धर्मेश्वर नाथ मंदिर

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धर्मेश्वरनाथ मंदिर लाहौरी ईटो से निर्मित है इसके भीतर प्रवेश करते ही रहस्यमय अनुभूति होती है। यहां पर महाशिवरात्रि पर पूजा का विशेष महात्म्य है। फेफना क्षेत्र के थम्हनपुरा गांव में अवस्थित शिव मंदिर करीब 550 साल पुराना है। ग्रामीणों के मुताबिक इस गांव को थमन दूबे ने बसाया था। उनके पौत्र धर्मेश्वर दूबे द्वारा इस प्राचीन मंदिर का निर्माण व शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की गयी। मान्यता है कि जिस व्यक्ति द्वारा शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है तो उसके नाम के अन्त में 'ईश्वर' या 'नाथ' शब्द जोड़ देने पर जो नाम बनता है, वही नाम मंदिर मेंं विराजमान भगवान का नाम हो जाता है। इस प्रकार से भगवान शिव यहां धर्मेश्वरनाथ के नाम से प्रतिस्थापित हैं। लाहौरी इंर्टो से निर्मित इस मंदिर की दीवारें काफी लम्बी-चौड़ी हैं। इंर्टो को जोड़ने के लिए 'खोवा' नामक मसाले का प्रयोग किया गया हैै। आज भी इस मंदिर की दीवारों पर कहीं भी दरार आदि नही आयी है। खास बात यह है कि गर्मी के मौसम में मंदिर भीतर से ठंडा व जाड़े के दिनों में गरम रहता है। मंदिर की विशेषता यह है कि इसके भीतर प्रवेश करते ही मन में एक अद्भुत शांति छा जाती है और कुछ-कुछ रहस्यमय अनुभूति सी होने लगती है। मान्यता है कि मंदिर में भगवान शिव साक्षात हैं। यह अनुभूति मंदिर में प्रवेश करते ही होने लगती है। मंदिर के निर्माण सम्बंध में ग्रामीण बताते हैं धर्मेश्वर दूबे बिहार के सपही नामक स्थान मंें स्थित देवी मंदिर की ईंटो को रातोंरात उठाकर थम्हनपुरा गांव लाये, जिससे इस मंदिर का निर्माण हुआ।

गिरनारी बाबा[संपादित करें]

निराली पूर गांव में स्थापित प्राचीन शिव मंदिरों में से एक ऐतिहासिक शिव मंदिर है। बताया जाता है कि गिरनार पर्वत से पधारे एक सन्यासी यही रहकर पूजा अर्चना किया करते थे। एक बार एक चरवाहे की नजर इस शिवलिंग पर पड़ी। उस चरवाहे के द्वारा बताये जाने पर लोगों द्वारा रात भर इनको ले जाने के लिए खुदाई की गयी लेकिन शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ तो गुस्से में आकर लोगों ने शिवलिंग पर फावड़े से प्रहार कर दिया। जिस कारण शिवलिंग से रक्त की धाराएं बहने लगी। यह बात जब उस सन्यासी को पता चला तो उन्हीं के नाम से मंदिर का नाम गिरनारी बाबा का मंदिर पड़ा। बाद में एक श्रद्धालु ने इस मंदिर को बनवाया।