देशी आर्य सिद्धान्त

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देशी आर्य सिद्धान्त, आर्य प्रवास मॉडल का विरुद्ध एवं वैकल्पिक सिद्धान्त है जिसके अनुसार भारतीय-यूरोपीय भाषाएँ, या कम से कम इंडो-आर्यन भाषाएँ, भारतीय उपमहाद्वीप के भीतर ही उत्पन्न हुईं। इस मॉडल को 'बहिर्भारत सिद्धान्त' (आउट ऑफ इन्डिया थिअरी) भी कहते हैं। इस सिद्धान्त के पक्षधर विद्वानों का तर्क है कि भारत-आर्य भाषाओं का भारतीय उपमहाद्वीप में एक दीर्घ इतिहास है और ये सिन्धु घाटी की सभ्यता के वाहक हैं। इस सिद्धान्त के समर्थक वैदिक काल का समय वह नहीं मानते जो पुराने सिद्धान्तकार देते आये हैं। उनका तर्क है कि 'वैदिक काल' का समय उससे कहीं बहुत पहले था।

प्रस्ताव को राजनीतिक और धार्मिक तर्कों के साथ जोड़ा गया है, क्योंकि यह भारतीय इतिहास और इसकी पहचान पर पारंपरिक और धार्मिक विचारों पर आधारित है। कुछ भारतीय विद्वानों के बीच इस विचार का भी विरोध किया गया है कि भारतीय संस्कृति को बाहरी इंडो-यूरोपियन और स्वदेशी द्रविड़ तत्वों के बीच विभाजित किया जा सकता है, एक विभाजन जिसे कभी-कभी औपनिवेशिक शासन की विरासत और भारतीय राष्ट्रीय एकता के लिए बाधा के रूप में वर्णित किया जाता है। बहस ज्यादातर हिंदू धर्म के विद्वानों और भारत के इतिहास और पुरातत्व के बीच मौजूद है, जबकि ऐतिहासिक भाषाविद् लगभग सर्वसम्मति से आर्य प्रवास सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]