नदी घाटी परियोजनाएँ

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[1]नदियों की घाटियो पर बडे-बडे बाँध बनाकर ऊर्जा, सिंचाई, पर्यटन स्थलों की सुविधाएं प्राप्त की जातीं हैं। इसीलिए इन्हें बहूद्देशीय (बहु + उद्देश्यीय) परियोजना कहते हैं। नदीघाटी योजना का प्राथमिक उद्देश्य होता है, किसी नदीघाटी के अंतर्गत जल और थल का मानवहितार्थ पूर्ण उपयोग।

इतिहास[संपादित करें]

नदीघाटी योजनाओं के बारे में सोचते समय सबसे पहले संयुक्त राज्य, अमरीका, की टैनेसी घाटी योजना का ध्यान आता है। आयोजित रूप में नदीघाटी की एक इकाई मानकर यह संसार में पहली बड़ी योजना थी। वास्तव में कोई भी नदी, अपने उद्गम से लेकर जहाँ वह समुद्र या किसी दूसरी नदी में मिलती है वहाँ तक एक प्राकृतिक इकाई होती है। बहुधा बड़ी नदियों के संदर्भ में यह प्राकृतिक इकाई विभिन्न राजनीतिक इकाइयों में बँट जाती है और इकाई रूप से नदीघाटी योजना बनाना एक जटिल प्रश्न बन जाता है।

टेनेसी घाटी की योजना का सूत्रपात १९३३ ई. में 'टेनेसी घाटी ऑथॉरिटी ऐक्ट' द्वारा हुआ। इसको संक्षिप्त रूप से टी. वी. ए. (T. V. A.) भी कहते हैं। टी.वी.ए. का मुख्य ध्येय टेनेसी घाटी में सारे जल और थल का नियंत्रित रूप से उपयोग संभव करना और उन्हें समाज के लिए लाभप्रद बनाना था।

टी.वी.ए. के कुछ कुछ अनुकूल भारतीय संसद ने भी दामोदर घाटी कारपोरेशन के बारे में विधान पास किया और डी. वी. सी. (D. V. C.) के अंतर्गत दामोदर नदी के जल थल के लिए योजना बनी, जो बिहार और पश्चिमी बंगाल के प्रदेश को विशेषकर लाभान्वित करती है।

दामोदर घाटी योजना के अंतर्गत माइथान, पंचेटहिल, तिलैया आदि बाँधों का निर्माण बिहार प्रदेश के क्षेत्र में हो चुका है और बड़ी मात्रा में पनबिजली का उत्पादन इन स्थलों पर होता है। दुर्गापुर में दामोदर नदी पर एक बराज का निर्माण भी हुआ है, जिसमें दामोदर नदी से नहर निकाली गई है। साथ ही नहर द्वारा जलमार्गीय यातायात की व्यवस्था भी की गई है।

परिचय[संपादित करें]

नदीघाटी योजना के बहिर्मुखी आकल्प में बहुत सी बातें आती हैं। उनमें मुख्य ये हैं : बाढ़ों की रोकथाम, नदियों द्वारा जलमार्ग की सुविधा पर्याप्त कराना, बड़े बाँधों का निर्माण तथा उनके द्वारा पनबिजली का उत्पादन, बाँधों द्वारा सिंचित जल से भूसिंचन के साधन उपलब्ध करना, पानी के नियंत्रण से भूमि के कटाव को रोकना तथा भूमि संरक्षण के निमित्त विविध प्रकार के स्थलीय कार्य करना, वनसंक्षरण तथा वन और कृषि की भूमि का यथानुकूल विभाजन तथा नियंत्रण, मत्स्य उत्पादन तथा उसके वितरण का प्रबंध, पशु और पक्षियों की देखरेख तथा उनकी वृद्धि का आयोजन, घाटी के क्षेत्र में मलेरिया आदि अन्य बीमारियों आदि अन्य बीमारियों की रोकथाम, कृषि उत्पादन की खपत तथा वितरण का आयोजन, यातायात का प्रबंध, पनबिजली द्वारा संचालित उद्योगों का आयोजन, उद्योगों द्वारा बढ़ती समस्याओं का सामयिक समाधान; नदियों की स्वच्छता पर नियंत्रण तथा मानव जीवन से संबंधित बहुत सी अन्य बातों का आयोजन, प्रबंध एवं संपूर्ण नियंत्रण।

नदीघाटी योजना में कितना कार्य हो सकता है और उसका विस्तार क्या होता है इसका अनुमान टी. वी. ए. के उन आँकड़ों से हो सकता है जो टी. वी. ए. के २५ वर्ष पूर्ण करने पर सन् १९५८ में प्रकाशित किए गए थे। इनमें से कुछ आँकड़े इस प्रकार हैं :

बड़े बाँधों का निर्माण - २० बाँध
बड़ें भाप (स्टीम) पावर हाउस - ८ पावर हाउस

इन बाँधों में लगभग पाँच करोड़ घन कंक्रीट आदि का प्रयोग हुआ और ढाई करोड़ घन फुट कंक्रीट पावर हाउसों में लगा तथा १,३०,००० टन स्टील प्रयोग में आया। इस निर्माण कार्य से घाटी का प्राकृतिक रूप ही बदल गया। जहाँ नदी कटाव करती हुई समुद्र की ओर वेग से बढ़ती थी वहाँ अब लंबी चौड़ी मानवकृत झीलें हैं। इसके द्वारा बहुत से काम सधते हैं। बिजली उत्पादन तो होता ही है, जिसके द्वारा उद्योग धंधे चलाए जाते हैं और बड़े-बड़े कारखाने और फैक्टरियाँ चलाई जाती हैं।

सन् १९५८ तक, २५ साल के समय में टी.वी.ए. की बिजली उत्पादन की क्षमता लगभग १,०२,२२,२१० किलोवाट तक पहुँच गई थी और पावरहाउसों पर काम जारी था जिनकी क्षमता १५,३५,००० किलोवाट थी।

नदीघाटी योजना के अंतर्गत सारी घाटी के नक्शे पूर्ण रूप से तैयार किए गए। उनके द्वारा कृषि उत्पादन योजनाएँ साथ-साथ बनाई गईं और काम चालू किया गया। नदियों के जलमार्ग द्वारा यातायात की सुविधाएँ बढ़ीं तथा बाढ़ों द्वारा जो वार्षिक नुकसान होता था उसमें बहुत कमी आई। इसका परिणाम यह भी हुआ कि उस भूमि की, जो हर साल बाढ़ग्रस्त होती थी, कीमत एक साथ बढ़ गई। टी.वी.ए. का कहना है कि बहुत सी लागत की रकम, इस तरह वसूल की जा सकी।

इसके अतिरिक्त मानव जीवन को सुखद बनाने के लिए तरह-तरह के आमोद-प्रमोद के बहुत से स्थल बनाए गए, जैसे सैर-सपाटे के लिए बड़े-बड़े राष्ट्रीय पार्क, तैरने के लिए अथवा नौका विहार के लिए झीलें, स्कूल, आदि। ये सारी बातें नदीघाटी योजना के द्वारा उस घाटी के समस्त प्राकृतिक साधन समाज के लाभ के लिए उपयोग में आ जाते हैं, क्योंकि जल, थल और बिजली पर्याप्त मात्रा में मिल जाती है।

किसी नदी घाटी की योजना के सफलीभूत होने के लिए आवश्यक यह होता है कि संपूर्ण विकासकार्य प्रशासन की दृष्टि से एक ही सूत्र में बँधे हों। इसी कारण संसद द्वारा विधान या बिल के रूप में एक स्वसंचालित प्रशासन नियुक्त किया जाता है। वह अपने अधिनियमों के अनुकूल कार्यसंपादन में लग जाता है, अपनी वित्त नीति अपने-आप निर्धारित करता है और प्रादेशिक शासनों से परामर्श करते हुए योजना की पूर्ति करने में लग जाता है।

वैसे बहुत-सी और योजनाएँ भी ऐसी होती हैं जो बहुमुखी होती हैं, किंतु उनका पूर्ण रूपेण उपयोग इसलिए नहीं हो पाता कि उन्हें एक इकाई के रूप में नहीं देखा जाता और प्रादेशिक प्रशासन के बीच खींचातानी सी बनी रहती है तथा कभी-कभी अशोभनीय स्थिति पैदा हो जाती है। अत: नदीघाटी योजनाओं का बन जाना एक प्रगतिशील युक्ति है, जिसके द्वारा विभिन्न मतों का समन्वय एक प्रशासन के अंतर्गत हो जाता है। भारत में कई अन्य नदीघाटी योजनाएँ चल रही हैं।

नदीघाटी योजनाओं में कार्यसंपादन तथा संचालन में बहुत कुछ इंजीनियरिंग क्षमता की आवश्यकता होती है। साथ ही वनविशेषज्ञ, कृषिविशेषज्ञ आदि का सहयोग भी अनिवार्य है। पानी का संचालन, नियंत्रण तथा उचित प्रयोग विशेष रूप से आवश्यक है और इसी के ऊपर अधिकतर नदीघाटी योजना की सफलता निर्भर होती है।

नदीघाटी योजना क्षेत्रों के प्राकृतिक विभाजन के अनुकूल प्राकृतिक साधनों का योजनाबद्ध विकास तथा उपयोग करने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। समय के साथ-साथ इस दिशा में मानव समाज भिन्न-भिन्न देशों में प्रगति कर रहा है और करता रहेगा। किंतु आवश्यता के अनुसार नदीघाटी योजनाओं के आकल्पों में परिवर्तन भी होता रहेगा, क्योंकि अणु शक्त के विकास के साथ-साथ विकास का चित्रण भी बदलेगा और मानव की बहुमुखी माँगों में भी बहुत कुछ घटा बढ़ी रहेग। फिर भी नदीघाटी योजनाओं की उपादेयता में कोई विशेष अंतर आने की संभावना नहीं है। मूल रूप से मानवीय संस्कृति का विकास युगों से अधिकतर जलतट से संबंधित रहा है।

भारत मे नदी घाटी परियोजनाएं[संपादित करें]

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सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "नदी घाटी परियोजनाऍं". भारत की नदी घाटी परियोजनाएंं.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]