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नन्दिकेश्वर

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नंदिकेश्वर प्राचीन भारत के महान नाट्य-सिद्धान्तकार थे। उन्होने अभिनयदर्पण सहित अनेक ग्रन्थों की रचना की।

आचार्य नन्दिकेश्वर भारत की गौरवशालिनी परम्परा के उज्ज्वल रत्न हैं। वे मीमांसा, योग, तन्त्र, शैवदर्शन, कामशास्त्र, नाट्यशास्त्र एवं संगीतशास्त्र के बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न आचार्य थे । उन्हें शिव का अवतार भी कहा गया है । वे शिव के प्रमुख गण एवं नाट्याचार्य भरत के उपाध्याय थे । उन्होंने कामशास्त्र, नाट्यशास्त्र, दर्शनशास्त्र, अभिनय, नृत्य एवं संगीतकला पर ग्रंथ लिखकर अपने रचना-कौशल एवं प्रखर पाण्डित्य से संस्कृत-वाङ्मय को गौरवान्वित किया है । उनके रसशास्त्र विषयक एक ग्रन्थ के अस्तित्व का भी पता चला है। उनकी विशाल ज्ञानराशि, विविधता, एवं मौलिकता ही उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण है । वे नाट्य, नृत्य, संगीत, दर्शन, एवं रसशास्त्र के आचार्य के रूप में विख्यात हैं । उन्होने नाट्यकला एवं संगीतकला को शास्त्र का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक रूप दिया है।[1]

अभिनयदर्पण, भरतार्णव, नन्दिकेश्वरकारिका एवं अन्य नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों मे नन्दिकेश्वर का जो इतिवृत्त प्राप्त होता है तदनुसार उनका व्यक्तित्व कुछ पौराणिक-सा लगता है। वहां वे ब्रह्मा, शिव, पार्वती, इन्द्र, नारद आदि देवताओं के समकालीन कहे गये है ओर वहाँ उन्हें शिव का पार्षंद कहा गया है। नाट्यकला एवं संगीतकला में तो वे पारंगत ही थे, साथ ही अन्य अनेक शास्त्रों के भी ज्ञाता थे। नाट्यशास्त्र में उन्हे भरत का शिक्षक बताया गया है और कामसूत्र में कामशास्त्र का प्रवक्ता कहा गया है। काव्यमीमांसा मे उन्हें रसशास्त्र का आधिकारिक विद्वान्‌ के रूप में स्मृत किया गया है । संस्कृत वाङ्मय मे नन्दिकेश्वर के कई नाम उपलब्ध हैं- (१) नन्दिकेश्ववर (२) नन्दिकेशान (३) नन्दिकेश (४) नन्दीश्वर (५) नन्दीश (६) नन्दिन्‌ (७) नन्दी (८) लादि (९) नन्दिभरत (१०) तण्ड़

नन्दिकेश्व का समय

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संस्कत वाङ्मय के प्राचीन आचार्यो, लेखकों तथा कवियों की यह धारणा रही है कि वे अपनी रचनाओं में अथवा अन्यत्र अपने जीवनवृत्त एवं समय के सम्बन्ध में कुछ भी परिचय देने मे प्रायः उदासीन रहा करते थे। इसी कारण उनके समय आदि निश्चय करनेमे लेखकों को बड़ी कठिनाई होती है। आचार्य नन्दिकेश्वर के स्थितिकाल के सम्बन्ध में भी यही स्थिति रही है । उन्होने अपने ग्रन्थों मे अपने जन्म समय के विषय में कुछ भी उल्लेख नहीं किया है ।

नन्दिकेश्वर ने अपने ग्रन्थो मे विविध विषयों के विवेचना के सन्दर्भ में प्राचीनकाल के अनेक आचार्यों एवं ग्रन्थों का उल्लेख क्रिया है। नाट्योत्पत्ति के प्रसंग मे भरत, हस्ताभिनय के सम्बन्ध में वृहस्पति, नानार्थ हस्तप्रकरण में पार्वती, ताण्डवनृत्य एवं श्चङ्कनाट्य के सन्दभं मे शिव, पुष्पाञ्जलिविधि के विसर्जन विधि मे सदाशिव, सप्तलास्य प्रकरण में याज्ञवल्क्य, पुष्पाञ्जलिविधि के प्रकरण मे नारद, एवं तुम्बुरु, अनेक स्थलों पर सुमति, तथा नानार्थहस्तप्रकरण में भरत का उल्ल्लेख मिलता है। इन प्राचीन आचार्यो एवं ग्रन्थों के नामोल्लेख से इतना तो निश्चित है कि ये सब आचार्यं नन्दिकेश्वर से पहले हुए या उनके समकालीन रहे हैं। इससे उन प्राचीन आचार्यो के साथ-साथ नन्दिकेश्वर के प्राचीन होने का स्पष्ट संकेत मिलता है।

अभिनयदर्पण के श्लोक संख्या ३७ में नन्दिकेश्वर कहते हैं-

यतो हस्ताः ततो दृष्टिः
यतो दृष्टिः ततो मनः
यतो मनः ततो भावो
यतो भावो ततो रसः॥
( जहाँ हाथ होते हैं वहाँ दृष्टि होती है, जहाँ दृष्टि होती है वहाँ मन होता है, जहाँ मन होता है वहाँ भाव होता है, जहाँ भाव होता है वहँ रस होता है।)

सन्दर्भ

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  1. आचार्य नन्दिकेश्वर और उनका साहित्य (गूगल पुस्तक ; लेखक- पारसनाथ द्विवेदी)

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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