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दूसरा अफीम युद्ध

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दूसरा अफीम युद्ध (अंग्रेजी: Second Opium War) जिसे दूसरा ऐंग्लो-चाइनीज़ युद्ध या ऐरो युद्ध (Arrow War) भी कहा जाता है, 1856 से 1860 तक ब्रिटेन और फ्रांस के नेतृत्व में गठबंधन द्वारा चीनी किंग वंश के खिलाफ लड़ा गया था। यह अफीम युद्धों का दूसरा प्रमुख संघर्ष था, जो अफीम के व्यापार को चीन में वैध बनाने के अधिकार के लिए लड़ा गया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप किंग वंश को दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा और अफीम व्यापार को जबरन वैध बना दिया गया। यह युद्ध चीनी अधिकारियों के बीच यह धारणा बनाने का कारण बना कि पश्चिमी शक्तियों से संघर्ष अब पारंपरिक युद्ध नहीं थे, बल्कि एक उभरती राष्ट्रीय संकट का हिस्सा थे।[1]

युद्ध की शुरुआत

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8 अक्टूबर 1856 को, किंग अधिकारियों ने "ऐरो" नामक एक ब्रिटिश-पंजीकृत मालवाहक जहाज को जब्त किया और इसके चीनी नाविकों को गिरफ्तार कर लिया। ब्रिटेन ने 22 अक्टूबर को चीन से इन गिरफ्तारियों का प्रतिकार मांगा, लेकिन चीन ने बाकी नाविकों को रिहा करने से इनकार कर दिया। अगले दिन (23 अक्टूबर), ब्रिटिश युद्धपोतों ने कांतन शहर पर हमला किया, जो वाइसरॉय ये के अधिकार क्षेत्र में था। इसके बाद, ब्रिटिश सरकार ने चीन से मुआवजा मांगने का निर्णय लिया और एक नौसैनिक बल को माइकल सिमोर के नेतृत्व में भेजा। फ्रांस ने भी इस संघर्ष में भाग लिया, अपने कारण के रूप में चीन में एक फ्रांसीसी मिशनरी की हत्या का हवाला देते हुए। ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर दिसंबर 1857 में कांतन पर आक्रमण किया और वाइसरॉय ये को बंदी बना लिया। ग्वांगडोंग के गवर्नर ने आत्मसमर्पण कर दिया।[2]

युद्ध का विस्तार

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इसके बाद, ब्रिटिश-फ्रांसीसी गठबंधन ने किंग दरबार से एक समझौते की मांग की और 20 मई 1858 को ताकू किलों पर कब्जा कर लिया, तियानजिन पर आक्रमण किया और बीजिंग की ओर अग्रसर हुआ। किंग ने शांति की मांग की और 1858 में ग्रेट ब्रिटेन और फ्रांस के साथ तियानजिन संधि पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, सिएनफेंग सम्राट ने संधि की पुष्टि करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद किंग जनरल सेंगे रिंचन ने युद्ध को फिर से शुरू कर दिया। ब्रिटिश और फ्रांसीसी गठबंधन ने फिर से आक्रमण किया और सेंगे की सेनाओं को हराया।

बीजिंग पर कब्जा और युद्ध का समापन

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जैसे-जैसे गठबंधन की सेनाएँ बीजिंग की ओर बढ़ीं, कांसुल पार्केस और कई ब्रिटिश और फ्रांसीसी अधिकारियों को बंदी बना लिया गया और कुछ को यातना दी गई या मारा गया। इन घटनाओं के परिणामस्वरूप, लॉर्ड एल्गिन ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे बीजिंग पर कब्जा करने के बाद पुराना समर पैलेस लूटने और जलाने का काम करें। सम्राट और उनका दरबार रेहे की ओर भाग गए, जबकि प्रिंस गोंग ने शांति वार्ता जारी रखी और 24 अक्टूबर 1860 को बीजिंग संधि पर हस्ताक्षर किए, जिससे तियानजिन संधि की पुष्टि हुई और दूसरा अफीम युद्ध समाप्त हो गया।

युद्ध के बाद के प्रभाव

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दूसरे अफीम युद्ध के दौरान और बाद में, किंग सरकार को रूस के साथ भी संधियाँ हस्ताक्षरित करनी पड़ीं, जैसे कि ऐगुन संधि और बीजिंग संधि। इसके परिणामस्वरूप, चीन ने रूस को अपने उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम के क्षेत्रों, विशेष रूप से बाहरी मांचूरिया, में 1.5 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र सौंप दिया। युद्ध के समाप्त होने के बाद, किंग सरकार ने ताइपिंग विद्रोह का सामना करने और अपनी सत्ता को बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित किया। बीजिंग संधि के तहत, ब्रिटेन ने हांगकांग के हिस्से के रूप में काओलून प्रायद्वीप को प्राप्त किया।

1. ग्रीन, लेस्ली. "दूसरे अफीम युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और परिणाम." (2020)


2. स्टीवंस, टॉमस. "ब्रिटेन और फ्रांस का गठबंधन." (2018)

  1. "Milestones in the History of U.S. Foreign Relations - Office of the Historian". history.state.gov. अभिगमन तिथि: 2025-01-27.
  2. "Opium Wars | Definition, Summary, Facts, & Causes | Britannica". www.britannica.com (अंग्रेज़ी भाषा में). 2024-12-11. अभिगमन तिथि: 2025-01-27.