द्वितीय विश्व युद्घ

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विश्व युद्ध II, अथवा द्वितीय विश्व युद्ध,[1] (इसको संक्षेप में WWII या WW2 लिखते हैं), ये एक वैश्विक सैन्य संघर्ष था जिसमें, सभी महान शक्तियों समेत दुनिया के अधिकांश देश शामिल थे, जो दो परस्पर विरोधी सैन्य गठबन्धनों में संगठित थे: मित्र राष्ट्र एवं धुरी राष्ट्र.इस युद्ध में 10 करोड़ से ज्यादा सैन्य कर्मी शामिल थे, इस वजह से ये इतिहास का सबसे व्यापक युद्ध माना जाता है।"पूर्ण युद्ध" की अवस्था में, प्रमुख सहभागियों ने नागरिक और सैन्य संसाधनों के बीच के अंतर को मिटा कर युद्ध प्रयास की सेवा में अपनी पूरी औद्योगिक, आर्थिक और वैज्ञानिक क्षमताओं को झोक दिया.इसमें सात करोड़ से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें से अधिकांश साधारण नागरिक थे, इसलिए इसको मानव इतिहास का सबसे खूनी संघर्ष माना जाता है।[2]

युद्ध की शुरुआत को आम तौर पर 1 सितम्बर 1939 माना जाता है, जर्मनी के पोलैंड के ऊपर आक्रमण करने और परिणामस्वरूप ब्रिटिश साम्राज्य और राष्ट्रमंडल के अधिकांश देशों और फ्रांस द्वारा जर्मनी पर युद्ध की घोषणा के साथ.[3][4] कई देश इस तारीख से पहले ही युद्धरत थे, अन्य घटनाओं के परिणामस्वरूप और कई जो शुरुआत में शामिल नहीं थे बाद में युद्ध में शामिल हो गए। युद्ध की कुछ मुख्य घटनाएँ हैं मार्को पोलो पुल हादसा (राष्ट्रवादी चीन और जापान के बीच लड़ा गया), ऑपरेशन बारबोसा (जर्मनी द्वारा सोविअत संघ पर आक्रमण) की शुरुआत और पर्ल हार्बर और ब्रिटिश औरडच कालोनियों पर दक्षिण पूर्व एशिया में हमला.

1945 में मित्र राष्ट्रों की विजय के साथ युद्ध समाप्त हो गया।सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका युद्ध के बाद दुनिया की महाशक्तियों के रूप में उभरे, जिससे शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई, जो की अगले 45 वर्षों तक चली.संयुक्त राष्ट्र एक और ऐसे संघर्ष को रोकने की आशा में बनाया गया।आत्म निर्धारण की स्वीकृति ने एशिया और अफ्रीका में गैर उपनिवेशवाद आन्दोलनों को गति प्रदान की, जबकि पश्चिमी यूरोप स्वयं एकीकरण की ओर बढना शुरू हो गया।

पृष्ठभूमि[संपादित करें]

प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात, पराजित जर्मनी ने वर्साय की सन्धि पर हस्ताक्षर किये.[5] इसकी वजह से जर्मनी को अपनी भूमि के एक बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ा, दूसरे राज्यों पर कब्जा करने की पाबन्दी लगा दी गयी, उनकी सेना का आकार सीमित कर दिया गया और भारी क्षतिपूर्ति थोप दी गयी। रूस के गृहयुद्ध ने सोवियत संघ का निर्माण किया, जो की जल्द ही जोसेफ स्टालिन के नियंत्रण में आ गया। इटली में बेनिटो मुसोलिनी ने एक फ़ासिस्ट तानाशाह के रूप में सत्ता पर कब्जा किया "नया रोमन साम्राज्य" बनाने का वादा करते हुए.[6] 1920 के दशक के मध्य में चीन के कुओमिन्टांग(KMT) दल ने स्थानीय सरदारों के खिलाफ एक एकीकरण अभियान शुरू किया और कुछ हद तक चीन को एकीकृत भी कर दिया, लेकिन जल्द ही अपने पूर्व चीनी कम्युनिस्ट सहयोगियों के साथ ये गृह युद्ध में उलझ गयी। 1931 में, तेजी से बढ रहे सैन्यवादी जापानी साम्राज्य, जिसकी चीन पर प्रभाव डालने की लम्बे समय से मंशा थी, एशिया पर शासन करने के अधिकार के लिए, अपने पहले कदम के रूप में[7], मुकदेन हादसे को मंचूरिया पर आक्रमण के औचित्य के रूप में प्रयोग किया; दोनों देशों ने 1933 में हुई टांगू संधि तक कई छोटे संघर्ष शंघाई, रेहे और हीबेई में लड़े इसके बाद चीनी स्वयंसेवक बलों ने मंचूरिया और चाहार और सुइयान में जापानी आक्रमण के प्रति अपना प्रतिरोध जारी रखा.

१९३५ की न्यूरेमबर्ग रैली में जर्मन सैनिक दल

एडॉल्फ हिटलर, 1923 में जर्मन सरकार को गिराने के एक असफल प्रयास के बाद, 1933 में जर्मनी के नेता बने. उन्होंने लोकतंत्र को समाप्त कर दिया और दुनिया के लिए एक कट्टरपंथी जातिवादी प्रेरित नजरिये के संशोधन को बढ़ावा देना शुरू किया।[8] इससे फ्रांस और ब्रिटेन चिंतित हो गए, क्योंकि पिछले युद्ध में वे बहुत कुछ हार चुके थे, साथ ही इटली भी, जिसे अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को जर्मनी के द्वारा खतरा महसूस होने लगा.[9] अपने गठबंधन को सुरक्षित करने के लिए फ्रांस ने इटली को इथियोपिया, जिस पर वो विजय पाना चाहता था, में खुली छूट दे दी.1935 के शुरू में यह स्थिति बहुत बिगड़ गई जब सारलैंड कानूनी रूप से जर्मनी के साथ फिर से मिल गया और हिटलर ने वर्साइल संधि को अस्वीकार कर दिया, हथियारबंदी भी तेजी से बढने लगी और सेना में जबरी भर्ती की शुरुआत कर दी.जर्मनी को रोकने की मंशा से, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली ने स्ट्रीसा मोर्चा बनाया.पूर्वी यूरोप के विशाल क्षेत्रों को हथियाने के जर्मनी के लक्ष्य के कारण सोवियत संघ चिंतित था, इसलिए उसने फ्रांस के साथ पारस्परिक सहायता की एक संधि की.

हालांकि, इस फ्रेंको-सोवियत संधि को प्रभाव लेने से पहले लीग ऑफ नेशंस की नौकरशाही के माध्यम से जाना अनिवार्य था, इसलिए ये बिना किसी प्रभाव की होकर रह गयी।[10][11] जून 1935 में, यूनाइटेड किंगडम ने जर्मनी के साथ एक स्वतंत्र नौसेना करार किया और पूर्व के प्रतिबंधों में ढील दे दी.यूरोप और एशिया की घटनाओं के कारण चिंतित संयुक्त राज्य अमेरिका ने अगस्त में तटस्थता अधिनियम पारित किया।[12] अक्टूबर में, इटली ने इथोपिया पर आक्रमण किया, जर्मनी अकेला ऐसा प्रमुख यूरोपीय देश था जिसने इस आक्रमण में उसका समर्थन किया। इटली ने जर्मनी के ऑस्ट्रिया को एक अनुचर राज्य बनाने के उद्देश्य से आपत्तियों को हटा लिया।[13]

वर्साइल तथा लोकार्नो संधियों के सीधे उल्लंघन में, हिटलर ने मार्च 1936 में राइनलैंड को पुनः हथियारबंद कर दिया. उसे अन्य यूरोपीय शक्तियों से नाममात्र ही प्रतिसाद प्राप्त हुआ .[14] जब जुलाई में स्पेनी गृहयुद्ध प्रारंभ हुआ, हिटलर और मुसोलिनी ने गृह युद्ध में सोवियत समर्थित स्पेन के गणराज्य के ख़िलाफ़ फ़ासिस्ट जनरलिज़्मों फ्रांसिस्को फ्रेंको की राष्ट्रवादी ताकतों का समर्थन किया। दोनों पक्षों ने नए हथियारों और युद्ध के तरीकों का परीक्षण करने के लिए संघर्ष का इस्तेमाल किया[15]. और 1939 के शुरुआत में ही राष्ट्रवादी विजयी साबित हो गए।

बढ़ते तनाव के साथ, शक्ति को संगठित और सुदृढ़ करने के प्रयास होने लगे. अक्टूबर में, जर्मनी और इटली ने रोम-बर्लिन धुरीबनाई और एक महीने के बाद जर्मनी और जापान, दोनों ने इस विश्वास के साथ की साम्यवाद और विशेष रूप से सोवियत संघ से खतरा है, कोमिन्तर्न विरोधी संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसमें इटली आने वाले साल में शामिल हो गया। चीन में, कुओमिन्तांग और साम्यवादी शक्तियां जापान का विरोध करने के लिए एक संयुक्त मोर्चा पेश करने के इरादे से युद्धविराम पर सहमत हो गयीं.[16]

कालक्रम[संपादित करें]

युद्ध की शुरुआत को आम तौर पर 1 सितम्बर 1939 को जर्मनी के पोलैंड पर आक्रमण के साथ माना जाता है। युद्ध की शुरुआत के लिए अन्य तारीखों में शामिल हैं 13 सितंबर 1931 में मंचुरिया पर जापानी आक्रमण,[17] द्वितीय चीन-जापान युद्ध की 7 जुलाई 1937 को शुरुआत,[18][19] या अन्य कई घटनाओं में से एक. अन्य स्रोत ए. पी. जे. टेलर का ही पालन करते हैं, जिसका मानना है कि पूर्व एशिया में उसी समय चीन- जापान युद्ध जारी था और यूरोप और उसके उपनिवेशों में द्वितीय यूरोपीय युद्ध चल रहा था, लेकिन वे 1941 में विलय से पहले विश्व युद्ध का रूप नहीं ले पाए; इस बिंदु से युद्ध 1945 तक जारी रहा.यह अनुच्छेद पारंपरिक तिथियों का इस्तेमाल करता है।[20]

युद्ध के अंत की भी कई तिथियाँ हैं। कुछ सूत्रों का कहना है 14 अगस्त 1945 के युद्धविराम से इसका अंत हुआ, जापान के औपचारिक आत्मसमर्पण के बजाय (2 सितम्बर 1945); कुछ यूरोपीय इतिहासों में यह वी-ई दिवस (8 मई 1945) को समाप्त हुआ। जापान के साथ शांति संधि पर 1951 तक हस्ताक्षर नहीं हुए थे।

युद्ध की दिशा[संपादित करें]

इन्हें भी देखें: Timeline of World War II

चीन में युद्ध[संपादित करें]

वुहान के युद्घ के दौरान जापानी सेनायें

१९३७ के मध्य में,मार्को पोलो पुल हादसे के बाद, जापान ने चीन पर सम्पूर्ण आक्रमण प्रारंभ कर दिया.सोवियत संघ ने तुंरत ही चीन का समर्थन कर दिया, इसी के साथ चीन का जर्मनी के साथ सहयोग प्रभावी ढंग से समाप्त हो गया।शंघाई से शुरू करते हुए, जापानियों ने चीनी सेना को पीछे धकेल दिया और दिसम्बर में राजधानी नैनजिंग पर अधिकार जमा लिया। जून 1938 में चीनी सेनाओं ने पीली नदी (Yellow River) में बाढ़ लाकर जापानियों के कदमों को रोक दिया; यद्यपि इससे उन्हें वुहान शहर में सुरक्षा की तैयारी करने के लिए समय मिल गया, लेकिन फिर भी अक्टूबर तक शहर उनके हाथ से निकल गया।[21] इस समय के दौरान, जापानी और सोवियत सेनाओं में एक मामूलीझड़प खासन झील पर जारी थी; मई 1939 में, उनमें एक अधिक गंभीर सीमा युद्ध शुरू हो गया[22] जिसका अंत 15 सितंबर को एक संघर्ष विराम समझौते पर हस्ताक्षर और यथास्थिति बहाली के साथ हुआ।[23]

यूरोप में युद्ध की शुरुआत[संपादित करें]

यूरोप में, जर्मनी और इटली अधिक निर्भीक होते जा रहे थे। मार्च 1938 में, जर्मनी ने आस्ट्रिया पर कब्जा कर लिया, एक बार पुनः अन्य यूरोपीय शक्तियों द्वारा नाम मात्र की ही प्रतिक्रिया हुई.[24] प्रोत्साहित होकर, हिटलर ने सुड़ेटेनलैंड, चेकोस्लोवाकियाका एक हिस्सा जहाँ पर मुख्य रूप से जातिगत ज़र्मन आबादी रहती थी, पर ज़र्मन अधिकार के लिए दबाव बढ़ावा शुरू कर दिया; फ्रांस और ब्रिटेन ने उसको ये भूमि, चेकोस्लोवाकिया सरकार की इच्छा के विरुद्ध, इस शर्त पर लेने दी कि आगे उसकी कोई मांग नहीं होगी.[25] हालांकि, उसके बाद जल्दी ही, जर्मनी और इटली ने चेकोस्लोवाकिया को बाध्य कर दिया कि वो हंगरी और पोलैंड को अतिरिक्त भूमि दे. मार्च 1939 में जर्मनी ने चेकोस्लोवाकियाके पिछले हिस्से पर आक्रमण कर दिया और उसे जर्मन संरक्षित बोहेमिया व मोराविया और जर्मन समर्थक स्लोवाक गणराज्य में विभाजित कर दिया.

भयभीत हो कर, और हिटलर द्वारा की गई दान्जिग पर आगे की मांगों के कारण, फ्रांस और ब्रिटेन ने पोलिश की आज़ादी के लिए समर्थन देने का आश्वासन दे दिया; जब अप्रैल, 1939 में इटली ने अल्बानिया पर विजय प्राप्त की, यही आश्वसव रोमानिया और ग्रीस को भी प्रदान कर दिया गया।[26]फ्रेंको-ब्रिटिश द्वारा पोलैंड को दी गई प्रतिज्ञाओं के फौरन बाद, जर्मनी और इटली ने इस्पात की संधि (Pact of Steel) के साथ अपने गठजोड़ को औपचारिक बनाया.[27]

अगस्त 1939 में जर्मनी और सोवियत संघ ने गैर आक्रामकता संधि पर हस्ताक्षर किए.[28] इस संधि में एक गुप्त प्रोटोकोल शामिल था जिसके अनुसार पोलैंड और पूर्वी यूरोप को अलग अलग प्रभाव वाले क्षेत्रों में विभाजित करने कि योजना शामिल थी।[29]

चित्र:German Soviet.jpg
पोलैंड, सितंबर 1939 में सोवियत और जर्मन अधिकारियों.

1 सितम्बर 1939 को, एडॉल्फ हिटलर ने पोलैंड पर आक्रमण किया और द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। फ्रांस, ब्रिटेन और राष्ट्रमंडल के देशों ने जर्मनी पर युद्द घोषित कर दिया, लेकिन पोलैंड को कोई सैन्य सहायता प्रदान नहीं की, सारलैंड पे एक छोटे फ्रांसीसी हमले के सिवाय.[30] 17 सितंबर 1939, को जापान के साथ एक युद्धविराम पर हस्ताक्षर करने के बाद पर, सोवियत संघ ने पोलैंड पर अपने आक्रमण की शुरूआत की.[31] अक्टूबर कि शुरुआत तक, अभियान कि समाप्ति पोलैंड के जर्मनी, सोवियत संघ, लिथुआनिया और स्लोवाकिया[32] के बिच विभाजन के साथ हुई, हालाँकि अधिकारिक तौर पर पोलैंड ने कभी भी आत्मसमर्पण नहीं किया था.

पोलैंड में लड़ाई के दौरान, जापान ने चांग्शा, एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चीनी शहर, के खिलाफ अपना पहला हमला किया, लेकिन अक्टूबर तक ही उसको पीछे धकेल दिया गया।[33]

पोलैंड के आक्रमण के बाद, सोवियत संघ नेबाल्टिक राज्यों में सैनिकों को आगे बढाना शुरू कर दिया.नवम्बर के अंत में सोवियत संघ द्वारा डाले गए इसी तरह के दबाव के विरुद्ध फिनिशों के प्रतिरोध के कारण शीतकालीन युद्ध आरंभ हुआ, जो की फ़िनिश रियायतों के साथ ही समाप्त हुआ।[34] फ्रांस और ब्रिटेन ने, फिनलैंड पर सोवियत हमले को जर्मनी की ओर के युद्ध में प्रवेश करने के समान मानते हुए, सोवियत आक्रमण का जवाब लीग ऑफ नेशंस से उसके निष्कासन के रूप में दिया. हालाँकि चीन के पास इसको रोकने का अधिकार था, लेकिन ख़ुद को पश्चिमी शक्तियों या सोवियत संघ से विमुख करने के लिए तैयार न होने के कारण उसने स्वयं को विमुख कर लिया। सोवियत यूनियन इससे अप्रसन्न हो गया और परिणाम स्वरुप चीन को सारी सैन्य सहायता को निलंबित कर दिया.[35] जून 1940 तक, सोवियत सशस्त्र बलों के बाल्टिक राज्यों के कब्जे को पूरा कर लिया।[36]

फ्रांस के पतन के बाद पेरिस में जर्मन सैन्य दल.

पश्चिमी यूरोप में, ब्रिटिश सैनिकों को महाद्वीप में तैनात किया गया, लेकिन जर्मनी और मित्र राष्ट्रों दोनों में से किसी ने भी एक दूसरे पर सीधे प्रहार नहीं किए.सोवियत संघ और जर्मनी ने फ़रवरी 1940 में एक व्यापर संधि में प्रवेश किया, इसके अनुसार सोवियत को जर्मनी के सैन्य और औद्योगिक उपकरण प्राप्त हुए, इसके बदले में उन्हें ब्रिटिश नाकाबंदी को नाकाम करने के लिए जर्मनी को कच्चे माल की आपूर्ति करनी पड़ी.[37] अप्रैल में, जर्मनी ने स्वीडन से लौह-अयस्क की शिपमेंट, जिसको मित्र राष्ट्र नष्ट करने की कोशिश करते, को सुरक्षित करने के लिए डेनमार्क और नॉर्वे पर आक्रमण किया। डेनमार्क ने तुंरत ही आत्म-समर्पण कर दिया और मित्र राष्ट्रों के समर्थन के बावजूद, नॉर्वे भी दो महीने के भीतर ही धराशायी हो गया।[38] ब्रिटेन का नार्वेजियन अभियान के प्रति असंतोष विंस्टन चर्चिल के द्वारा 10 मई 1940 को किए गए प्रधानमंत्री नेविले चेम्बरलिन के प्रतिस्थापन का कारण बना.[39]

धुरी राष्ट्र बढ़ते हैं[संपादित करें]

उसी दिन, जर्मनी नेफ्रांस और निचले देशों पर आक्रमण कर दिया.नीदरलैंड्स और बेल्जियम को कुछ हफ्तों में तूफानी हमले की रणनीति का उपयोग करके धराशायी कर दिया गया। फ्रांस की फोर्टीफाइड मैगिनोट रेखा को आर्देनेस क्षेत्र, जिसको फ्रांस के द्वारा गलती से बख़्तरबंद वाहनों के खिलाफ एक अभेद्य प्राकृतिक बाधा माना जा रहा था, को घेर लिया गया। ब्रिटिश सैनिकों को महाद्वीप को, महीने के अंत तक भारी उपकरणों को छोड़ कर, दनकिर्क में खाली करने के लिए मजबूर कर दिया गया। १० जून को, इटली ने फ्रांस और ब्रिटेन दोनों पर हमले की घोषणा करके आक्रमण किया;[40] बारह दिनों के बाद फ्रांस ने आत्म-समर्पण किया और उसे तुंरत जर्मन और इतालवी अधिकार क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया[41] और विशी शासन के तहत एक अनधिकृत अवशिष्ट भाग रखा गया। 14 जुलाई को, ब्रिटेन ने अल्जीरिया स्थित फ्रांसीसी बेड पर आक्रमण कर दिया ताकि उसकी संभावित जब्ती को रोका जा सके.[42]

RAF सुपरमरीन स्पिटफायर, जिसका ब्रिटेन के युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया

फ्रांस की पराजय के बाद, जर्मनी ने एक आक्रमण के लिए तैयारी करने के लिए ब्रिटेन पर हवाई श्रेष्ठता अभियान शुरू कर दिया (ब्रिटेन की जंग).[43] अभियान विफल रहा और सितम्बर में आक्रमण योजनाओं को रद्द कर दिया गया। नव-अधिकृत फ्रांसीसी बंदरगाहों का उपयोग करते हुए, जर्मन नौसेना ने रॉयल नौसेना के विरुद्ध सफलता पायी, अटलांटिक में ब्रिटिश पोतों के विरुद्ध यू-नावों के उपयोग के द्वारा.[44] इटली ने भूमध्य में अपना अभियान प्रारंभ किया, जून में माल्टा की घेराबंदीकी, अगस्त में ब्रिटिश सोमालीलैंड पर विजय प्राप्त की और सितम्बर के शुरू में ब्रिटिश-अधिकृत मिस्र के ऊपर चढाई की. जापान ने सितम्बर में, अब-पृथक हुए फ्रांसीसी हिन्दचीन के उत्तरी भाग में कई स्थानों को हड़प कर, चीन पर नाकाबंदी बढ़ा दी.[45]

इस पूरी अवधि के दौरान, तटस्थ संयुक्त राज्य ने चीन और पश्चिमी मित्र राष्ट्रों की सहायता के लिए उपाय किए.नवम्बर 1939 में, अमेरिका का तटस्थता अधिनियम मित्र राष्ट्रों द्वारा 'नकद और मुद्रिक' खरीद की अनुमति के लिए संशोधित कर दिया गया।[46] 1940 में, पेरिस में जर्मन कब्जे के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका की नौसेना के आकार में उल्लेखनीय वृद्धि की गयी और हिन्दचीन पर जापान के आक्रमण के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान के विरुद्ध लोहा, इस्पात और यांत्रिक भागों की घाटबंधी कर दी.[47] सितंबर में, अमेरिका ने ब्रिटिश ठिकानों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के विध्वंसकों के व्यापार को और आगे बढाने के लिए सहमती दी.[48] फिर भी, अमेरिकी जनता का एक बड़ा बहुमत १९४१ तक में संघर्ष में किसी भी प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप का विरोध करता रहा था।[49]

सितम्बर के अंत में जापान, इटली और जर्मनी के बीच त्रिपक्षीय संधि (Tripartite Pact) ने धुरिय शक्तियों को औपचारिकता प्रदान की. संधि के अनुसार, कोई देश, सोवियत संघ के आलावा, जो युद्द में नही है अगर उसने ध्रुवीय शक्तियों पर आक्रमण किया, तो उसको तीनों के खिलाफ युद्ध में जाने के लिए मजबूर किया जाएगा.[50] सोवियत संघ ने त्रिपक्षीय संधि में शामिल होने में रुचि दिखाई. उसने नवम्बर में जर्मनी को एक संशोधित मसौदा भेजा, जिसमें एक बहुत ज़र्मन-अनुकूल आर्थिक सौदा प्रस्तावित किया,[51] हालाँकि जर्मनी पहले वाले मसौदे के लिए तो चुप रहा, पर उसने बाद वाले सौदे को स्वीकार कर लिया.[52] संधि के बावजूद, अमेरिका चीन और ब्रिटेन का समर्थन करता रहा. इसके लिए उसने उधार और किराये पर देने की नीति को प्रस्तावित किया[53] और एक सुरक्षा क्षेत्र की स्थापना की जिसका विस्तार लगभग आधे अटलांटिक महासागर में था और जहाँ अमेरिकी नौसेना ब्रिटिश दलों को सुरक्षा प्रदान करती थी।[54] परिणामस्वरूप, अक्टूबर 1941 तक उत्तरी अटलांटिक में जर्मनी और अमेरिका निरंतर एक, भले ही अघोषित, नौसैनिक संघर्ष में उलझे रहे, हालाँकि आधिकारिक तौर पर अमेरिका तटस्थ ही बना रहा.[55]

धुरी राष्ट्रों ने नवंबर १९४० में अपना विस्तार किया जब हंगरी, स्लोवाकिया और रोमानिया त्रिपक्षीय संधि में शामिल हो गए।[56][56] में[56] इन देशों ने सोवियत संघ के ऊपर बाद के आक्रमण में भाग लिया है, जिसमें रूमानिया का सबसे बड़ा योगदान था सोवियत संघ से अपनी अधिग्रहीत भूमि को छुडाने के लिए और अपने नेता आयन एन्तोनेस्क्यू के साम्यवाद के प्रति लड़ने की इच्छा के लिए.[57]

अक्टूबर में, इटली ने ग्रीस पर आक्रमण किया लेकिन कुछ ही दिनों में अल्बानिया में वापस खदेड़ दिया गया, जहाँ एक गतिरोध उत्पन्न हो गया।[58] इसके फौरन बाद, अफ्रीका में, राष्ट्रमंडल सेनाओं ने मिस्र और ऑपरेशन कम्पासइतालवी पूर्वी अफ्रीका के विरुद्ध आक्रमण शुरू किया। 1941 की शुरुआत में, राष्ट्रमंडल द्वारा इतालवी सेनाओं का लीबिया में वापस धकेले जाने के साथ, चर्चिल ने यूनानियों के समर्थन के लिए अफ्रीका से सेनाओं की रवानगी के लिए आदेश दिया.इटली की नौसेना को भी महत्त्वपूर्ण झटके लगे, टारन्टो में वाहक हमले के द्वारा तीन इतालवी जंगी जहाजों को रायल नौसेना द्वारा निष्क्रिय कर दिया गया और केप मतापन में अन्य कई युद्धपोतों को निष्क्रिय कर दिया गया।[59]

जर्मन पैराट्रूपरों का क्रीट पर आक्रमण

जर्मन ने जल्द ही इटली की सहायता करने के लिए हस्तक्षेप किया। फरवरी में हिटलर ने जर्मन सेनाओं को लीबिया के लिए भेजा और मार्च के अंत तक उन्होंने घटे हुए राष्ट्रमंडल बलों के खिलाफ आक्रमण शुरू किया.एक महीने के अन्दर, राष्ट्रमंडल बलों को घिरे हुए तोब्रुक बंदरगाह के सिवाय, वापिस मिस्र में धकेल दिया गया। राष्ट्रमंडल ने पहले मई में और फिरदोबारा जून में धुरीय सेनाओं को हटाने का प्रयास किया, लेकिन दोनों ही मौकों में असफल रहा.अप्रैल की शुरुआत में जर्मनी ने उसी प्रकार बल्कंस में हस्तक्षेप किया, ग्रीस औरयोगुस्लाविया पर आक्रमण करके; यहाँ भी उन्होंने ने तेजी से प्रगति की और अंततः मई के अंत तक जर्मनी के द्वारा क्रीट के यूनानी द्वीप पर विजय प्राप्त करने के बाद मित्र राष्ट्रों भागने के लिए विवश कर दिया.[60].

हालांकि इस समय के दौरान भी मित्र राष्ट्रों ने कुछ सफलताएँ प्राप्त की हैं।मध्य पूर्व में, राष्ट्रमंडल बलों ने पहले इराक में सत्ता पलट की चेष्टा को नाकाम किया जिसका विशी-नियंत्रित सीरिया के भीतरी ठिकानों के जर्मन विमान द्वारा समर्थन किया जा रहा था,[61] फिर, आजाद फ्रांस की सहायता से, आगे इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सीरिया और लेबनान पर आक्रमण किया।[59] अटलांटिक में, ब्रिटिश ने जर्मन के प्रमुख बिस्मार्क्क जहाज को डुबोकर जनता के मनोबल को भारी मात्र में बढ़ावा दिया.[62] शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, रॉयल एयर फोर्स ने लूफ़्टवाफ के हमले का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया और 11 मई 1941 को हिटलर ने ब्रिटेन के बमबारी अभियान को समाप्त कर दिया.[63]

एशिया में, दोनों पक्षों द्वारा कई हमलों के बावजूद, 1940 तक चीन और जापान के बीच के युद्द में गतिरोद्ग उत्पन्न हो गया। उस वर्ष के अगस्त में, चीनी कम्युनिस्टों ने सेंट्रल चीन में एक आक्रमण शुरू किया; प्रतिशोध में, जापान ने कम्युनिस्टों के लिए मानव और भौतिक संसाधनों को कम करने के लिए अधिकृत क्षेत्रों में कठोर उपायों (थ्री औल्स की नीति) को संस्थापित किया।[64] जनवरी 1941 में चीनी कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी ताकतों के बीच निरंतर चल रहा तनाव सशस्त्र झगडों में तब्दील हो गया, परिणामस्वरूप प्रभावी रूप से उनका आपसी सहयोग समाप्त हो गया।[65]

यूरोप और एशिया की तुलनात्मक स्थिर स्थिति के साथ, जर्मनी, जापान और सोवियत संघ ने तैयारियां शुरू कीं.सोवियत संघ के जर्मनी के साथ बढ़ते तनाव के साथ और दक्षिण पूर्व एशिया में संसाधन समृद्ध यूरोपीय अधिकृत क्षेत्रों पर कब्जे द्वारा यूरोपीय युद्ध से लाभ उठाने की जापान की योजना के साथ, अप्रैल, 1941 में दोनों शक्तियों ने सोवियत-जापान तटस्थता करार पर हस्ताक्षर किए.[66] इसके विपरीत, जर्मन, सोवियत सीमा पर सेनाएं एकत्रित करते हुए, सोवियत संघ पर एक हमले के लिए तैयारी कर रहे थे।[67]

युद्ध वैश्विक हो जाता है[संपादित करें]

चित्र:Ger Inf Russia 1941 HDSN9902655.JPEG
सोवियत संघ के आक्रमण में जर्मन सैनिक, १९४१

22 जून 1941 को जर्मनी ने अन्य यूरोपियन धुरी राष्ट्र सदस्यों और फिनलैंड के साथ मिल कर, ऑपरेशन बार्बोसा के तहत सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया. इस अकस्मात् चढाई[68] के प्राथमिक लक्ष्य बाल्टिक क्षेत्र, मॉस्को और युक्रेन थे। जबकि कैस्पियन और श्वेत सागर को जोड़ने वाली ए-ए रेखा के निकट इस १९४१ के अभियान को समाप्त करना इसका अंतिम लक्ष्य था। हिटलर के उद्देश्य थे सोवियत संघ को एक सैन्य शक्ति के रूप में समाप्त करना, साम्यवाद का विनाश, स्थानीय लोगों[69]. से छीन कर एक 'रहने के स्थान'[70] का निर्माण करना और जर्मनी के बचे हुए शत्रुओं का विनाश करने के लिए सामरिक संसाधनों की उपलब्धता के प्रति आश्वस्त होना.[71] हालाँकि युद्ध से पहले लाल सेना रणनीतिक जवाबी हमले की तैयारी कर रही थी[72] बार्बोसा ने सोवियत की सर्वोच्च कमान को रणनीतिक सुरक्षा अपनाने के लिए मजबूर कर दिया. गर्मियों के दौरान, धुरी राष्ट्रों ने सोवियत क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण सफलताएँ अर्जित कीं, वस्तुओं और लोगों को भारी क्षति पहुंचाई.हालांकि, अगस्त के मध्य तक, जर्मन सेना हाई कमान ने क्षतिग्रस्त सेना समूह केंद्र के आक्रमण को स्थगित करने का फैसला कर लिया और द्वितीय पान्जेर समूह को सेन्ट्रल युक्रेन और लेनिनग्राड की तरफ बढ़ रही सेना को मजबूती प्रदान करने के लिए उनकी तरफ मोड़ दिया.[73]कीव का आक्रमण अत्यंत सफल रहा, परिणामतः चार सोवियत सेनाओं का घेर कर सफाया कर दिया गया और क्रीमिया और औधोगिक रूप से विकसित पूर्वी युक्रेन (खार्कोव की प्रथम लडाई) में और आगे बढ़ने को संभव बना दिया.

ख्रेश्चात्य्क, कीव की मुख्य सड़क, जर्मन बमबारी के बाद.

धुरी राष्ट्र सेनाओं के तीन चौथाई हिस्से को सेंट्रल भूमध्य और फ्रांस से हटाकर पूर्वी मोर्चे[74] पर भेजने के फैसले[75], ने ब्रिटेन को अपनी ग्रैंड रणनीति पर पुनर्विचार करने पर बाध्य किया।[76] जुलाई में, ब्रिटेन और सोवियत संघ ने जर्मनी के ख़िलाफ़ एक सैन्य गठबंधन का गठन किया[77] और कुछ ही समय के बाद संयुक्त रूप से फारसी गलियारे और ईरान के तेल क्षेत्रों को सुरक्षित करने के लिए ईरान पर हमला किया.[78] अगस्त में, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका ने संयुक्त रूप से अटलांटिक घोषणापत्र जारी किया।[79] नवम्बर में, राष्ट्रमंडल बलों ने एक जवाबी हमला किया, ऑपरेशन क्रूसेडर, उत्तरी अफ्रीका में और जर्मनी और इटली द्वारा जीते गए सभी हिस्सों को वापस छुडा लिया।[80]

जापान ने पिछले वर्ष दक्षिणी इंडोचायना पर सैन्य कब्जा किया था, इसका एक कारण आपूर्ति मार्गों को अवरुद्ध करके चीन पर दबाव बढ़ाना था और इसलिए भी ताकि पश्चिमी शक्तियों से युद्ध की स्थिति में जापानी सेनाओं को बेहतर स्थिति में रखा जा सके.जापान, यूरोप में जर्मनी की सफलता का फायदा उठाने की उम्मीद से, डच ईस्ट इंडीज के तेल की एक स्थिर आपूर्ति सहित कई मांगें रखता है;हालाँकि ये प्रयास जून 1941 में विफल हो गए।[75] अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी सरकारों ने जापान के इन्दोचाइना पर कब्जे का विरोध जापानी परिसंपत्तियों पर रोक के साथ किया। जबकि अमेरिका ने (जो की जापान के तेल की 80% आपूर्ति करता था)[81]. ने उसपर पूर्ण तेल निषेध थोप कर इसका जवाब दिया.[82] चीन के विरुद्ध अपने अभियान को और एशिया में अपनी महत्वाकांक्षा को छोड़ देना, या फिर जिन प्राकृतिक संसाधनों की उसको जरुरत थी उनपर बल पूर्वक कब्जा करना- मूलतः जापान को इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए बाध्य होना पड़ा; जापानी सेना पहले वाले को एक विकल्प के तौर पर नहीं मानती थी और कई अधिकारी उन पर थोपे गए तेल घाटबंधी को एक अघोषित युद्ध की तरह मानते थे।[83] सेंट्रल प्रशांत तक विस्तृत एक बड़ी सुरक्षात्मक परिधि बनाने के लिए, जापानी इम्पीरियल जनरल मुख्यालय ने एशिया में यूरोपीय कालोनियों पर तेजी से कब्जा करने की रणनीति बनायीं; इस प्रकार जापानी दक्षिण पूर्व एशिया के संसाधनों का दोहन करने के लिए स्वतंत्र रहते, जबकि घटी हुई शक्ति वाले मित्र राष्ट्रों को एक सुरक्षात्मक लडाई के द्वारा थका दिया जाता. परिधि को सुरक्षा प्रदान करते समय अमेरिकी हस्तक्षेप को रोकने के लिए, शुरुआत से ही संयुक्त राज्य के पैसिफिक बेड़े को बेअसर करने की योजना बनायी गयी।[84]

अक्टूबर तक, जब धुरी राष्ट्र के युक्रेन और बाल्टिक क्षेत्रों के लक्ष्यों की पूर्ति हो चुकी थी, केवल लेनिनग्राद[85] और सेवास्तोपोलकी लडाई ही जारी थी[86], मॉस्को के खिलाफ एक बड़े आक्रमण का नवीकरण किया गया। दो महीने की भीषण लडाई के बाद, जर्मन सेना मॉस्को के लगभग बाहरी उपनगर तक पहुँच गयी, लेकिन वहा पर थकी हुई सेनाओं[87] को अपना आक्रमण निलंबित करने के लिए मजबूर होना पड़ा.[88] प्रभावशाली प्रादेशिक बढ़त के बावजूद, धुरिय अभियान अपने मुख्य उद्देश्यों को हासिल करने में असफल रहा: दो प्रमुख शहर सोवियत के ही पास रहे, सोवियत की विरोध की क्षमता ख़तम नहीं हुई और सोवियत संघ अपनी सैन्य क्षमता के एक महत्वपूर्ण हिस्सा को बनाये रख सका. यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध के तूफानी हमले के चरण का समापन हो गया था। [89]

जापानी सैनिकों कुआलालंपुर से बढ़ते.

दिसम्बर की शुरुआत तक, ताजे जुटाए गए भंडारों[90] ने सोवियत को धुरिय सेनाओं के साथ संख्यात्मक समता प्राप्त करने में मदद की.[74] इसने और साथ ही साथ इस खुफिया जानकारीने कि सोवियत की पूर्व में कम से कम इतनी सेना मौजूद है जो की जापान की क्वान्तुंग सेनाके हमले को रोक सकती है,[91] ने सोवियत को 5 दिसम्बर को अपनी 1000 किमी कि सीमा पर एक विशाल जवाबी हमला करने और जर्मन सेना को 100-250 किमी पश्चिम की तरफ पीछे धकेलने की अनुमति प्रदान की.[92]

दो दिन बाद, 7 दिसम्बर को (8 दिसम्बर एशियाई समय क्षेत्र के अनुसार), जापान ने ब्रिटिश, डच और अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया और लगभग साथ ही साथ दक्षिण पूर्व एशिया और प्रशांत सेंट्रल के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया.इनमे शामिल थे पर्ल हार्बर में अमेरिकी बेड़े पर हमला और थाईलैंड और मलाया में उतरना.

इन हमलों ने संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, अन्य पश्चिमी सहयोगियों और चीन (जो की पहले से ही द्वितीय चीन-जापान युद्धलड़ रहा था) को जापान पर औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा करने के लिए उकसाया.जर्मनी और त्रिपक्षीय संधि के अन्य सदस्यों ने संयुक्त राज्य अमेरिका पर हमले की घोषणा के द्वारा प्रतिक्रिया व्यक्त की.जनवरी में, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, सोवियत संघ, चीन और बाईस छोटी अथवा निर्वासित सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषणा जारी की जिसने अटलांटिक चार्टरकी पुष्टि कर दी.[93] सोवियत संघ ने घोषणा पत्र का पालन नहीं किया, जापान के साथ एक तटस्थता समझौते को बनाये रखा[94][95] और खुद को स्वनिर्धारण के सिद्धांत से मुक्त कर लिया।[79]

px225British जेहादी टैंक को उत्तरी अफ्रीका अभियान के दौरान स्थान के लिए आगे बढ़.

इस बीच, अप्रैल 1942 के अंत तक, जापान ने लगभग पूरी तरह से बर्मा, फिलीपींस, मलाया, डच ईस्ट इंडीज, सिंगापुर,[96] और राबौल के एक महत्त्वपूर्ण ठिकाने पर कब्जा कर लिया था, इस दौरान उसने मित्र देशों की सेनाओं को गंभीर नुकसान पहुँचाया और बड़ी संख्या में बंदी बनाये. जापानी सेनाओं ने दक्षिण चीन सागर, जावा सागर और हिंद महासागर में भी नौसेना जीत हासिल की[97] और मित्र राष्ट्रों के डार्विन, ऑस्ट्रेलिया स्थित नौसेना बेस पर बमबारी की.जापान के खिलाफ मित्र राष्ट्रों की एकमात्र सफलता जनवरी, 1942 की शुरुआत में आयी चान्ग्शू की विजय थी।[35] तैयारी रहित विरोधियों के ऊपर मिली इन आसन विजयों से जापान का आत्म विश्वास कुछ ज्यादा की बढ़ गया, साथ ही साथ संसाधनों के मामले में भी तनाव आ गया।[तथ्य वांछित]

जर्मनी ने भी पहल को बनाये रखा. अमेरिकी नौसेना के संदिग्ध फैसलों से फायदा लेते हुए, जर्मन नौसेना ने अमेरिकी अटलांटिक तट पर महत्वपूर्ण संसाधनों को नष्ट कर दिया.[98] भारी क्षति के बावजूद, यूरोपीय धुरी राष्ट्र के सदस्यों ने सेंट्रल और दक्षिणी रूस में सोवियत के एक विशाल हमले को रोक दिया और पिछले वर्षों के दौरान प्राप्त हुए सभी प्रादेशिक लाभों को बचाए रखने में सफल रहे.[74] उत्तरी अफ्रीका में, जर्मनी ने जनवरी में एक आक्रमण शुरू किया और फरबरी की शुरुआत तक ब्रिटिशों को गजाला रेखा के अड्डों तक पीछे खदेड़ दिया,[99]. इसके बाद युद्ध में एक अस्थायी विराम आया जिसका उपयोग जर्मनी ने आगामी हमलों की तैयारी के लिए किया।[100]

पासा पलटता है[संपादित करें]

मिडवे के युद्घ में अमेरिकी गोता बम.

मई के शुरू में, जापान ने द्विधा गतिवाले हमले के जरिये पोर्ट मोरेस्बी पर कब्जा करने के लिए आपरेशन शुरू किए और इस प्रकार संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच संचार की रेखा काट दी. तथापि, मित्र राष्ट्रों ने जापानी नौसैनिक बलों को रोका और वापस भेज दिया, इस प्रकार आक्रमण को रोक दिया गया।[101] जापान की अगली योजना, टोक्यो पर पूर्व की बमबारी द्वारा प्रेरित, मिडवे एटोल को जब्त करने और अमेरिका के वाहकों को फंसा कर नष्ट करने की थी; भटकाने के लिए, जापान ने ऐल्यूशियन द्वीप पर कब्जा करने के लिए भी सेनाओं को भेजा.[102] जापान ने जून की शुरुआत में अपने ओप्रेशंस को क्रियान्वित किया लेकिन अमेरिकी, जापानी नौसेना के कूटों को मई के अंत तक तोड़ चुकने के कारण, पूरी तरह से उनकी योजनाओं और बल व्यवस्थायों से परिचित थे और शाही जापानी नौसेना पर एक निर्णायक जीत पाने के लिए इस ज्ञान को इस्तेमाल किया।[103] मिडवे की लडाई के परिणाम ने आक्रामक कारवाई के लिए उनकी क्षमता को बहुत कम कर दिया, इसलिए जापान ने पापुआ के क्षेत्रमें थलचर अभियान द्वारा पोर्ट मोरेस्बी पर कब्जा करने के लिए एक विलम्बित प्रयास पर ध्यान केंद्रित करने को चुना.[67] अमेरिकियों ने दक्षिण में सोलोमन द्वीपसमूह में जापानी गतिविधियों के ख़िलाफ़, मुख्य रूप से गुआडलकैनाल, रबौल, जो कि दक्षिण पूर्व एशिया में जापान का मुख्य आधार है, पर कब्जे के पहले कदम के रूप में, जवाबी हमले की योजना बनाई.[104] दोनों योजनाएं जुलाई में शुरू हुईं, लेकिन सितम्बर के मध्य तक, गुआडलकैनाल के लिए लड़ाई जापानियों के लिए प्राथमिकता बन गयी और न्यू गिनी में सैनिकों को आदेश दिया गया की वे मोरेस्बी पोर्ट क्षेत्र से हटकर द्वीप के उत्तरी भाग में चले जाएँ, जहाँ पर उनका सामना ब्यूना-गोना की जंगमें ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका की फौजों से हुआ।[105] गुआडलकैनाल जल्द ही संघर्षण की लड़ाई में सैनिकों और जहाजों की भारी प्रतिबद्धताओं के साथ दोनों पक्षों के लिए एक केंद्र बिन्दु बन गया। 1943 के प्रारंभ तक, जापानी द्वीप पर हार गए और उन्होंने अपने सैनिकों को वापस बुला लिया।[106]

बर्मा में, राष्ट्रमंडल बलों ने दो आपरेशन शुरू किये. प्रथम, 1942 के अंत में अराकन क्षेत्र में एक आक्रामक अनर्थकारी हो गया, इसकी वजह से मई 1943 तक वापिस भारत आने के लिए मजबूर होना पड़ा.[107] दूसरा फरवरी में जापानी फ्रंट-लाईनों के पीछे अनियमित बलों की प्रविष्टि थी जिससे अप्रैल के अंत तक संदिग्ध परिणाम हासिल हुए.[108]

जर्मनी के पूर्वी मोर्चेपर, खार्कोव में तथा केर्च प्रायद्वीपमें मित्र राष्ट्रों ने सोवियत आक्रमणकारियों को हराया[109] और फिर जून, 1942 में, काकेशस के तेल क्षेत्रों को जब्त करने के लिए, दक्षिणी रूस जून के विरुद्ध उनके मुख्य ग्रीष्म आक्रमण को शुरू किया। सोवियत संघ ने स्टेलिनग्राद पर, जो बढती जर्मन सेनाओं के रास्ते में था, पर अपना मोर्चा बनाने का निश्चय किया। नवम्बर के मध्य तक जर्मन ने एक छोटी लड़ाई में लगभग स्टेलिनग्राड को हथिया लियाजब सोवियत संघ ने स्टेलिनग्राड में जर्मन बलों की घेराबंदी[110] करनी शुरू करते हुए, अपना दूसरा शीतकालीन जवाबी-हमलाऔर मॉस्को के निकट र्ज्हेव प्रमुख पर हमला शुरू किया, यद्यपि उत्तरार्द्ध को निराशाजनक असफलता मिली.[111] फरवरी के शुरू तक, जर्मन सेना का भरी नुक्सान हुआ था; स्टेलिनग्राद में उनके सैनिकों को आत्म-समर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया गया और गर्मियों के आक्रमण से पहले उनके अग्रिम मोर्चे को उसके स्थान से पीछे धकेल दिया गया। मध्य फरवरी में, सोवियत संघ के दबाव के कम होने के बाद, जर्मनों ने खार्कोव पर एक और हमला किया, रूस के कुर्स्क शहर के आसपास अपने अग्रिम मोर्चे में एक सेलिएंटका निर्माण किया।[112]

पश्चिम में, इस बात की चिंता की जापानी विची अधिकृत मेडागास्कर के अड्डों का उपयोग कर सकते हैं, कारण बनी ब्रिटेन के मई 1942 की शुरुआत में द्वीप पर आक्रमण की.[113] ये सफलता जल्दी ही हवा हो गयी जब धुरी राष्ट्रों ने लीबिया पर आक्रमण किया और मित्र राष्ट्रों को मिस्त्र तक तब तक पीछे धकेलते रहे जबतक धुरीय शक्तियों को एल अलामीन में रोक नहीं दिया गया.[114] महाद्वीप पर, रणनीतिक ठिकानों पर मित्र राष्ट्रों के कमांडो के छपे, जिनका समापन विनाशकारी दीएप छापों[115] .से हुआ, इसने काफी बेहतर तैयारी, उपकरणों और परिचालन सुरक्षा के बिना ही महाद्वीपीय यूरोप पर आक्रमण करने की पश्चिमी सहयोगियों की असमर्थता का प्रदर्शन किया।[116] अगस्त में, मित्र राष्ट्र एल अलामीन के खिलाफ दूसरे हमले को रोकने में सफल रहे और, अधिक कीमत पर, घिरे हुए माल्टा के लिए अति आवश्यक आपूर्ति को पहुँचाने में कामयाब रहे.[117] कुछ महीनों के बाद धुरीय सेनाओं को बाहर करते हुए और लीबिया के पार पश्चिम में प्रवेश की शुरुआत करते हुए, मित्र राष्ट्रों ने अपने बल पर ही मिस्र पर एक हमले की शुरुआत की.[118] इसके कुछ ही देर बाद फ्रांसीसी उत्तरी अफ्रीका पर आंग्ल-अमेरिकी आक्रमण हुआ, जिसके परिणामस्वरुप ये क्षेत्र मित्र राष्ट्रों के साथ शामिल हो गए। फ्रेंच उपनिवेश के पला बदलने की प्रतिक्रिया में हिटलर ने विची फ्रांस के अधिग्रहण[119][120] अफ्रीका में दबाव में आई धुरीय सेनाओं को ट्यूनिशिया में भाग जाना पड़ा, जिसे मई 1943 में मित्र राष्ट्रों द्वारा जीत लिया गया।[121]

मित्र राष्ट्रों को गति मिली[संपादित करें]

ब्रिटिश सैनिकों ने इम्फाल युद्ध के दौरान एक मोर्टार फायरिंग.

मुख्य भूमि एशिया में, जापान ने दो प्रमुख आक्रमणों का शुभारम्भ किया। पहला, जिसकी शुरुआत मार्च १९४४ थी, भारत के असम में ब्रिटिश ठिकानों के ख़िलाफ़[122] था, इसने जल्द ही इम्फाल और कोहिमा में राष्ट्रमंडल के ठिकानों को जापानियों के अधिग्रहीत कर दिया;[123] हालाँकि मई तक, अन्य जापानी दलों को चीनी दलों, जिन्होंने 1943 के अंत में उत्तरी बर्मा पर आक्रमण किया था, द्वारा मित्किना में घेर लिया गया था।[124] और दूसरा चीन में था, जिसका लक्ष्य था चीन के मुख्य सैन्य बलों को नष्ट करना, जापान अधिग्रहीत क्षेत्रों में रेलवे को सुरक्षित करना और मित्र राष्ट्रों के हवाई क्षेत्रों पर कब्जा करना.[125] जून तक जापानियों ने हेनान प्रान्त पर विजय प्राप्त कर ली थी और हुनान प्रांत में चांग्शा के ख़िलाफ़ एक नवीन हमले की शुरुआत कर दी थी।[126]

गुआडलकैनाल अभियान के बाद मित्र राष्ट्रों ने जापान के खिलाफ प्रशांत में कई आपरेशनों की शुरूआत की.1943 मई में, अमेरिकी सेनाओं को अल्यूशियंस से जापानी बलों को समाप्त करनेके लिए भेजा गया,[127] और इसके तुंरत बाद ही आसपास के द्वीपों पर कब्जों के द्वारा राबौल को अलग थलग करने के लिए और मार्शल द्वीप समूह में जापानी सेंट्रल प्रशांत परिधि को भंग करने के लिए, प्रमुख संचालन शुरू किए.मार्च, 1944 के अंत तक, मित्र राष्ट्रों ने इन दोनों उद्देश्यों को पूरा कर लिया और इसके अतिरिक्त कैरोलीन द्वीप समूह में एक अन्य प्रमुख जापानी आधार को क्रियाहीन कर दिया.अप्रैल में, मित्र राष्ट्रों ने पश्चिमी न्यू गिनी को फिर से हासिल करने के लिए एक ऑपरेशन की शुरुआत की.[128]

भूमध्य में, मित्र राष्ट्र सेनाओं ने जुलाई 1943 के शुरू में सिसिली पर एक आक्रमण की शुरुआत की.इतालवी मिट्टी पर हमले, पिछली विफलताओं के साथ, के परिणाम स्वरूप मुसोलिनी उस महीने के अंत तक बेदखल और गिरफ्तार हागया।[129] मित्र राष्ट्रों के साथ इटली के युद्दविराम के बाद, सितम्बर की शुरुआत में हुए इटली की मुख्य भूमि पर मित्र राष्ट्रों ने जल्द ही आक्रमण किया।[130] जब 8 सितम्बर को यह युद्दविराम सार्वजनिक हुआ, जर्मनी ने इसकी प्रतिक्रिया में, इतालवी सेनाओं को शस्त्रहीन किया, इतालवी क्षेत्रों के सैन्य नियंत्रण पर कब्जा किया,[131] और रक्षात्मक लाइनों की एक श्रृंखला की स्थापना की.[132] 12 सितम्बर को, जर्मन के विशेष बलों ने मुसोलिनी की और अधिक रक्षा की जिसने फिर जल्द ही जर्मन कब्जे वाले इटली में एक नए ग्राहक राज्य की स्थापना की.[133] मित्र राष्ट्रों को मध्य नवम्बर में मुख्य जर्मन रक्षात्मक पंक्ति तक पहुँचने से पहले कई जगहों पर लड़ाई लड़नी पड़ी.[134] जनवरी 1944 में, मित्र राष्ट्रों ने मोंटे केसिनो की लाइन के खिलाफ हमलों की श्रृंखला प्रारंभ की और एनजीओ पर उतर कर उसको घेरने का प्रयास किया। मई के अंत तक ये दोनों आक्रमण सफल हुए और, कई जर्मन डिवीजनों को वापिस जाने की अनुमति की कीमत पर, 4 जून को रोम पर कब्जा कर लिया गया।[135]

अटलांटिक में जर्मन आपरेशन भी प्रभावित हुए. मई 1943 तक, जर्मन पनडुब्बी के नुकसान इतने अधिक थे कि नौसेना अभियान को अस्थायी तौर पर एक विराम दे दिया गया क्योंकि मित्र राष्ट्रों के जवाबी-उपाय काफी प्रभावित साबित हो रहे थे।[109]

सोवियत संघ में, जर्मनों ने कुर्स्क के क्षेत्र में एक बड़े आक्रमण के लिए तैयारियां करते हुए 1943 के बसंत और गर्मियों को बिताया; सोवियत संघ इस तरह की कार्रवाई की अपेक्षा कर रहा था और उसने अपने क्षेत्र को दृढ़ करने में अपना समय बिताया.[136] 4 जुलाई को, जर्मनों ने अपने हमले की शुरुआत की, यद्यपि केवल एक हफ्ते एक हफ्ते बाद ही हिटलर ने आपरेशन रद्द कर दिया.[137] फिर सोवियत संघ एक विशाल जवाबी हमला करने में सक्षम हो गया और, जुलाई 1944 तक, धुरीय बलों को सोवियत संघ से बड़े पैमाने पर निष्कासित किया और रोमानिया पर आक्रमण किया।[138]

1943 नवम्बर में, फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट और विंस्टन चर्चिलकैरो में च्यांग काई शेक के साथ और फिर तेहरान में जोसेफ स्टालिन के साथ मिले.पहले वाले सम्मेलन में, जापानी क्षेत्र के युद्द के बाद की वापसी को निर्धारित किया गया और बाद वाले सम्मलेन में, यह तय कर लिया गया कि 1944 में पश्चिमी सहयोगी यूरोप पर आक्रमण करेंगे और सोवियत संघ जर्मनी की हार के तीन महीने के भीतर जापान पर युद्ध की घोषणा करेगा.

जनवरी 1944 में, सोवियत ने लेनिनग्राद से जर्मन सेनाओं को उखाड़ फेंका, इस प्रकार इतिहास के सबसे लम्बी और घातक घेराबंदी का अंत हुआ।इसके बाद के सोवियत आक्रमणको युद्ध पूर्व एस्टोनिया की सीमा पर जर्मन सेना समूह उत्तर द्वारा, एस्टोनिया, जिसे राष्ट्रिय स्वतंत्रता पुनः प्राप्त करनेकी उम्मीद थी, की मदद से रोक दिया गया। इस देरी की वजह से सोवियत के बाल्टिक सागर क्षेत्र में होने वाले ऑपरेशंस पर प्रभाव पड़ा.[139]

मित्र राष्ट्र निकट आए[संपादित करें]

नोर्मांडे पर मित्र राष्ट्रों का आक्रमण.

6 जून 1944 को (D-दिवस के रूप में जाना जाता है), पश्चिमी मित्र राष्ट्रों ने उत्तरी फ्रांस पर आक्रमणकिया और, इटली से अनेकों सैन्य टुकडियों के पुनर्निर्धारण के बाद, दक्षिणी फ्रांस पर भी आक्रमण किया।[140] ये अभियान सफल रहे थे और फ्रांस में जर्मन सैन्य टुकडियों की हार का कारण बने. पेरिस २५ अगस्त कोआजाद करा लिया गया[141] और वर्ष के उत्तरार्ध में, पश्चिमी पश्चिमी यूरोप में जर्मन सेनाओं का मित्र राष्ट्रों द्वारा पीछे धकेला जाना जारी रहा. हौलैंड में एक हवाई हमले की अगुवाई में उत्तरी जर्मनी पर चढाई करने की एक कोशिश हुई, हालाँकि ये सफल नहीं हुई.[142] मित्र राष्ट्रों ने भी इटली पर अपनी अग्रिम को जारी रखा, तब तक जब तक की उनका सामना वहां जर्मन की अंतिम प्रमुख सुरक्षा पंक्ति से नहीं हो गया।

जून 22 को, सोवियत संघ ने बेलारूस ("आपरेशन बग्रेशन"के रूप में जाना जाता है) पर एक रणनीतिक आक्रामक शुरू किया जिसके फलस्वरूप जर्मन सेना समूह केन्द्र का लगभग पूरा विनाश हो गया।[143][144] उसके तुंरत ही बाद पश्चिमी यूक्रेन और पूर्वी पोलैंड से जर्मन सेनाओं को एक और सोवियत रणनीतिक हमले ने मजबूर कर दिया. पोलैंड में प्रतिरोधी शक्तियों को सोवियत के सफल अभियान से बल मिला और उन्होंने कई बगावतों को प्रारंभ किया. हालाँकि इनमें से जो सबसे बड़ी थी, वौर्सौ में, साथ ही दक्षिण में स्लोवाक क्रांति, उनको सोवियत का समर्थन नहीं प्राप्त था इसलिए उन्हें जर्मन सेनाओं द्वारा दबा दिया गया।[145] लाल सेना के पूर्वी रोमानिया में रणनीतिक आक्रमण ने वहां स्थित भारी जर्मन सेनाओं को नष्ट कर दिया और रोमानिया औरबल्गारिया मेंएक सफल तख्तापलट की नींव डाली, इसके पश्चात् ये देश मित्र देशों के पाले में आ गए। सितम्बर १९४४ में, सोवियत लाल सेनाएं रोमानिया में बढीं और ग्रीस, अल्बानियाऔर युगोस्लाव फ्रंटयूगोस्लावियामें जर्मन सेना के और ऍफ़ समूहों को तेजी से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया ताकि उनको अलग थलग पड़ने से बचाया जा सके. इस समय तक, युगोस्लाविया की अधिकांश भूमि का नियंत्रण साम्यवादी नेतृत पार्तिज़ंस जोसिप ब्रोज़ टीटो के अधीनस्थ था और सुदूर दक्षिण में जर्मन सेनाओं को रोकने में प्रयासरत था। उत्तरी सर्बिया में, बल्गेरियन सेनाओं की सीमित मदद की सहायता से लाल सेना ने 20 अक्टूबर को राजधानी शहर बेलग्रेड को एक संयुक्त अभियान में स्वतंत्रता दिलाने के लिए साथियों को सहायता प्रदान की. कुछ दिनों बाद, सोवियत ने जर्मन अधिकृत हंगरी के विरुद्ध एक भारी हमला किया जो की फरवरी 1945 में बुडापेस्ट के धराशायीहोने तक जारी रहा.[146]

बालकन्स में शानदार सोवियत सफलताओं के विपरीत, कारेलियन इस्थमुस में सोवियत आक्रमणके फिनिश द्वारा सख्त प्रतिरोध ने सोवियत को फिनलैंड पर कब्जा करने से रोक दिया, परिणाम स्वरूप अपेक्षाकृत हलकी शर्तों पर ही सोवियत-फिनिश युद्धविराम पर हस्ताक्षर हो गए[147][148] और फिनलैंड मित्र देशों के पाले में पहुँच गया।

जुलाई की शुरुआत तक, दक्षिण पूर्व एशिया में राष्ट्रमंडल बलों ने असम में जापानी घेराबंदी को वापस धकेल दिया, जापानियों को चिन्द्विन नदी[149] तक वापिस जाना पड़ा जबकि चीन ने म्यित्क्यिना पर कब्जा कर लिया। चीन में, जापान ने जून के मध्य तक चांग्शा पर और अगस्त की शुरुआत तक हेंगयांग पर पूर्ण रूप से कब्जा करके अधिक सफलता रजित की.[150] उसके तुंरत बाद, उन्होंने आगे गुआन्ग्ज़ी के प्रान्त पर आक्रमण किया और नवम्बर के अंत तक गुइलिन और लिउज्होऊ[151] में चीनी सेनाओं के ख़िलाफ़ प्रमुख लडियां जीतीं और दिसम्बर के मध्य तक चीन और हिन्दचीन में अपने बलों को सफलतापूर्वक जोड़ा.[152]

प्रशांत में अमेरिकी सेनाओं ने जापानी परिधि को पीछे धकेलना जारी रखा. 1944 में जून के मध्य में, उन्होंने मारिआना और पलाऊ द्वीपों के ख़िलाफ़ अपना आक्रमणशुरू किया और कुछ ही दिनों में फिलीपीन सागर में जापानी सेनाओं के ख़िलाफ़ एक निर्णायक जीत हासिल कर ली. इन पराजयों के परिणाम स्वरूप जापानी प्रधानमंत्री तोजो को इस्तीफा देना पड़ा और जापान के गृह द्वीपों पर गहन और भारी बमबारी करने के लिए अमेरिका को हवाई पट्टियाँ उपलब्ध हो गयीं. अक्टूबर के अंत में, अमरीकी सेनाओं ने लेयेट के फिलिपिनो द्वीप पर चढाई की; इसके तुंरत बाद, मित्र देशों के नौसेना बलों ने लेयेट खाड़ी की जंग, जो की इतिहास की सबसे बड़ी नौसैनिक जंग है, के दौरान एक और बड़ी सफलता हासिल की.[153]

धुरी राष्ट्रों का पतन, मित्र राष्ट्रों की विजय[संपादित करें]

अमेरिकी और सोवियत सैन्य दल एल्बे नदी के पूर्व मिलतें हैं।
हिरोशिमा पर परमाणु विस्फोट

16 दिसम्बर 1944 को जर्मन सेनाओं ने अर्देंनेस में पश्चिमी सहयोगियों पर जवाबी हमला किया। मित्र राष्ट्रों को हमले पर विजय पाने में छः हफ्ते लगे. सोवियत संघ ने हंगरी से हमला किया, जबकि जर्मन ने ग्रीस और अल्बानिया का त्याग कर दिया और पार्तिज़न्सके द्वारा उनको दक्षिणी यूगोस्लाविया से बहार खदेड़ दिया गया।[67] इटली में, पश्चिमी सहयोगी जर्मन रक्षात्मक पंक्ति को भेद नहीं पाए. 1945 जनवरी मध्य में, सोवियत संघ पोलैंड पर हमला किया, विस्तुला से जर्मनी में ओदर नदी तक खदेडा, और पूर्व प्रुशिया पर कब्जा कर लिया।[136]

4 फ़रवरी को, अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत नेता याल्टा में मिले.वे युद्द पश्चात् जर्मन अधिग्रहण के लिए सहमत हो गए,[154] और सोवियत संघ जापान के ख़िलाफ़ लड़ाई में कब शामिल होगा इसपर भी सहमत हो गए।[155]

फरवरी में, पश्चिमी सहयोगियों की सेनाओं ने जर्मनी में प्रवेश किया और राइन नदी को बंद कर दिया, जबकि सोवियत संघ ने पोमेरेनियाऔर सिलेसिया पर आक्रमण किया.मार्च में, पश्चिमी मित्र राष्ट्रों ने जर्मन सेनाओं की एक बड़ी संख्या को घेरते हुए रुह्र के उत्तरी और दक्षिणी राइन को पार कर लिया, जबकि सोवियत संघ वियना की और बढ़ा. अप्रैल के शुरू में पश्चिमी सहयोगी अंततः इटली की और बढेऔर पश्चिमी जर्मनी को नष्ट कर दिया, जबकि अप्रैल के अंत में सोवियत सेनाएं बर्लिन पर टूट पड़ीं; २५ अप्रैल को दोनों सेनाएं एल्बा नदी पर मिलीं.

इस अवधि के दौरान नेतृत्व में कई परिवर्तन हुए.12 अप्रैल को, अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्टका देहांत हो गया, उनके स्थान पर हैरी ट्रूमैन आये. 28 अप्रैल को मुसोलिनी को इतालवी पार्तीज़ंस द्वारा मार दिया गया[156] और दो दिनों के बाद हिटलर ने आत्महत्या कर ली, ग्रैंड एडमिरल कार्ल दोनित्ज़ उनके स्थान पर आये.[157]

जर्मन सेनाओं इटली में 29 अप्रैल को और पश्चिमी यूरोप में 7 मईको आत्मसमर्पण कर दिया.[158] हालांकि, पूर्वी क्षेत्र में तब तक लडाई जारी रही जब तक जर्मनी ने 8 मई को विशेष रूप से सोवियत संघके आगे आत्म-समर्पण नहीं कर दिया.प्राग में, जर्मन के अवशेषों का प्रतिरोध 11 मई तक जारी रहा.

प्रशांत थिएटर में, अमेरिकन सेनाएं 1944 के अंत में लेटे को समाप्त कर, फिलीपिंसकी ओर बढीं.वे जनवरी 1945 में लुजोन पर और मार्च मेंमिंदानाओ पर उतरे.[159] ब्रिटिश और चीनी सेनाओं ने अक्टूबर से मार्च तक उत्तरी बर्मा में जापानियों को हराया, फिर ब्रिटिश 3 मई तक रंगून की ओर बढ़ चले.[160] अमरीकी सेनाएं भी जापान की और बढीं, मार्च मेंइवो जिमा और जून में ओकिनावा को ले लिया।[161] अमेरिकी बमों ने जापानी शहरों को नष्ट कर दिया और अमेरिकी पनडुब्बियां जापानी आयात को कट दिया.[162]

११ जुलाई को, मित्र राष्ट्रों के नेता पोत्स्दम, जर्मनी में मिले.उन्होंने जर्मनी को लेकर किए गए पहले के समझोतों की पुष्टि की,[163] और जापान द्वारा बिना शर्त समर्पण की मांग को दोहराया, विशेष रूप से यह कहते हुए कि " जापान के लिए विकल्प है त्वरित ओर पूर्ण रूप से विनाश".[164] इस सम्मेलन के दौरान यूनाइटेड किंगडम ने अपना आम चुनाव आयोजित किया औरक्लेमेंट एटली चर्चिल की जगह प्रधानमंत्री नियुक्त किये गए।

जब जापान ने पोत्स्दम शर्तों को अस्वीकार करना जारी रखा, तब संयुक्त राज्य अमेरिका ने अगस्त के शुरू में .जापानी शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा दिएदो बम के बीच, सोवियत संघ ने जापानी-अधिग्रहीत मंचूरिया पर आक्रमण कर दिया, जैसी की यलता में सहमति हुई थी। 15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्म-समर्पण किया और युद्द समाप्त हो गया।[158]

परिणाम[संपादित करें]

उच्चतम कमांडर 5 जून 1945 को बर्लिन में: बर्नार्ड मांटगोमेरी, ड्वाइट डी. आईसेन होवर, गोर्गी हुकोव और जीन डे लात्तरे दी तस्सिग्नी .
प्रधानमंत्रीविंस्टन चर्चिल यूरोप दिवस को जीत पर लन्दन में भीड़ का अभिवादन करते हुए

अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के प्रयास के लिए,[165] मित्र राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र का गठन किया, जो 24 अक्टूबर 1945 को अधिकारिक तौर पर अस्तित्व में आया।[166]

हालांकि इससे बेपरवाह, पश्चिमी सहयोगियों और सोवियत संघ के बीच के रिश्ते युद्द के ख़तम होने से पहले ही बिगड़ने शुरू हो गए थे,[167][168] और दोनों शक्तियों ने जल्द ही उनके स्वयं के प्रभाव क्षेत्रोंको स्थापित किया।[75] यूरोप में, महाद्वीप अनिवार्य रूप से पश्चिमी और सोवियत क्षेत्रों के बीच तथाकथित लौह परदे, जो की अधीनस्थ आस्ट्रिया और मित्र राष्ट्रों के अधीनस्थ जर्मनी से होकर गुजरता था और उन्हें विभाजित करता था, के द्वारा विभाजित था। एशिया में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान पर कब्जा किया और उसके पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के पूर्व द्वीपों को व्यवस्थित किया जबकि सोवियत संघ ने सखालिन और कुरील द्वीपों पर अधिकार कर लिया; पूर्व जापानी शासित कोरियाको विभाजित कर दिया गया और दोनों शक्तियों के बीच अधिकृत कर दिया गया.संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव जल्दी ही अमेरिका-नेतृत्वनाटो और सोवियत नेतृत्व वाली वारसॉ संधि सैन्य गठबंधन के गठन में विकसित हुआ और उनके बीच में शीत युद्द का प्रारम्भ हुआ।[169]

दुनिया के कई हिस्सों में, द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के कुछ ही समय के भीतर संघर्ष पुनः शुरू हो गया। चीन में, राष्ट्रवादी और साम्यवादी ताकतों ने जल्दी ही उनकेगृह युद्ध को बहाल कर दिया.साम्यवादी सेनाएं अंततः विजयी रहीं औरचीन के जनवादी गणराज्य को मुख्य भूमि पर स्थापित किया जबकि राष्ट्रवादी ताकतों ने ताईवान में अपनी सत्ता जमाई. ग्रीस में,साम्यवादी ताकतोंऔर एंग्लो अमेरिका समर्थित शाहीवादी ताकतों के बिच गृहयुद्ध छिड़ गया, जिसमे शाहीवादी ताकतों की विजय हुई. इन मुठभेड़ों की समाप्ति के तुंरत बाद, कोरिया मेंदक्षिणी कोरिया, जिसको पश्चिमी शक्तियों का समर्थन था, तथा उत्तरी कोरिया, जिसको सोवियत संघ और चीन का समर्थन था, के बीच युद्द छिड़ गया; मूलतः युद्ध का अंत एक गतिरोध और संघर्ष विराम के साथ हुआ।

युद्द की समाप्ति के बाद, विभिन्न यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के नियंत्रण वाली जगहों में गैर उपनिवेशीकरणका एक तीव्र दौर आया। ऐसा मुख्य रूप से विचारधारा में बदलाव, युद्द से हुई आर्थिक तंद्रा और स्वनिर्धारण के लिए स्थानीय लोगों की बढती मांग के कारण हुआ। अधिकतर हिस्सों में, ये हस्तांतरण अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण ढंग से हुए, यद्यपि अपवाद के तौर पर हिन्दचीन, मेडागास्कर, इंडोनेशियाऔर अल्जीरिया जैसे देश उल्लेखनीय हैं।[170] अनेक क्षेत्रों में, आमतौर पर जातीय या धार्मिक कारणों से, विभाजन, यूरोपियों की वापसी के बाद हुआ; ऐसा प्रमुख रूप से देखा गया फिलिस्तीन के अधिदेश में, जिसके कारणइजराइल और फिलिस्तीन की रचना हुई और भारत में, जिसकी वजह सेभारतीय अधिकार क्षेत्रऔर पाकिस्तानी अधिकार क्षेत्र की उत्पत्ति हुई.

युद्ध के बाद में आर्थिक सुधार दुनिया के भिन्न भागों में विविध हुए, हालाँकि सामान्यतया ये काफी सकारात्मक थे। यूरोप में, पश्चिम जर्मनी ने जल्दी से पूर्ववर्ती स्थिति को पुनः प्राप्त करलिया और 1950 के दशक तक अपने युद्द पूर्व स्तर से दोगुना उत्पादन करना शुरू कर दिया. .[171] इटली लचर आर्थिक स्थिति में युद्द से बाहर आया,[172] लेकिन 1950 के दशक तक, इटली की अर्थव्यवस्था को स्थिरता और उच्च विकास द्वारा चिह्नित किया गया।[173] युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक हालत खस्ता थी, [174] और आने वाले कई दशकों तक उनकी अर्थ व्यवस्था में गिरावट दर्ज की जाती रही.[175] फ्रांस बहुत जल्दी संभल गया और तेजी से आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण के मार्ग पर प्रशस्त हो गया।[176] सोवियत संघ ने भी युद्ध के तत्काल बाद उत्पादन में तेजी से वृद्धि का अनुभव किया।[177] एशिया में जापान ने अविश्वसनीय तेजी से आर्थिक विकास का अनुभव किया और 1980 के दशक तक जापान दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन गया।[176] चीन, उसके नागरिक युद्ध के समापन के बाद, अनिवार्य रूप से एक दिवालिया राष्ट्र ही था।[178] 1953 तक आर्थिक बहाली काफी सफल लग रही थी क्योंकि उत्पादन युद्द पूर्व के स्तर पर पहुँच गया था।[178] यह विकास दर ज्यादातर जारी रहा, हालांकि इसे संक्षेप में विनाशकारी और विशाल अग्रिम छलाँगके आर्थिक प्रयोग द्वारा बाधित किया गया था। युद्ध के अंत में, संयुक्त राज्य अमरीका दुनिया के लगभग आधे औद्योगिक उत्पादन का उत्पादन करता था; हालांकि 1970 के दशक तक, यह प्रभुत्व काफी हद तक कम हो गया।[179]

युद्ध के प्रभाव[संपादित करें]

हताहतों की संख्या और युद्ध अपराध[संपादित करें]

द्वितीय विश्व युद्ध के मौतें

युद्ध के कुल हताहतों की संख्या के अनुमान भिन्न भिन्न हैं, लेकिन अधिकांश का मानना है कि लगभग ६ करोड़ लोग इस युद्ध में मारे गए थे, जिसमें लगभग २ करोड़ सैनिकऔर ४ करोड़ आम नागरिक थे।[180][181][182] बहुत से नागरिकों की मृत्यु बीमारी, भुखमरी, नरसंहार, बमबारीऔर जानबूझकर कर किये गए नरसंहारकी वजह से हो गई।सोवियत संघ के लगभग 27 मिलियन लोग युद्ध के दौरान मारे गए थे, जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के कुल हताहतों कि संख्या का लगभग आधा था।[183] द्वितीय विश्व युद्ध के कुल हताहतों में लगभग 85 प्रतिशत मित्र राष्ट्रों (मुख्यतया सोवियत और चीनी) के थे और 15 प्रतिशत धुरी राष्ट्रों की तरफ के थे। एक अनुमान के अनुसार १.२ करोड़ नागरिक नाजी यातना शिविरों में,[184] १५ लाख बमसे, ७० लाख यूरोप में अन्य कारणों से, ७५ लाख चीन में अन्य कारणों से मारे गए थे।[185] कुल हताहतों की संख्याओं में बहुत अंतर है, क्योंकि अधिकांश मौतों को प्रलेखित नहीं किया गया था।

इनमें से बहुत सी मौतें धुरीय कब्जित क्षेत्रों में घटित हुए जातिसंहार और जर्मन तथाजापानी सेनाओं द्वारा किये गए युद्द अपराधों का परिणाम थीं। जर्मन अत्याचारों में से सबसे कुख्यात था होलोकॉस्ट, जर्मनी और उसके सहयोगियों द्वारा नियंत्रित प्रदेशों में यहूदियों का व्यवस्थित नरसंहार.नाजियों समूहों को भी लक्ष्य बनाया, जैसे की रोमा(जिनका पोराज्मोस में लक्ष्यीकरण किया गया), स्लाव और समलैंगिक पुरुष, एक अनुमान के अनुसार पांच मिलियन से ज्यादा लोगों का खत्म किया गया।[186] धुरी राष्ट्रों की तरफ झुकाव वाले क्रोएशिया के उस्तास शासन के निशाने पर मुख्यता सर्ब लोग थे।[187] सबसे प्रसिद्द जापानी क्रूरता का उदहारण है नानकिंग नरसंहार, जिसमें लाखों की संख्या में चीनी नागरिकों का बलात्कार और हत्या की गयी थी।[188] जापानी सेना ने लगभग 3 मिलियन से लेकर 10 मिलियन से अधिक नागरिकों की हत्या की जिनमे से अधिकांश चीनी थे।[189] मित्सुयोशी हिमेता के अनुसार, जनरल यासुजी ओकमुरा द्वारा हेइपी और शांतुंग में कार्यान्वित सानको सकुसें के दौरान कम से कम २.७ मिलियन लोग मारे गए।

जैविक और रासायनिक हथियारोंके धुरी राष्ट्र द्वारा सीमित उपयोग की भी जानकारी है। इतेलियन्स ने अबाइसीनिया की अपनी विजय के दौरान मस्टर्ड गैस का इस्तेमाल किया,[190] जबकि जापान की शाही सेनाने उनके चीन (७३१ इकाई देखें)[190][191] पर आक्रमण और अधिकार करने के दौरान तथा सोवियत संघ के ख़िलाफ़ शुरुआती संघर्षमें ऐसे हथियारों की अनेकों किस्मों का इस्तेमाल किया था। [192] दोनों, जर्मन और जापानी दोनों ने इन हथियारों का परिक्षण नागरिकों के खिलाफ किया था और,[193] कुछ मामलों में, युद्ध बंदियों के खिलाफ.[194]

हालाँकि धुरी राष्ट्र के कई कृत्यों को विश्व के पहले अंतरराष्ट्रीय न्यायलय में पेशी करने के लिए लाया गया,[195] मित्र राष्ट्रों के कृत्यों को नहीं लाया गया। मित्र राष्ट्रों का ऐसे कृत्यों के उदहारण में शामिल हैं, सोवियत संघ में जनसंख्या स्थानांतरण,[196] सोवियत के जबरदस्ती वाले श्रनिक शिविर (गुलाग)गुलाग, संयुक्त राष्ट्र में जापानियों की नजरबंदी, ऑपरेशन कील्हौल,[197] द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनों का निष्कासन, पॉलिश नागरिकों का सोवितातों द्वारा नरसंहार और दुश्मन क्षेत्र में नागरिकों के ऊपर बड़े पैमाने पर बमवर्षा, जिसमें टोकियो शामिल है और सबसे उल्लेखनीय है ड्रेस्डेन.[198]

बड़ी संख्या में मौतें, यद्यपि आंशिक रूप से ही, परोक्ष रूप से युद्द के कारण ही हुईं, जैसे की 1943 का बंगाल का आकाल.

यातना शिविर और गुलामी का काम[संपादित करें]

नाजी the Holocaustहोलोकॉस्ट, लगभग ६० लाख यहूदियों के कत्ल (मुख्यतया ऐश्केनाजिम), के लिए जिम्मेदार था, साथ ही वे जिम्मेदार थे दो मिलियन जातीय पोल्स और अन्य चार मिलियन लोग जिनको "जीवित रहने के अयोग्य" करार दिया गया (इनमें शामिल थे विकलांग और मानसिक रूप से बीमार, सोवियत युद्धबंदी, समलैंगिक, फ्रीमेसन्स, जेहोवाह के गवाह और रोमा) के भी कत्ल के. ये सब एक सोचे समझे कत्लेआम के कार्यक्रम का हिस्सा था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लगभग 12 मिलियन लोग, जिनमें से अधिकांश पूर्वी यूरोप के थे, जर्मनी की अर्थव्यवस्था में बंधुआ मजदूर की तरह कार्यरत थे.[199]

नाजी यातना शिविरों के साथ साथ सोवियत के गुलाग(या श्रमिक शिविर) के कारण भी नागरिकों की अनेकों कब्जे वाले देशों, जैसे की पोलैंड, लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया, में मौत हुई. इसके आलावा इन शिविरों में मौत हुई जर्मन युद्धबंदियों(POWs) की और यहाँ तक की उन सोवियत नागरिकों की भी जिन्हें की नाजियों का समर्थक माना जाता था।[200] सोवियत में जर्मनी के साठ प्रतिशत युद्ध बंदियोंकी युद्ध के दौरान मौत हो गयी थी।[201] रिचर्ड ओवरी के अनुसार सोवियत युद्धबंदियों की संख्या 5.7 मिलियन थी। उन में से, 57% मर गये या मारे गए थे, कुल 3.6 मिलियन.[202] कुछ बचे हुओं को उनके सोवियत संघ वापसी पर गद्दार घोषित कर दिया गया। (आदेश संख्या 270 देखें)[203]

जापानी के कैदी युद्ध शिविरों, जिनमें से कईयों का श्रम शिविरों के रूप में इस्तेमाल किया गया, का भी उच्च मृत्यु दर था। सुदूर पूर्व के अंतरराष्ट्रीय सैन्य ट्रिब्यूनल के अनुसार पश्चिमी बंदियों का मृत्यु दर २७.१ प्रतिशत थी (अमेरिकी युद्ध बंदियों के लिए ३७ प्रतिशत),[204] जर्मन और इतेलियांस के पास के युद्ध बंदियों का सात गुना.[205] चीनी युद्धबंदियों की मृत्यु दर बहुत अधिक थी; अगस्त 5, १९३७ को हिरोहितो के द्वारा पुष्टि की गयी एक घोषणा के अनुसार चीनियों को अब अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता था।[206] हालाँकि जापान के आत्म-समर्पणके बाद ब्रिटेन के ३७,५८३ कैदियों को, नीदरलैंड्स के २८,५०० और संयुक्त राज्य अमेरिका के १४,४७३ कैदियों को रिहा कर दिया गया, चीन के लिए यह संख्या सिर्फ 56 थी।[207]

इतिहासकारों ज्हिफेन जू, मार्क पिएटी, टोरू कुबो और मित्सुयोशी हिमेता के इतिहास के एक संयुक्त अध्ययन के अनुसार, १० लाख से अधिक चीनीयों को जापानियों द्वारा संचारित किया गया और मंचुको और उत्तर चीन में दास परिश्रम के लिए पूर्व एशिया विकास बोर्ड द्वारा गुलाम बना लिया गया।[208]" अमेरिकी लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस का अनुमान है कि जावा में जापानी सेना द्वारा ४ से १० मिलियन रोमुशा(जापानी "मजदूर") को काम करने के लिए मजबूर किया गया। इनमें से करीब २७०००० मजदूरों को दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य जापान अधिकृत क्षेर्त्रों में कार्य करने के लिए भेजा गया और केवल ५२०० को वापिस जावा भेजा गया। [209]

ऑस्ट्रिया, १९४५, मौथौसें शिविर में प्रताडित और भूखे कैदी.

१९ फ़रवरी १९४२ को रूजवेल्ट ने कार्यकारी आदेश ९०६६पर हस्ताक्षर किए, इसके अनुसार हजारों जापानी, इटली, जर्मन अमेरिकियों, और हवाई के कुछ प्रवासी जो युद्द के कार्यकाल तक के लिए पर्ल हार्बर पर बमबारी के बाद भाग ए थे, को नजरबन्द कर दिया. १५०,००० जापानी मूल के अमेरिकियों को और साथ ही अमेरिका के लगभग ११,००० जर्मनी और इटली के निवासियों को अमेरिका और कनाडा सरकार द्वारा नजरबन्द कर दिया गया था।

मित्र राष्ट्रों के द्वारा अस्वैच्चिक श्रमिकों का इस्तेमाल मुख्यतया पूर्व में किया गया, जैसे की पोलैंड,[210] लेकिन एक मिलियन से ज्यादा को पश्चिम में भी कार्य के लिए भेजा गया। उदहारण के लिए, 1940 में, लाक सेंत-जीन और कनाडा के कई अन्य क्षेत्रों (जैसे की सागुने, सेंट हेलन के द्वीपऔर हल, क्युबेक) में युद्ध बंदियों के लिए शिविरथे[211] 1942 तक, लाक सेंत-जीन में २ शिविर थे जिनमें करीब 50 युद्ध बंदी थे।[211] इन श्रमिकों को कठिन श्रम करने के लिए मजबूर किया गया, जैसे की लकडी कटना और पल्प और पेपर के उत्पादन में सहायता करना.[211] कनाडा के कैदी शिविर, जैसे के सेंत-जीन जेल, शिविर सैंतालीस, को संख्याक्रित किया गया था और वे गुमनाम ही रहे.सन्दर्भ त्रुटि: <ref> टैग के लिए समाप्ति </ref> टैग नहीं मिला युद्ध बंदियों को श्रेणियों, जैसे की उनकी राष्ट्रीयता और वो नागरिक थे की सैनिक थे, में वर्गीकृत किया गया था। शिविर ४७ के युद्ध बंदी मुख्यतया जर्मन या इतालवी थे। इन कैदियों को कृषि और भूमि लकड़ी काटने के काम के लिए मजबूर किया गया था। 1944 तक शिविर 47 को बंद कर दिया गया था कुछ देर बाद ही नष्ट भी कर दिया गया था, इसका कारण कैदियों के साथ व्यवहार के बारे में एक अंदरूनी रिपोर्ट थी।[211] दिसम्बर 1945 तक फ्रांस के अधिकारियों द्वारा यह अनुमान लगाया गया कि खदान की दुर्घटनाओं में हर महीने २००० जर्मन कैदियों को मार दिया जाता यां विकलांग कर दिया जाता था।[212][213][214]

होम फ्रंट और उत्पादन[संपादित करें]

मित्र राष्ट्रों से एक्सिस के सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात.

यूरोप में युद्ध की शुरुआत से पहले मित्र राष्ट्रों के पास आर्थिक और जनसँख्या, इन दोनों क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण बढ़त हासिल थी। १९३८ में, यूरोपीय एक्सिस (जर्मनी और इटली) की तुलना में पश्चिमी सहयोगी दल (यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, पोलैंड और ब्रिटिश उपनिवेश) की जनसंख्या ३०% से और सकल घरेलू उत्पाद भी ३०% से अधिक था; अगर कालोनियों को शामिल किया जाए, तो यह मित्र राष्ट्रों को जनसंख्या में ५:१ से भी अधिक लाभ और सकल घरेलू उत्पाद में लगभग २:१ लाभ देता है।[215] उसी समय में एशिया में, चीन की जनसँख्या जापान से लगभग छेह गुना थी, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद केवल ८९% अधिक था; यदि जापानी कालोनियों को शामिल किया जाए, तो जनसँख्या को घटाकर केवल तीन गुना और सकल घरेलु उत्पाद को घटा कर केवल ३८% अधिक कर देता है।[215]

हालांकि जर्मनी और जापान के शुरुआती तूफानी बमवर्षा के हमलों के कारण मित्र राष्ट्रों के आर्थिक और जनसँख्या लाभ को बड़े पैमाने पर कम कर दिया गया, 1942 तक वे निर्णायक कारक बन गए, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के मित्र राष्ट्रों से जुड़ने के बाद, क्योकि मुख्यतः युद्द एक संघर्षण में स्थापित हो गया।[216]

हालाँकि मित्र राष्ट्रों की धुरी राष्ट्र से ज्यादा उत्पादन करने की क्षमता का कारण अक्सर प्राकृतिक संसाधनों तक उनकी अधिक पहुँच को माना जाता है, लेकिन इसके अन्य कारण भी थे, जैसे की जापान और जर्मनी के द्वारा महिलाओं को कार्य के लिए इस्तेमाल करने के प्रति उनकी अनिच्छा,[217][218] मित्र देशों की रणनीतिक बमबारी,[219][220] और जर्मनी का युद्ध अर्थव्यवस्था की तरफ देर से झुकाव.[221] इसके अतिरिक्त, न तो जर्मनी ने और न ही जापान ने एक लम्बा युद्ध लड़ने की योजना बनाई थी और ऐसा करने के लिए वे सुसज्जित भी नहीं थे।[222][223] अपने उत्पादन को बढ़ने के लिए, जर्मनी और जापान ने लाखों दास श्रमिकों का इस्तेमाल किया था;[224]जर्मनी ने ज्यादातरपूर्वी यूरोप से लगभग १२ लाख लोगों का इस्तेमाल किया,[225] जबकि जापान नेसुदूर पूर्व एशिया में १८ लाख से भी अधिक लोगों को लगाया.[226]

युद्ध के समय कारोबार (उपजीविका)[संपादित करें]

यूरोप में, व्यवसाय दो बहुत ही अलग अलग रूपों के अंतर्गत आ गया। उत्तरी पश्चिमी और मध्य यूरोप (फ्रांस, नार्वे, डेनमार्क, निचले देशों और चेकोस्लोवाकिया के अधिकृत भाग) जर्मनी ने ऐसी आर्थिक नीतियों की स्थापना की जिससे युद्द के अंत तक उसने लगभग ६९.५ बिलियन रीचमार्क्स एकत्र कर लिए; इस आंकड़े में औद्योगिक उत्पादों, सैन्य उपकरणों, कच्ची सामग्री और अन्य वस्तुओं की काफ़ी बड़ी लूट शामिल नहीं है।[227] इस प्रकार, अधिकृत देशों से प्राप्त आय जर्मनी की कराधान से एकत्र आय से ४०% अधिक थी, युद्ध के साथ ये आंकडा बढ़कर कुल जर्मन आय का लगभग ४०% हो गया।[228]

पूर्व में, लेबेन्स्रौम के लूट की आशा कभी पूरी नहीं हो पाई. इसका कारण था लगातार बदलती अग्रिम सीमायें और सोवियत की झुलसाने वाली पृथ्वी नीतियां, जिन्होंने जर्मन आक्रमणकारियों को संसाधनों तक नहीं पहुँचने दिया.[229] पश्चिम के विपरीत, नाजी नस्लीय नीति ने, स्लाव वंश के "अवर लोग" के ख़िलाफ़ अत्यधिक बर्बरता को प्रोत्साहित किया;इस तरह से अधिकांश जर्मन चढाइयों के बाद बड़े पैमाने पर कत्ले आम होता था।[230] हालाँकि अधिकांश अधिकृत इलाकों में प्रतिरोध समूह बने थे, लेकिन वे पूर्व[231] या पश्चिम,[232] कहीं पर भी, जर्मन ऑपरेशंस को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाए.

एशिया में, जापान ने अपने अधिकार के तहत राष्ट्रों की संज्ञा ग्रेटर पूर्व एशिया सह-समृद्धि क्षेत्र का भाग होने के रूप में की, मूलतः एक जापानी आधिपत्त्व जिसके विषय में उसका दावा था की ये उपनिवेशक लोगों की आजादी के लिए है।[233] हालांकि मूल रूप से जापानी बलों का कई क्षेत्रों में यूरोपीय वर्चस्व से आजादी दिलाने वाले के रूप में स्वागत किया गया, कुछ हफ्तों के भीतर ही उनकी अत्यधिक बर्बरता ने स्थानीय जनता की राय बदल दी.[234] जापान ने प्रारंभिक विजय के दौरान पीछे भाग रही मित्र राष्ट्रों सेनायों के द्वारा छोड़े गए तेल के ४ मिलियन बैरल पर कब्जा कर लिया गया और १९४३ तक डच ईस्ट इंडीज़ में 50 मिलियन बैरल तक उत्पादन बढ़ने में सफल हो गया, जो की इसके 1940 के उत्पाद का ७६% था।[234]

प्रौद्योगिकी और युद्धकला में उन्नति[संपादित करें]

युद्ध के दौरान, विमानों ने उनकी टोही, लड़ाकू, बॉम्बर और प्रथम विश्व युद्ध की उनकी जमीनी-सहायक की भूमिकायों को जरी रखा, हालाँकि प्रत्येक क्षेत्र में काफी उन्नत कर ली गयी थी। विमान के लिए दो महत्वपूर्ण अतिरिक्त भूमिकाओं में थे, एयरलिफ्ट- उच्च प्राथमिकता आपूर्ति, उपकरण और कर्मियों को शीघ्र स्थानांतरित करने की क्षमता, यद्यपि सीमित मात्रा में;[235] और रणनीतिक बमबारी- दुश्मन उद्योग और मनोबल में बाधा डालने की उम्मीद में असैनिक क्षेत्रों के खिलाफ लक्षित बमों का इस्तेमाल करना.[236] विमान विरोधी हथियार भी उन्नति करते गए, इनमें शामिल थे राडार जैसे महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक उपकरण और अति उन्नत विमान विरोधी साजो सामान, जैसे की जर्मन की ८८ एमएम तोप. जेट विमान ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने पहले सीमित परिचालन के प्रयोग को देखा और हालांकि उनके देर से परिचय और सीमित संख्या का अर्थ था कि उनका युद्ध के दौरान कोई वास्तविक प्रभाव नही था, लेकिन कुछ, जिनका सक्रियता से प्रयोग हुआ था, ने युद्ध के बाद भारी मात्र में उनके इस्तेमाल को बढ़ावा देने की शुरुआत की.[237]

समुद्र में, हालाँकि नौसेना युद्ध के लगभग सभी पहलुओं में उन्नति हुई थी, विकास के दो प्राथमिक केंद्र बिंदु थे, विमान वाहक और पन्दुब्बियाँ. हालाँकि युद्ध के प्रारंभ में हवाई युद्द अपेक्षाकृत काम सफल था,[235] टोरंटो, पर्ल हार्बर, दक्षिण चीन सागर और कोरल सागर पर कार्रवाई ने शीघ्र ही विमान वाहक की जंगी जहाज के स्थान पर एक मुख्य युद्धपोत के रूप में स्थापना कर दी.[238][239] अटलांटिक में, अनुरक्षण वाहक नाटकीय रूप मित्र राष्ट्रों की सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा साबित हुए, कारगर संरक्षण त्रिज्या में वृद्धि करते हुए, मध्य अटलांटिक अंतर को ख़त्म करने के लिए मदद की.[240] उनकी प्रभावशीलता की वृद्धि के अलावा, विमान वाहक जंगी जहाजों की तुलना में अधिक किफायती थे उनकी अपेक्षाकृत कम लागत के कारण[241] Gऔर उनको भारी बख्तरबंद न होने की आवश्यकता के कारण .[242] पन्दुब्बियाँ, जो की प्रथा विश्व युद्ध में काफी असरदार साबित हुई थीं,[243] सभी पक्षों द्वारा उनका दूसरे में महत्वपूर्ण होना पूर्वानुमानित था। ब्रिटिश ने पनडुब्बी विरोधी हथियारोंऔर रणनीति, जैसे सोनार और रक्षा दल, पर विकास को केंद्रित किया; जबकि जर्मनी ने इसकी डिजाइनों के साथ आक्रामक क्षमता में सुधार लाने पर ध्यान केंद्रित किया, जैसे की टैप VII पनडुब्बी और वोल्फ पैक रणनीति.[244] धीरे धीरे, लगातार सुधर रहीं मित्र राष्ट्रों की तकनीकें जैसे की ली प्रकाश, हेजहौग, स्क्विड और होमिंग टौर्पीडो, विजयी साबित हुआ।

प्रथम विश्व युद्ध के स्थिर अग्रिम मोर्चों की अपेक्षा अब थल युद्ध कला में भारी बदलाव हो चुका था, वो कहीं ज्यादा गतिशील हो गयी थी। एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था संयुक्त शस्त्र युद्ध कला की अवधारण, जिसमें सैनिक बालाओं के विभिन्न तत्वों में कड़े समन्वय की आवश्यकता थी; टैंक, जिसका उपयोग पहले विश्व युद्द में मुख्य रूप से पैदल सेना के समर्थन के लिए किया गया था, दूसरे युद्ध तक वह इन बलों के प्राथमिक हथियार के रूप में विक्सित हो चुका था।[245] 1930 के दशक के अंत तक, प्रथम विश्व युद्ध की तुलना में टैंक का डिज़ाइन हर प्रकार से कहीं ज्यादा उन्नत हो चुका था,[246] और पूरे युद्ध के दौरान ये विकास चलता रहा- गति, बख्तरबंदी और गोलाबारी की शक्ति में. युद्ध के शुरू में, काफी सेनाओं ने टैंक को अपने ख़िलाफ़ सबसे अच्छा हथियार माना और इस प्रभाव के लिए विशिष्ट उद्देश्य वाले टैंक विकसित किए.[247] सोच की इस दिशा को लगभग नकार दिया गया था। इसका कारण था, बख्तरबंदी के विरुद्ध अपेक्षाकृत हलके शुरुआती टैंक आयुध का लचर प्रदर्शन और जर्मनी की टैंक से टैंक लडाई से बचने का सिद्धांत; पहले वाले कारक के साथ साथ, जर्मनी द्वारा संयुक्त हथियारों का इस्तेमाल भी, पोलैंड और फ्रांस में तूफानी गोलाबारी की रणनीति के अति सफल होने के प्रमुख कारणों में शामिल था।[245]टैंकों को नष्ट करने के अनेकों तरीकों, जिनमे शामिल थे अप्रत्यक्ष तोपखाने, टैंक विरोधी बंदूकें (दोनों, खींचकर चलने वाली और अपने आप चलनेवाली), खानें, कम दूरी के पैदल सेना के टैंक विरोधी हथियार और अन्य टैंकों का उपयोग किया गया था।[247] विभिन्न सेनाओं के बड़े स्तर पर मशीनीकरण के बावजूद, पैदल सेना अभी भी सभी बलों की रीढ़ बनी रही[248] और पूरे युद्ध के दौरान अधिकांश पैदल सेना उपकरण वैसे ही थे जो पहले विश्व युद्द में इस्तेमाल किए गए थे। कोले,[249] हालाँकि अपने सैनिकों को अर्ध-स्वचालित राइफलों, एम्-1 गारांड, से लैस करने वाला पहला देश संयुक्त राज्य अमेरिका था। कुछ शुरुआती विकासों में शामिल थे, पोर्टेबल मशीनगन का व्यापक रूप से संयोजन (जिसका एक उल्लेखनीय उदहारण है जर्मनी की एमजी42) और अनेकों सबमशीन गानें(जो की शहरों और जंगली इलाकों की नजदीक की लडाइयों के लिए अति उपायुक्त थीं).[249]ऐसौल्ट राइफल, जो की युद्ध के पूर्वार्ध का एक विकास था, इसमें राइफल और सबमशीन गनों के सर्वोच्च गुणों को शामिल किया गया था, ये लगभग सभी सैन्य बलों की पैदल सेना के प्रमुख हथियार बन गए।

संचार के क्षेत्र में, गूढ़लेखन बड़ी बड़ी कूट किताबों के इस्तेमाल से उत्पन्न जटिलता और सुरक्षा की समस्याओं का समाधान करने के लिए प्रमुख योद्दाओं ने अनेकों प्रकार की बीजलेख मशीनों का निर्माण किया। इनमें से सबसे प्रसिद्द थी जर्मनी की एनिग्मा मशीन.[250] SIGINT(signals intelligence) डिक्रिप्शन की काउन्टरिन्ग प्रक्रिया थी, जिसके उल्लेखनीय उदाहरण हैं ब्रिटिश ULTRA और मित्र राष्ट्रों द्वारा जापानी नौसैनिक कोड को तोड़ना . सैन्य जासूसी का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू था झूठे आपरेशनो का इस्तेमाल करना, जिसका मित्र राष्ट्रों ने कई अवसरों पर बहुत प्रभावी ढंग से सफलता पूर्वक इस्तेमाल किया, जैसे की मीन्समीट और बोडीगार्ड आपरेशन, जिनमें मित्र राष्ट्रों के सिसिली और नौर्मन्डी के आक्रमणों से जर्मनों के क्रमशः ध्यान और सेनाओं को दूर हटाया गया।

अन्य महत्त्वपूर्ण तकनीकी और इंजीनियरिंग कृत्य जिनको युद्ध के दौरान अथवा युद्ध की वजह से हासिल किया गया, उनमें शामिल हैं- दुनिया के पहले प्रोग्राम करने योग्य कंप्यूटर(जेड़3, कोलोसस और ENIAC), निर्देशित मिसाइलें और आधुनिक रॉकेट, परमाणु हथियारों के विकास की मैनहट्टन परियोजना,इंग्लिश चैनल के नीचेकृत्रिम बंदरगाहों और तेल पाइपलाइन के विकास.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

परिणाम
वर्णन

सन्दर्भ[संपादित करें]

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बाह्य संबंध[संपादित करें]

World War II के बारे में, विकिपीडिया के बन्धुप्रकल्पों पर और जाने:
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वृत्तचित्र
  • विश्व युद्ध में (१९७४) एक २६-हिस्सा थेम्स टेलीविजन श्रृंखला है जो कई बिंदुओं से द्वितीय विश्व युद्ध देखने के कई पहलुओं को शामिल करती है। इसमें कई प्रमुख शख्सियतों के साक्षात्कार भी शामिल है (कार्ल दोनित्ज़, अल्बर्ट स्पीयर, एंथोनी एडेन आदि.) (Imdb कड़ी)
  • द्वितीय विश्व युद्ध रंगों में (1999) एक तीन संस्कारों वाला वृत्तछित्र जो की अद्वितीय दृश्यों को रंगों में दिखा रहा है (Imdb कड़ी)
  • युद्ध क्षेत्र (वृत्तछित्र श्रृंखला) एक टीवी वृत्तचित्र श्रृंखला है जो पहले 1994-1995 में जारी हुई जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई सबसे महत्वपूर्ण लड़ाइयां शामिल हैं।
  • युद्ध(२००७) अमेरिकी समुदाय से काफी व्यक्तियों के अनुभवों की पुनर्गणना का ७-हिस्सा PBS वृत्तचित्र है।