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द गॉड डिल्यूज़न

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भगवान भ्रम 
रिचर्ड डॉकिन्स रचित 2006 की पुस्तक
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प्रकारलिखित कार्य
मुख्य विषयमजहब की आलोचना,
नास्तिकता
शैली
गली का पता
उत्पत्ति का देश
लेखक
प्रकाशक
  • बैनटम प्रेस
  • इनोसत्रान्का (रूस)
  • कानून पब्लिशिंग हाउस
कार्य या नाम की भाषा
प्रकाशन की तिथि
  • 2 अक्टूबर 2006
का पूर्ववर्ती
  • द एन्सेस्टर्स टेल
का परवर्ती
  • द ग्रेटेस्ट शो ऑन अर्थ: द एविडेंस फॉर इवोल्यूशन
Original publication
प्राधिकरण नियंत्रण

द गॉड डिल्यूज़न (The God Delusion), ब्रिटिश विकासवादी जीवविज्ञानी और प्राणी-व्यवहारविद् रिचर्ड डॉकिन्स द्वारा 2006 में लिखित एक पुस्तक है। इसमें उन्होंने यह तर्क दिया है कि किसी अलौकिक रचयिता अर्थात् ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है, और किसी व्यक्तिगत ईश्वर में आस्था रखना मात्र एक भ्रम है। डॉकिन्स 'भ्रम' को एक ऐसे दृढ़ मिथ्या विश्वास के रूप में परिभाषित करते हैं, जो मजबूत विरोधाभासी साक्ष्यों के बावजूद कायम रहता है। इस पुस्तक में, वे लीला (1991) में उल्लिखित रॉबर्ट पियर्सिग के इस कथन से पूर्ण सहमति व्यक्त करते हैं कि "जब कोई एक व्यक्ति किसी भ्रम का शिकार होता है, तो उसे पागलपन कहा जाता है। किन्तु जब बहुत से लोग किसी भ्रम का शिकार होते हैं, तो उसे धर्म कहा जाता है।"[1] वे इस बात के पक्ष में तर्क देते हैं कि धर्म के बिना भी नैतिकता का स्वतंत्र अस्तित्व संभव है, और साथ ही वे धर्म व नैतिकता, दोनों की उत्पत्ति के लिए वैकल्पिक स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हैं।

दिसंबर 2006 के आरंभ में, यह पुस्तक न्यूयॉर्क टाइम्स की हार्डकवर नॉन-फ़िक्शन बेस्टसेलर सूची में नौ सप्ताह तक बने रहने के बाद चौथे स्थान पर पहुँच गई थी।[2] इस पुस्तक पर व्यापक चर्चा हुई और इसे विविध आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, जिसके परिणामस्वरूप इसके प्रत्युत्तर में कई अन्य पुस्तकें व लेख भी लिखे गए।

सन्दर्भ

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  1. Dawkins, Richard (2006). The God delusion. Internet Archive. Boston : Houghton Mifflin Co. ISBN 978-0-618-68000-9.
  2. "Hardcover Nonfiction - New York Times". www.nytimes.com. अभिगमन तिथि: 2026-06-19.