नागदेवता

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सर्प जाति पृथ्वी पर हर जगह मौजूद है। सागर से लेकर रेगिस्तान तक और पर्वत से लेकर मैदानों तक। इस तरह यह प्रकृति और मानव के संबंधों की अहम कड़ी है। हिन्दू धर्मग्रंथों में भी नाग जाति का संबंध अनेक रुपों में अलग-अलग देवी-देवताओं से बताया गया है। इसलिए भी नाग जाति का बहुत धार्मिक महत्व है। पुराण और शास्त्रों के अनुसार अलग-अलग युग और काल में नाग वंश अनेक रुपों में आया है:

  • पुराणों में लिखा है कि समुद्र-मंथन में वासुकी नाग को मंदराचल पर्वत के आस-पास लपेटकर रस्सी की तरह उपयोग किया गया।
  • भगवान शंकर को नाग देवता बताया गया है। उनके पूरे शरीर पर ही नागों का वास माना गया है। जैसे गले में नागों का हार, कानों में नाग कुण्डल, सिर पर नाग मुकूट और कमर व छाती पर भी नाग ही शोभा बढ़ाते हैं। शिव की स्तुति शिवाष्टक में भी वर्णन है कि: "गले रुंडमालम तनौ सर्पजालं" जिसका मतलब है शंकर का पूरा शरीर सांपों के जाल से ढंका है।
  • इसी प्रकार भगवान विष्णु शेषनाग द्वारा बनाई गई सांप की शैय्या पर शयन करते हैं। भगवान विष्णु के ध्यान मंत्र में यही बोला जाता है कि: "शांताकारम भुजग शयनं पद्मनाभं सुरेशं".
  • रामायण में विष्णु अवतार भगवान श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण और महाभारत में श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम को शेषनाग का अवतार बताया गया है।
  • रामायण में सुरसा राक्षसी नागों की माता बताई गई है। इसी प्रकार महाभारत में अर्जुन द्वारा नागकन्या उलूपी से विवाह का प्रसंग मिलता है।
  • दधीची ऋषि की अस्थियों से बने अस्त्र से इन्द्र के हाथों मारा गया वृत्तासुर भी नागराज ही था।
  • वेदों में सांप का नाम अहि मिलता है। इसके अलावा अनेक रुपों में नाग जाति के बारे में लिखा गया है।