नंदकिशोर पारीक

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

जयपुर के इतिहास के विश्वकोश- स्वर्गीय नन्दकिशोर पारीक[संपादित करें]

आरंभिक जीवन एवं पत्रकारिता में रुझानअंगूठाकार


प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

[1]गुलाबी नगरी जयपुर के सूक्ष्म इतिहास के जब जब कोई सन्दर्भ आते है तो स्वर्गीय नन्द किशोर पारीक का नाम, उनका दशकों तक किया हुआ काम, स्वतः ही स्मरण हो आता है। जयपुर के सपूत स्वर्गीय नंदकिशोर पारीक का जन्म 3 सितम्बर 1926 को एक साधारण से पुरोहित परिवार में हुआ। वरिष्ठ पत्रकार और प्रख्यात स्तम्भ लेखक स्व। नन्द किशोर जी की इतिहास एवं संस्कृति के अध्ययन व लेखन में रूचि जयपुर के दो मूर्धन्य विद्वजनो - सर पुरोहित गोपीनाथ (जयपुर के प्रथम एम ए) और पुरोहित हरिनारायण शर्मा बीए विद्याभूषण (संत साहित्य के उद्धारक और सुंदर ग्रंथावली व मीरा वृहद् पदावली के संपादक) के सानिध्य में बढ़ी। स्वर्गीय पारीक जी ने अंग्रेजी, हिंदी साहित्य तथा कानून में स्नातक की शिक्षा के साथ विशारद की उपाधि प्राप्त की। विद्याभूषण जी के आशीर्वाद से 1944 - 46 में पारीक मासिक का संपादन एवं प्रकाशन श्री पारीक द्वारा आरम्भ हुआ। यद्यपि यह पत्रिका जातीय थी किन्तु इसका कलेवर विशुद्ध साहित्यिक रहा और सन 1945 में विद्याभूषण के निधन के बाद इस पत्रिका का 'विद्याभूषण विशेषांक' तत्समय 'सरस्वती' और 'आजकल' जैसे प्रतिष्ठित पत्रों में प्रशंसित हुआ।

सन 1945 में स्वर्गीय पारीक मात्र इंटरमीडिएट के छात्र थे, तभी इन्होने 'चांदनी' मासिक का सम्पादन एवं प्रकाशन आरम्भ किया। राजस्थान का यह प्रथम मासिक था जिसमे कन्हैयालाल सहल, इंदुशेखर, उपेंद्र नाथ अश्क, गोपाल सिंह नेपाली, भगवतीशरण वर्मा जैसे साहित्यकारों और कवियों की रचनायें प्रकाशित हुई थी। बहुत ही कम और पुरातन साधनो जैसे पाँव द्वारा संचालित ट्रेडल मशीन पर छपने वाला इसका तिरंगा आवरण और चित्रावलियाँ तब के जयपुर में एक अजूबा ही थी।

पत्रकारिता का परवान एवं जयपुर का सूक्ष्म इतिहास लेखन[संपादित करें]

'पारीक' के प्रकाशन के आसपास ही हिंदी के प्रसिद्द पत्रकार सचदेव विद्यालंकार ने जयपुर के जोहरी बाजार के मनोरंजन प्रेस से साप्ताहिक 'प्रभात' निकाला था। स्वर्गीय नंदकिशोर जी को उनका भी सानिध्य एवं मार्गदर्शन मिला। सन 1946 में उन्होंने जयपुर के प्रथम हिंदी दैनिक "लोकवाणी' के माध्यम से दैनिक पत्रकारिता में प्रवेश किया और पूरे एक दशक तक इस दैनिक में उपसंपादक और संपादक पद को सुशोभित किया। श्री पारीक सन 1947 में नयी दिल्ली के अंग्रेजी दैनिक 'स्टेट्समैन' के संवाददाता नियुक्त हुए और लगभग ग्यारह वर्षों तक इस अंग्रेजी दैनिक से भी जुड़े रहे। सन 1954 के अंत में श्री पारीक ने राजस्थान सरकार की राज्य सेवा में प्रवेश किया और पत्रकार, जन संपर्क अधिकारी, (समाचार), फीचर राइटर, उपनिदेशक, और संयुक्त निदेशक जैसे प्रतिष्ठित पदों पर क्रमशः पद्दोन्नत होते हुए जुलाई 1981 में वे राज्य सेवा से सेवानिवृत हुए। उनका लिखा सरकारी साहित्य भी समय समय पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित होता रहा। वर्ष 1967 -68 एवं 1968-69 में अकाल एवं बाढ़ पर उनके लिखे हुए अंग्रेजी एवं हिंदी के आलेखों को व्यापक सराहना मिली। श्री पारीक के विपुल पत्रकारी लेखन से परे जन संपर्क निदेशालय में उनके द्वारा हिंदी एवं अंग्रेजी के प्रभूत लेखन को पृष्ठों में नहीं बल्कि किलो और क्विंटलों में तोला जा सकता है। स्वर्गीय पारीक सेवानिवृति के बाद लगभग डेढ़ वर्ष तक राजस्थान पत्रिका के जोधपुर संस्करण के संपादक रहे, लगभग दो वर्ष राजस्थान पत्रिका के अंग्रेजी संस्करण के समाचार संपादन का दायित्व निभाया तथा लगभग पांच वर्ष तक नयी दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक 'पैट्रियाट' के संवाददाता भी रहे। प्रमुख राष्ट्रीय अंग्रेजी एवं हिंदी पत्रपत्रिकाओं में राजस्थान के इतिहास, कला, संस्कृति विषयक उनके लगभग छह सौ लेख प्रकाशित हैं। जयपुर नगर, इसके गली मुहल्लों, साहित्य, संस्कृति, लोक और लीक से श्री पारीक को आरम्भ से ही अनूठा लगाव था। सन 1972 में जब उन्होंने राजस्थान पत्रिका में 'नगर परिक्रमा' स्तम्भ को लिखना आरम्भ किया तो जयपुर के आसन्न जन जीवन के विविध अनछुए सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक पक्ष ऐतिहासिक सन्दर्भों के साथ जिस प्रकाश उजागर होते चले गए वह अपने आप में एक अनूठी मिसाल बन गयी। इस नगर परिक्रमा स्तम्भ ने श्री पारीक और राजस्थान पत्रिका अखबार को जन जन में लोकप्रिय बना दिया। स्वर्गीय पारीक नगर परिक्रमा के माध्यम से जयपुर के विषय में अनवरत 26 वर्ष से अधिक समय तक प्रतिदिन लिखते रहे जो अपने आप में एक कीर्तिमान है। 'पत्रिका के संपादक स्वर्गीय कपूरचंद कुलीश के शब्दों में "यह एक अनूठा स्तम्भ था, मुझे नहीं मालूम दुनिया के अखबारों के पूरे इतिहास में इस तरह का स्तम्भ कभी रहा भी है या नहीं"। स्वर्गीय पारीक जी ने अपने इस स्तम्भ में जयपुर के राजा रानियों, राजमहलों की चर्चा ही नहीं की, बल्कि शहर के गली कूचों की महत्ता की विरुदावली भी रची। उन्होंने संस्कृत के महामहोपाध्यायों से लेकर उर्दू फ़ारसी के आलिम फाज़िलों की स्तुति की है तो नामी गिरामी वैद्यों, हकीमों का गुणगान भी किया है। शहर के बड़े बड़े हुनरमंदों और दस्तकारों का बखान नगर परिक्रमा कॉलम में विस्तार से हुआ। गुलाबी शहर जयपुर की सुंदरता और सजावट का गुणगान उन्होंने इतने विस्तार से किया कि शायद ही कोई कंगूरा उनकी कलम से अछूता रहा हो। महलों, मंदिरों, हवेलियों और बाग़ बगीचों का शब्द चित्रण वे करते चले गए। अपने जयपुर नगर की विरुदावली में स्वर्गीय नन्द किशोर जी ने लगभग 80 लाख से अधिक शब्द जोड़े, यह अपने आप में एक दैनिक पत्र के स्तम्भ का एक कीर्तिमान है। स्वर्गीय पारीक के नगर परिक्रमा कॉलम पर आधारित अभी तक आठ प्रतिष्ठित पुस्तके प्रकाशित हुई हैं इनमे से अंग्रेजी में "जयपुर तहत वाज रॉयल कोर्ट एंड थे सेरेलियो" तथा हिंदी में "गौरव पुरुष - सर पुरोहित गोपीनाथ", "राजदरबार और रनिवास"https://epustakalay.com/book/16689-raj-darbar-aur-ranivas-by-nk-pareek/, "1857 का गदरकालीन जयपुर" , "संघी झूंथाराम महाभियोग", "संत रामसिंह एवं उनकी सूफी भावना" तथा "जयाचार्य-एक रेखाचित्र"। भारत के अप्रतिम नगर जयपुर की कहानी जिस रोचकता और प्रमाणीकरण से स्वर्गीय पारीक ने प्रस्तुत की है वह इतिहास के अनुशीलन और सम्बंधित जानकारों से संपर्क के बिना संभव नहीं थी। उन्होंने सचमुच जयपुर के गली मुहल्लों और नगर के विस्तार के साथ साथ इसमें समाविष्ट आसपास के गाँवों कस्बों की भी बार बार परिक्रमा की। घर घर दरवाजों पर दस्तक देकर बातों बातों में सूक्ष्म इतिहास को ज्ञात किया, उसे शब्द दिए और हम सब को परोसा। उनके प्रयासों से जैसे विगत जयपुर सजीव हो उठा था।

पुरस्कार एवं उपलब्धियां[संपादित करें]

पत्रकारिता और इतिहास लेखन में अतुलनीय योगदान के लिए स्वर्गीय नन्दकिशोर पारीक को 1979 एवं 1987 में तत्समय के मुख्यमंत्रियों द्वारा दो बार राज्य स्तरीय पुरस्कार प्रदान किया गया, राजस्थान साहित्य अकादमी तथा प्रदेश की विभिन शैक्षणिक साहित्यिक संस्थाओं की और से स्वर्गीय पारीक को बार बार पुरस्कृत किया जाता रहा। अक्टूबर 1997 को नगर परिक्रम के 25 वर्ष पूर्ण होने पर स्वर्गीय पारीक का नागरिक अभिनन्दन किया गया जिसमे राजस्थान की लगभग 35 साहित्यक शैक्षिक संस्थाओं ने श्री पारीक का अभिनन्दन किया। स्वर्गीय पारीक उन भाग्यशाली लोगों में थे जिनकी यश सुरभि उनके जीवन काल में चहुँ ओर महकती रही। अट्ठारह दिसंबर उन्नीस सौ अठ्यानवे को गुलाबी नगरी जयपुर के इस लाल ने तिहत्तर वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। जीवन पर्यन्त उनकी कलम जयपुर और साहित्य की आराधना करती रही, जिस दिन उनका देहावसान हुआ उसके अगले दिन सम्मानवश राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र ने "नगर परिक्रमा" का कॉलम रिक्त प्रकाशित कर उन्हें अनूठी श्रद्धांजलि प्रदान की। स्वर्गीय नंदकिशोर जी का जयपुर विषयक लेखन एक विश्वकोश के सामान है , अनगिनत शोध छात्रों ने, विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ने उनके मार्गदर्शन में ढूंढाड़ के इतिहास को समझा, आज उन्हें संसार से गए 20 से अधिक वर्ष हो चले किन्तु उनके लिखे शब्द जयपुर के लिए अजर अमर है, सबसे प्रामाणिक सन्दर्भ है। राजस्थान सरकार ने उनके सम्मान में बापू नगर में उनके निवास की ओर जाने वाली सड़क का नाम नन्दकिशोर पारीक मार्ग किया है!

https://www.goodreads.com/author/show/13202995.Nand_Kishore_Pareek

  1. https://www.goodreads.com/author/show/13202995.Nand_Kishore_Pareek. गायब अथवा खाली |title= (मदद)