देजिमा





देजिमा (17वीं शताब्दी में इसे सुकिशिमा भी कहा जाता था) नागासाकी, जापान के पास एक कृत्रिम द्वीप था। यह प्रारंभ में 1570 से 1639 तक पुर्तगालियों के लिए और उसके बाद 1641 से 1854 तक डचों के लिए एक व्यापारिक केन्द्र के रूप में कार्य करता था। ईदो काल (1603-1868) के दौरान यह जापान में विदेशी व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एकमात्र नियंत्रित केंद्र था।
द्वीप का क्षेत्रफल लगभग 120 मी॰ × 75 मी॰ (390 फीट × 250 फीट) या 9,000 मी2 (2.2 एकड़) था। देजिमा का निर्माण 1636 में एक छोटे प्रायद्वीप और नहर खोदकर किया गया और इसे मुख्य भूमि से एक छोटे पुल से जोड़ा गया। इसे टोकुगावा शोगुनेट द्वारा बनाया गया था। शोगुनेट की अलगाववादी नीति के तहत बाहरी लोगों को जापान में प्रवेश की अनुमति नहीं थी, जबकि अधिकांश जापानी विदेश जाने से रोक दिए गए थे।
इतिहास
[संपादित करें]देजिमा पर पहले पुर्तगाली व्यापारियों को रखा गया था, जिन्हें जापानी समाज से अलग रखा गया, लेकिन वे पश्चिमी व्यापार में शामिल रह सके। 1639 में कैथोलिक धर्मान्तरितों के विद्रोह के बाद सभी पुर्तगालियों को निष्कासित कर दिया गया। 1641 में डच व्यापारियों को देजिमा में स्थानांतरित किया गया, लेकिन उनके व्यापार पर कड़े नियम लागू थे। ईसाई धर्म के खुले अभ्यास पर प्रतिबंध था और डच-जापानी व्यापारिक संपर्क सख्ती से नियंत्रित थे।
संस्कृति और शिक्षा
[संपादित करें]देजिमा ने जापान में रंगाकू (蘭學, "डच लर्निंग") आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके तहत जापानी विद्वानों ने डच भाषा सीखकर पश्चिमी विज्ञान, चिकित्सा और प्रौद्योगिकी का अध्ययन किया।[1]
उपनिवेश का अंत
[संपादित करें]1854 में कानागावा संधि के बाद, जापान पूरी तरह विदेशी व्यापार और राजनयिक संबंधों के लिए खुल गया। इसके परिणामस्वरूप देजिमा का व्यापारिक महत्व समाप्त हो गया और द्वीप को नागासाकी शहर में शामिल कर लिया गया। 1922 में "देजिमा डच ट्रेडिंग पोस्ट" को जापान का राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थल घोषित किया गया। 21वीं सदी में इसे एक द्वीप के रूप में पुनर्स्थापित करने के प्रयास जारी हैं।
संदर्भ
[संपादित करें]- ↑ "rangaku | Japanese history | Britannica". www.britannica.com (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 2022-06-25.