नारायण दत्त श्रीमाली

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Dr. Narayan Dutt Shrimali

डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली (परमहंस निखिलेश्वरानन्द) (1935 – 1998, जोधपुर) शिक्षक और ज्योतिषी थे। उन्होंने विभिन्न विषयों पर ३०० से अधिक पुस्तकें लिखी।[1]

जन्म : 21 अप्रैल 1935

नाम : डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली

सन्यासी नाम : परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद

जन्म स्थान : खरन्टिया

पिता : पंडित मुल्तान चन्द्र श्रीमाली

शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी) राजस्थान विश्वविद्यालय 1963.

पी.एच.डी. (हिन्दी) जोधपुर विश्वविद्यालय 1965

योग्यता क्षेत्र :

आपने प्राच्य विद्याओं दर्शन, मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान, आयुर्वेद, योग, ध्यान, सम्मोहन विज्ञानं एवं अन्य रहस्यमयी विद्याओं के क्षेत्र में विशेष रूचि रखते हुए उनके पुनर्स्थापन में विशेष कार्य किया हैं. आपने लगभग सौ से ज्यादा ग्रन्थ – मन्त्र – तंत्र, सम्मोहन, योग, आयुर्वेद,

ज्योतिष एवं अन्य विधाओं पर लिखे हैं.

चर्चित कृतियाँ :

प्रैक्टिकल हिप्नोटिज्म, मन्त्र रहस्य, तांत्रिक सिद्धियाँ, वृहद हस्तरेखा शास्त्र, श्मशान भैरवी (उपन्यास), हिमालय के योगियों की गुप्त सिद्धियाँ, गोपनीय दुर्लभ मंत्रों के रहस्य, तंत्र साधनायें.

अन्य :

कुण्डलिनी नाद ब्रह्म, फिर दूर कहीं पायल खनकी, ध्यान, धरना और समाधी, क्रिया योग, हिमालय का सिद्धयोगी, गुरु रहस्य, सूर्य सिद्धांत, स्वर्ण तन्त्रं आदि.

सम्मान एवं पारितोषिक :

भारतीय प्राच्य विद्याओं मन्त्र, तंत्र, यंत्र, योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में अनेक उपाधि एवं अलंकारों से आपका सम्मान हुआ हैं. पराविज्ञान परिषद् वाराणसी में सन् 1987 में आपको “तंत्र – शिरोमणि” उपाधि से विभूषित किया हैं. मन्त्र – संसथान उज्जैन में 1988 में आपको मन्त्र – शिरोमणि उपाधि से अलंकृत किया हैं. भूतपूर्व उपराष्ट्रपति डॉ. बी.डी. जत्ती ने सन् 1982 में आपको महा महोपाध्याय की उपाधि से सम्मानित किया हैं.

उपराष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने 1989 में समाज शिरोमणि की उपाधि प्रदान कर उपराष्ट्रपति भवन में डॉ. श्रीमाली का सम्मान कर गौरवान्वित किया हैं. नेपाल के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री भट्टराई ने 1991 में उनके सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों में विशेष योगदान के लिए नेपाल में आपको सम्मानित किया हैं.

अध्यक्षता :

भारत की राजधानी दिल्ली में आयोजित होने वाली विश्व ज्योतिष सम्मलेन 1971 में आपने कई देशों के प्रतिनिधियों के बीच अध्यक्ष पद सुशोभित किया. सन् 1981 से अब तक अधिकांश अखिल भारतीय ज्योतिष सम्मेलनों के अध्यक्ष रहे.

संस्थापक एवं संरक्षक : अखिल भारतीय सिद्धाश्रम साधक परिवार. संस्थापक एवं संरक्षक – डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली फौंडेशन चेरिटेबल ट्रस्ट सोसायटी.

विशेष योगदान :

सम्मलेन, सेमिनार एवं अभिभाषणों के सन्दर्भ में आप विश्व के लगभग सभी देशों की यात्रा कर चुके हैं. आपने तीर्थ स्थानों एवं भारत के विशिष्ट पूजा स्थलों पर आध्यात्मिक एवं धार्मिक द्रष्टिकोण से विशेष कार्य संपन्न किये हैं. उनके एतिहासिक एवं धार्मिक महत्वपूर्ण द्रष्टिकोण को प्रामाणिकता के साथ पुनर्स्थापित किया हैं. सभी 108 उपनिषदों पर आपने कार्य किया हैं, उनके गहन दर्शन एवं ज्ञान को सरल भाषा में प्रस्तुत कर जन सामान्य के लिए विशेष योगदान दिया हैं. अब 23 उपनिषदों का प्रकाशन हो रहा हैं. मन्त्र के क्षेत्र में आप एक स्तम्भ के रूप में जाने जाते हैं, तंत्र जैसी लुप्त हुयी गोपनीय विद्याओं को डॉ. श्रीमाली जी ने सर्वग्राह्य बनाया हैं. आपने अपने जीवन में कई तांत्रिक, मान्त्रिक सम्मेलनों की अध्यक्षता की हैं. भारत की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में 40 से भी अधिक शोध लेख मंत्रों के प्रभाव एवं प्रामाणिकता पर प्रकाशित कर चुके हैं.

आप पुरे विश्व में अभी तक कई स्थानों पर यज्ञ करा चुके हैं, जो विश्व बंधुत्व एवं विश्व शांति की दिशा में अद्वितीय कार्य हैं. योग, मन्त्र, तंत्र, यंत्र, आयुर्वेद विद्याओं के नाम से अभी तक सैकडो साधना शिविर आपके दिशा निर्देश में संपन्न हो चुके हैं.

आध्यात्मिक कार्यकलाप :

आपका जीवन है, एक अति साधारण व्यक्ति की असाधारण जीवन गाथा. शायद ही अध्यात्म का कोई ऐसा क्षेत्र हो, कोई ऐसी गूढ़ विद्या हो, जो आपके अछूता रहा हो. एक पूर्ण व्यक्तित्व. केवल एक ही जीवन में इतनी विविधतायों का समावेश, आज आपके निर्वाण के कई दशक पश्चात भी साधक समाज को अचंभित करती है. भारतीय अध्यात्म का क्षेत्र बहुआयामी है - भक्ति, पूजन, कीर्तन, योग, ध्यान, जप-तप, हवन-यज्ञ और न जाने कितने ही मार्ग संतों एवं सिद्धों ने प्रतिपादित किये हैं. इस कलिकाल में उनके प्रति जन जाग्रति फैलाना निश्चित रूप के कठिन कार्य है, परन्तु, यदि कोई ऐसा मार्ग हो जिसपर चलने से सिद्धगण भी कतरायें और जिसकी पूर्व-योग्यता का स्तर अत्यंत कष्ट-साध्य हो, तो वह पथ हैं - "तंत्र". उस मार्ग की इन सभी विषमतायों की उपेक्षा करते हुए, उन तंत्र विद्याओं को लुप्तता की कोख से उद्धार करने हेतु आपने अपना सर्वस्व अर्पण किया. तंत्र मार्ग को लोक-भोग्य बनाकर उससे सम्बंधित कुप्रथायों का आपने उन्मूलन किया. अनेकों शिष्य आपकी प्रेरणा से शुद्ध तंत्र की ओर अग्रसर हुए. यद्यपि इस कार्य को सार्थक करने हेतु आपको व्यक्तिगत एवं सामाजिक परिपेक्ष में कई कर्म यातनाएं भोगनी पड़ी, परन्तु कोई भी परिस्थिति आपके संकल्प तो ध्वस्त न कर सकी. आज कई उत्कृष्ट साधक आपके उस मशाल को लिए, समाज में 'व्यक्तिक साधना' के मर्म को प्रतिपादित करने में जूटे हैं.

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Death of renowned astrologer mourned" [प्रसिद्ध ज्योतिषी की मौत] (अंग्रेज़ी में). द इण्डियन एक्सप्रेस. 13 जुलाई 1998. अभिगमन तिथि २० नवम्बर २०१३.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

1. दूरदर्शन के साथ ऐतिहासिक भेंटवार्ता "https://www.youtube.com/watch?v=AFtltCui2Hs"

2. उप-राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा द्वारा सम्मानित "https://www.youtube.com/watch?v=dlJwvloj_8o"