insurance of ₹5 Lakh: Customers to Get Money in 90 Days".
  4. "DICGC_Flyer.pdf" (PDF). DICGC. p. 3. मूल से (PDF) से 1 जून 2024 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 4 नवंबर 2025.
  5. "वित्तीय समाधान और निक्षेप बीमा विधेयक, 2017". PRS इंडिया. मूल से से 6 जनवरी 2018 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 4 नवंबर 2025.
  6. "FRDI विधेयक और जमाकर्ताओं की चिंताएँ". द हिन्दू. 29 नवम्बर 2017.