धनुषकोडी

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अमृतमपत्रिका, ग्वालियर की प्रस्तुति..

धनुषकोटि एक प्राचीन हिन्दू तीर्थ है। यह रामेश्वरम ज्योतिलिंग से लगभग 8 से 10 किलोमीटर दूर विशाल समुद्र के तट पर है। यहां शाम 6 बजे के बाद जाना मना है। श्रीलंका देश धनुषकोटि के किनारे से साफ दिखता है। यह भारत की अंतिम सीमा है। इसके बाद श्रीलंका आदि देशों की सीमा लग जाती है।

बताते हैं कि रावण युद्ध के दौरान यहां से लंका जाने के लिए उस काल के यांत्रिक नल-नील ने एक आधाररहित झूला बनाया था, जिसे पुल भी कहते हैं। हो सकता है कि झूले का चलन इसी के बाद आरम्भ हुआ हो।

बिना नींव एवं आधार का एक मात्र झूला ब्रह्माण्ड में केवल धनुषकोटि में ही उपलब्ध था। आज भी यह झूला ही जैसा दिखता है, ऐसा नासा के वैज्ञानिकों ने बताया है। हिन्दुस्तान में लक्ष्मण झूला आदि पुल दुनिया में प्रसिद्ध हैं। धर्म आस्थानुसार राम के भाई लखन ने ऋषिकेश के इसी स्थान पर जूट की रस्सियों का झूला बनाकर नदी को पार किया था। इसीलिए इस पुल को लक्ष्मण झूला कहते हैं। स्वामी विशुदानंद की प्रेरणा से कलकत्ते के सेठ सूरजमल झुहानूबला ने यह पुल सन् 1889 में लोहे के मजबूत तारों से बनवाया, इससे पूर्व जूट की रस्सियों का ही पुल था एवं रस्सों के इस पुल पर लोगों को छींके में बिठाकर खींचा जाता था। लेकिन लोहे के तारों से बना यह पुल भी 1924 की बाढ़ में बह गया। इसके बाद मजबूत एवं आकर्षक पुल बनाया गया, जो आज भी है।

दुनिया में झूला मनोरंजन का बहुत बड़ा साधन है। यह नयनों का अंजन एवं दांतों का मंजन भी करता है। अब इन्टरनेट की दुनिया में गाँव का शोर मौन है। पेड़ के उस झूले पर आजकल झूलता ही कौन है।।

लूला आदमी भी झूला झूलने में गर्व का अनुभव करने लगता है। लोग कहते है घृणा खराब चीज है, तो इश्क ने कौन सा झुला झुलाया है!!!!!

हावड़ा ब्रिज यानि रवीन्द्र सेतु …. इसका मूल नाम "नया हावड़ा पुल" था जिसे बदलकर १४ जून सन् १९६५ को 'रवीन्द्र सेतु' कर दिया गया। किन्तु अब भी यह "हावड़ा ब्रिज" के नाम से अब भी अधिक प्रसिद्ध है। यह हिंदुस्तान में अपने तरह का छठवाँ सबसे बड़ा पुल है। कलकत्ता पश्चमी बंगाल में हुगली नदी के ऊपर बना एक कैन्टीलीवर सेतु है। यह हावड़ा को कोलकाता से जोड़ता है। यह एक ऐसा पुल है जो सिर्फ चार खम्भों पर टिका है। दो नदी के इस तरफ और पौन किलोमीटर की चौड़ाई के बाद दो नदी के उस तरफ। सहारे के लिए कोई रस्से आदि की तरह कोई तार आदि नहीं हैं। अधिकांशतः प्रत्येक पुल के नीचे खंभे होते है जिन पर वह टिका रहता है। हावड़ा ब्रिज दुनिया के इस अनोखे हजारों टन वजनी इस्पात के गर्डरों के पुल ने केवल चार खम्भों पर खुद को इस तरह से बैलेंस बनाकर हवा में टिका रखा है कि 80 वर्षों से इस पर कोई फर्क नहीं पडा है जबकि लाखों की संख्या में दिन रात भारी वाहन और पैदल भीड़ इससे गुजरती है। अंग्रेजी हुकूमत ने जब इस पुल की कल्पना की तो वे ऐसा पुल बनाना चाहते थे कि नीचे नदी का जल मार्ग न रुके। अतः पुल के नीचे कोई खंभा न हो। ऊपर पुल बन जाय और नीचे हुगली में पानी के जहाज और नाव भी बिना अवरोध चलते रहें। ये एक झूला अथवा कैंटिलिवर पुल से ही संभव था।

अब इतिहास बनके रह गई, सावन में झूलों की प्राचीन परंपरा… एक समय था जब सावन माह के आरंभ होते ही हर घर-घर के आंगन में लगे पेड़ पर कभी झूला झूलते हुए महिलाएं लोकगीत गाती थी। वे कजरी गीतों के साथ उसका आनंद उठाती थीं, जिससे मन को अति सुकून मिलता था। झूले पर अनेकों गीत लिखे ओर गाये गए।

खुशियों का झूला छोड़कर, दुनियादारी का झूला झूल गये! जिम्मेदारी अपने सिर इतनी, ले ली कि- जीना ही भूल गये। सावन मास शुरू होते ही मल्हारें गूंजने लगती थी। ग्रामीण युवतियां व महिलाएं एक जगह देर रात तक श्रावणी गीत गाकर झुला झूलने का आनंद लेती थीं। वहीं जिन नवविवाहिताओं के पति दूरस्थ स्थानों पर होते थे उनकों इंगित करते हुए विरह गीत सुनना अपने आप में लोककला का ज्वलंत उदाहरण हुआ करता था। झूले की पेंगो पर नवयुवितयों का अल्हड़ गायन शैली अब यादों में सिमट कर रह गई है। झूले सी होती है सभी की जिन्दगी, कभी आगे ले जाती है तो कभी पीछे…… आज समय के साथ वृक्ष विकृत-गायब होते गए और बहुमंजिला इमारतों के बनने से आंगन का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया। ऐसे में सावन के झूले भी इतिहास बनकर हमारी परंपरा से गायब हो रहे हैं। अब तो बस यही गाना बचा है यादों में रहने के लिए-

जाति-पाति के बंधन से मुक्त अल्हड़पन लिए बालाओं की सुरीली किलकारियां भारतीय सभ्यता का वह अंदाज ही निराला था। सावन को अपनी मस्ती में सराबोर देखना हो तो किसी गांव में चले जाइए। जहां पेड़ों की डालों पर झूला डाले किशोरियां, नवयुवतियां या फिर महिलाएं अनायास ही दिख जाती थीं। सावन के ये झूले मस्ती और अठखेलियों का प्रतीक होते थे। अंत में इतना स्मरण रखें कि- झूला जितना पीछे जाता है, उतना ही आगे आता है। तराजू भी सम होता है। एकदम बराबर… सुख और दुःख दोनों ही जीवन में बराबर मिलते है। जिन्दगी का झूला पीछे जाएँ तो डरो मत, वह आगे भी आएगा।।।।।


Dhanushkodi
—  town  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश  भारत
राज्य Tamil Nadu
ज़िला Ramanathapuram
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)

• 0 मीटर (0 फी॰)

निर्देशांक: 9°09′07″N 79°26′45″E / 9.152011°N 79.445851°E / 9.152011; 79.445851

धनुषकोडी या दनुशकोडि (तमिल: தனுஷ்கோடி) भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव/शहर है।[1][2] धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।[3] पंबन से प्रारंभ होने वाली धनुषकोडी रेल लाइन 1964 के तूफान में नष्‍ट हो गया था और 100 से अधिक यात्रियों वाली रेलगाड़ी समुद्र में डूब गई थी।

== हिंदू पौराणिक कथाएं

1964 का चक्रवात[संपादित करें]

धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच केवल स्‍थलीय सीमा है जो पाक जलसन्धि में बालू के टीले पर सिर्फ 50 गज की लंबाई में विश्‍व के लघुतम स्‍थानों में से एक है। 1964 के चक्रवात से पहले, धनुषकोडी एक उभरता हुआ पर्यटन और तीर्थ स्‍थल था। चूंकि सीलोन (अब श्रीलंका) केवल 18 मील दूर है, धनुषकोडी और सिलोन के थलइमन्‍नार के बीच यात्रियों और सामान को समुद्र के पार ढ़ोने के लिए कई साप्‍ताहिक फेरी सेवाएं थीं। इन तीर्थयात्रियों और यात्रियों की आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए वहां होटल, कपड़ों की दुकानें और धर्मशालाएं थी। धनुषकोडी के लिए रेल लाइन- जो तब रामेश्‍वरम नहीं जाती थी और जो 1964 के चक्रवात में नष्‍ट हो गई- सीधे मंडपम से धनुषकोडी जाती थी। उन दिनों धनुषकोडी में रेलवे स्‍टेशन, एक लघु रेलवे अस्‍पताल, एक पोस्‍ट ऑफिस और कुछ सरकारी विभाग जैसे मत्‍स्‍य पालन आदि थे। यह इस द्वीप पर जनवरी 1897में तब तक था, जब स्‍वामी विवेकानंद सितंबर 1893 में यूएसए में आयोजित धर्म संसद में भाग लने के लेकर पश्‍चिम की विजय यात्रा के बाद अपने चरण कोलंबो से आकर इस भारतीय भूमि पर रखे.

चक्रवात से पहले, मद्रास एग्‍मोर (अब चेन्‍नई एग्‍मोर) से बोट मेल कही जाने वाली रेल सेवा थी और यह सिलोन के लिए फेरी के द्वारा यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए लिंक रेल थी। 1964 के चक्रवात के दौरान, 20 फीट की व्‍यापक लहर शहर के पूर्व से पाक खाड़ी/जलसंधि से शहर पर आक्रमण करते हुए आई और पूरे शहर को नष्‍ट कर दिया, एक यात्री रेलगाड़ी और पंबन रेल सेतु-दुखद रूप से यह सब रात में घटित हुआ।

तूफान कई मायनों में अनोखा था। यह 17 दिसम्बर 1964 को दक्षिणी अंडमान समुद्र में 5 डिग्री उत्तर 93 डिग्री पूर्व में अपने केंद्र के साथ दबाव के निर्माण के साथ प्रारंभ हुआ। 19 दिसम्बर को यह एक एक तीव्र चक्रवातीय तूफान के रूप में परिणत हो गया। इतनी कम अक्षांश पर अवसाद के गठन 5 डिग्री उत्तर के कम अक्षांश पर दबाव का निर्माण भारतीय सागर में दुर्लभ है हालांकि केंद्र के 5 डिग्री के भीतर टायफून के विकसित होने के ऐसे मामले उत्तरी पश्‍चिमी प्रशांत में आए हैं। रामेश्वरम का तूफान केवल इतनी कम अक्षांश पर नहीं निर्मित हुआ था लेकिन यह लगभग उसी अक्षांश एक भयंकर चक्रवातीय लहर के रूप में तीव्र हो गया जो वास्‍तव में एक दुलर्भ घटना है। 21 दिसम्बर 1964 के बाद, 250 से 350 मील प्रति घंटे की दर से इसकी गति, लगभग एक सीधी रेखा में, पश्‍िचम की ओर हो गई। 22 दिसम्बर को यह सीलोन के वावुनिया (अब श्रीलंका कहा जाता है) को 150 केटीएस (लगभग 270 कि.मी/घंटा) की वायु की तीव्रता के साथ पार कर गया, रात में पाक स्‍ट्रीट में पवेश कर गया और 22-23 दिसम्बर 1964 की रात में रामेश्‍वरम द्वीप के धनुषकोडी से टकरा गया। यह अनुमान लगाया गया था कि जब इसने रामेश्‍वरम को पार किया तो समुद्री लहरें 8 गज उंची थी। शशि एम कुलश्रेष्‍ठ और मदन जी गुप्ता द्वारा 'रामेश्‍वरम के तूफान का उपग्रह अध्‍ययन' शीर्षक तूफान का वैज्ञानिक अध्‍ययन इन लिंक पर दिया गया है[1][मृत कड़ियाँ]

उस दुर्भाग्‍यपूर्ण रात (22 दिसंबर) को 23.55 बजे धनुषकोडी रेलवे स्‍टेशन में प्रवेश करने के दौरान, ट्रेन संख्‍या 653, पंबन-धनुषकोडी पैसेजंर, एक दैनिक नियमित सेवा जो पंबंन से 110 यात्रियों और 5 रेलवे कर्मचारियों के साथ रवाना हुई, यह एक व्‍यापक समुद्री लहर के चपेट में तब आई जब यह धनुषकोडी रेलवे स्‍टेशन से कुछ ही गज दूर थी। पूरी ट्रेन सभी 115 लोगों को मौत के साथ बहा ले जाई गई। कुल मिलाकर 1800 से अधिक लोग चक्रवाती तूफान में मारे गए। धनुषकोडी के सभी रिहायशी घर और अन्‍य संरचनाएं तूफान में बर्बाद हो गए। इस द्वीप पर करीब 10 किलोमीटर से चलती हुई लहरीय हवाएं चलीं और पूरे शहर को बर्बाद कर दिया। इस विध्‍वंस में पंबन सेतु उच्‍च लहरीय हवाओं द्वारा बहा दिया गया। प्रत्यक्षदर्शी स्‍मरण करते हैं कि हलोरे लेता पानी कैसे केवल रामेश्‍वरम के मुख्‍य मंदिर के ठीक करीब ठहर गया था जहां सैकड़ों लोग तूफान के कहर से शरण लिए थे। इस आपदा के बाद, मद्रास सरकार ने इस शहर को भूतहा शहर के रूप में और रहने के लिए अयोग्‍य घोषित कर दिया। केवल कुछ मछुआरे अब वहाँ रहते हैं।

धनुषकोडी पीड़ितों के लिए स्मारक

धनुषकोडी बस स्टैंड के पास एक स्‍मारक में निम्‍नलिखित कहा गया है: "उच्च गति और उच्च ज्‍वारीय हवाओं के लहरों के साथ एक तूफानी चक्रवात ने धनुषकोडी को 22 दिसम्बर 1964 की आधी रात से 25 दिसम्बर 1964 की शाम तक तहस नहस कर दिया जिससे भारी नुकसान हुआ और धनुषकोडी का पूरा शहर बर्बाद हो गया।

यात्रा[संपादित करें]

धनुषकोडी दिखाता हुआ नक्शा

हालांकि रामेश्‍वरम और धनुषकोडी के बीच एक रेलवे लाहन थी और एक यात्री रेलगाड़ी नियमित रूप से चलती थी, तूफान के बाद रेल की पटारियां क्षतिग्रस्‍त हो गईं और कालांतर में, बालू के टीलों से ढ़क गईं और इस प्रकार विलुप्‍त हो गई। कोई व्‍यक्ति धनुषकोडी या तो बालू के टीलों पर समुद तट के किनारे से पैदल पहुंच सकता है या मछुआरों की जीप या टेम्‍पो से.

भगवान राम से संबंधित यहां कई मंदिर हैं। यह सलाह दी जाती है कि गांव में समूहों में दिन के दौरान जाएं और सूर्यास्‍त से पहले रामेश्‍वरम लौट आएं क्‍योंकि पूरा 15 किमी का रास्‍ता सुनसान, डरावना और रहस्‍यमय है! पर्यटन इस क्षेत्र में उभर रहा है और हैं और यात्रियों की सुरक्षा के लिए पुलिस की उपस्‍थिति महत्‍वपूर्ण है। भारतीय नौसेना ने भी अग्रगामी पर्यवेक्षण चौकी की स्‍थापना समुद्र की रक्षा के लिए की है। धनुषकोडी में एक व्‍यक्ति भारतीय महासागर के गहरे और उथले पानी को बंगाल की खाड़ी के छिछले और शांत पानी से मिलते हुए देख सकता है। चूंकि समुद यहां छिछला है, तो आप बंगाल की खाड़ी में जा सकते हैं और रंगीन मूंगों, मछलियों, समुद्री शैवाल, स्टार मछलियों और समुद्र ककड़ी आदि को देख सकते हैं।

वर्तमान में, औसनत, करीब 500 तीर्थयात्री प्रतिदिन धनुषकोडी आते हैं और त्‍योहार और पूर्णिमा के दिनों में यह संख्‍या हजारों में हो जाती है, जैसे नए . निश्‍चित दूरी तक नियमित रूप से बस की सुविधा रामेश्वरम से कोढ़ान्‍डा राम कोविल (मंदिर) होते हुए उपलब्ध है और कई तीर्थयात्री को, जो धनुषकोडी में पूर्जा अर्चना करना चाहते हैं, निजी वैनों पर निर्भर होना पड़ता है जो यात्रियों की संख्‍या के आधार पर 50 से 100 रूपयों तक का शुल्‍क लेते हैं। संपूर्ण देश से रामेश्‍वरम जाने वाले तीर्थयात्रियों की मांग के अनुसार, 2003 में, दक्षिण रेलवे ने रेल मंत्रालय को रामेश्‍वरम से धनुषकोडी के लिए 16 किमी के रेलवे लाइन को बिछाने का प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट भेजा, इसके भाग्य के बारे में जानकारी अज्ञात है।

सूर्यग्रहण:

15 जनवरी, 2010 को सूर्य ग्रहण इस जगह हुआ था।

गैलरी[संपादित करें]

पौराणिक कथा[संपादित करें]

हिंदू धर्मग्रथों के अनुसार रावण के भाई विभीषण के अनुरोध पर राम ने अपने धनुष के एक सिरे से सेतु को तोड़ दिया और इस प्रकार इसका नाम धनुषकोड़ी पड़ा। एक रेखा में पाई जाने वाली चट्टानों और टापुओं की श्रृंखला प्राचीन सेतु के अवशेष के रूप में दिखाई देती हैं और जिसे राम सेतु के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि काशी की तीर्थयात्रा महोदधि (बंगाल की खाड़ी) और रत्‍नाकर (हिंद महासागर) के संगम पर धनुषकोटि में पवित्र स्‍थान के साथ रामेश्‍वरम में पूजा के साथ ही पूर्ण होगी।

कैसे पहुंचे[संपादित करें]

धनुषकोड़ी: दिल्ली से रामेश्वरम लगभग 2800 किमी दूर है, दिल्ली से रामेश्वरम जाने के लिए दो रास्ते है या तो आप मदुरै होकर जा सकते हैं या चेन्नई होकर या आप सीधे रामेश्वरम पहुंच सकते हैं। इसके अलावा आप फ्लाइट से भी चेन्नई या मदुरै तक जा सकते है।

  1. "Did you know? Dhanushkodi is the place where you can see the origin of the Ram Setu!". मूल से 30 नवंबर 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 12 दिसंबर 2017.
  2. "What will you see if you visit the precise point where India ends and Sri Lanka begins?". मूल से 13 सितंबर 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 16 दिसंबर 2017.
  3. "The Hindu article on Dhanushkodi". मूल से 19 फ़रवरी 2010 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 7 अगस्त 2010.