दुर्गादास (उपन्यास)

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दुर्गादास (उपन्यास)  
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लेखक प्रेमचंद
देश भारत
भाषा हिंदी
विषय साहित्य
प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ
प्रकाशन तिथि 2011 (यह सर्वप्रथम सन् 1915 में अज्ञान प्रकाशक द्वारा प्रकाशित हो चुका है।)
पृष्ठ 92
आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788126320578

दुर्गादास एक उपन्यास है जो एक वीर व्यक्ति दुर्गादास राठौड़ के जीवन पर मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित है। इसे एक वीर गाथा भी कह सकते हैं जिससे हमें कई सीख मिलती है। यह बाल साहित्य के अंतर्गत आता है तथा इसके मुख्य प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ है।

इसमें बताया गया है कि किस प्रकार राजा यशवन्तसिंह के सेवक दुर्गादास नें उसके मृत्यु के बाद राजा के पुत्र अजीतसिंह को औरंगज़ेब तथा उसके मुगल सेना से सुरक्षित किया तथा औरंगज़ेब को मारवाड़ से भगाकर अजीतसिंह को राज सौंपा। तथा किस प्रकार उसे दुष्ट अजीतसिंह से दूर भागना पड़ा।[1]

परिचय[संपादित करें]

दुर्गादास महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का ऐतिहासिक उपन्यास है जो मुख्यत: उर्दू लिपि में लिखा गया और जिसका हिन्दी अनुवाद पहली बार सन् 1915 में प्रकाशित हुआ था। इसमें एक वीर की संघर्षपूर्ण गाथा है जो अपने मात्रभूमि के लिये अपना सर कटवाने तक को तैयार था। स्वयं प्रेमचंद उनका बखान करते हैं।

प्रेमचंद के शब्दों में -- राजपूताना में बड़े-बड़े शूर-वीर हो गये हैं। उस मरुभूमि ने कितने ही नर-रत्नों को जन्म दिया है; पर वीर दुर्गादास अपने अनुपम आत्म-त्याग, अपनी निःस्वार्थ सेवा-भक्ति और अपने उज्जवल चरित्र के लिए कोहनूर के समान हैं। औरों में शौर्य के साथ कहीं-कहीं हिंसा और द्वेष का भाव भी पाया जाएगा, कीर्ति का मोह भी होगा, अभिमान भी होगा; पर दुर्गादास शूर होकर भी साधु पुरुष थे।

इसमें प्रेमचंद ने अपनी रचनाशीलता का परिचय देते हुए महत्वपूर्ण तथ्य समाहित किये हैं। अभी इसकी पुस्तिका भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रस्तुत है जिसका इस प्रेस से पहला संस्करण 1 जनवरी सन् 2011 में प्रकाशित हुआ। यह कथा, वीर गाथा प्रेमियों के साथ ही साहित्य और इतिहास शोधार्थियों के लिये भी उपयुक्त है।

उद्देश्य[संपादित करें]

दुर्गादास एक बार सन् 1915 में सचित्र प्रकाशित हुई थी, यह मुख्य रूप से बाल पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुई जिसके पीछे प्रेमचंद जी का उद्देश्य उस समय के बालकों के मन में देशप्रेम की भावना जागृत करना था, जिसमें वे पुर्णत: सफल हुए।

दुर्गादास की भूमिका जिसे स्वयं प्रेमचंद नें लिखा, उन्ही के शब्दों में निम्नांकित है --

बालकों के लिए राष्ट्र के सपूतों के चरित्र से बढ़कर उपयोगी, साहित्य का कोई दूसरा अंग नहीं है। इसमें उनका चरित्र ही बलवान् नहीं होता, उनमें राष्ट्रप्रेम और साहस का संचार भी होता है। राजपूताना में बड़े-बड़े शूरवीर हो गये हैं। उस मरुभूमि ने कितने ही नर-रत्नों को जन्म दिया है, पर वीर दुर्गादास अपने अनुपम आत्म-त्याग, अपनी निःस्वार्थ सेवाभक्ति और अपने उज्जवल चरित्र के लिए कोहनूर के समान हैं। औरों में शौर्य के साथ कहीं-कहीं हिंसा और द्वेष का भाव भी पाया जाएगा, कीर्ति का मोह भी होगा, अभिमान भी होगा, पर दुर्गादास शूर होकर भी साधु पुरुष थे। इन्हीं कारणों से हमने वीर-रत्न दुर्गादास का चरित्र बालकों के सामने रखा है। हमने चेष्टा की है कि पुस्तक की भाषा सरल और बामुहावरा हो और उसमें बालकों की रुचि उत्पन्न हो। -प्रेमचन्द

इससे उनके उद्देश्य का पता चलता है।

प्रेमचंद के कथाओं तथा उपन्यासों में परिच्छेद देने की शैली तथा तारतम्यता और बिलगाव समाहित हैं, पाठक इससे परिचित हैं तथा इनकी रचनाए पाठकों की परीक्षा में उत्तीर्ण हुईं।

द्विवेदी युग में वे ही एकमात्र अन्वय और व्यतिरेक के ज्ञानी थे। 'दुर्गादास' में भी इसका स्वच्छंद प्रयोग दिखता है।

दुर्गादास उपन्यास एक सत्य कथा है जिसके पात्र तथा स्थान भौगोलिक तथा ऐतिहासिक रूप से दर्शाए गए हैं।[2]

संक्षिप्त में[संपादित करें]

जोधपुर के वीर सेनापति आशकरण के पुत्र दुर्गादास तथा जसकरण थे सन् 1605 में धोखे से आशकरण की मृत्यु के बाद महाराज यशवंत सिंह नें दुर्गादास तथा अपने पुत्र पृथ्वी सिंह को लाड से पाला। औरंगजेब के कहनें पर महाराज दक्खिन की सुबेदारी पर चले गए, दुर्गादास को साथ लिया और पृथ्वीसिंह को राज्य में छोड़ दिया। दक्खिन के राजा शिवाजी से यशवंतसिंह की दोस्ती के बाद मुगल वहां सुरक्षित हो गए। फिर औरंगज़ेब ने राजा को काबुल भेजा तथा वहाँ के मुसलमानों से लड़ते हुए दो राजकुमार मारे गए। वहाँ मारवाड़ से औरंगज़ेब ने पृथ्वी सिंह को भी दिल्ली बुलाकर मार डाला। और मारवाड़ पर कब्जा कर लिया। इधर बच्चों के मरने से जसवंतसिंह का भी देहावसान हो गया। राजा नें मरने से पहले कहा था कि उनकी दो पत्नी भाटी और हाड़ी गर्भ से थीं तथा वह उन्ही के संतान को राजा बनाना चाहते थे। राजा के साँथ इन दोनों रानियों को छोड़कर सब सती हो गए।[3]

रानी का बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम अजीत रखा गया, दूसरे दिन हाड़ी का भी बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम दलथम्भन रखा। दिल्ली जाते जाते दलथम्भन ठण्ड से मारा गया वहाँ औरंगज़ेब नें राजकुमार अजीत को दिल्ली में रखने की बात कही। दुर्गादास नें आनंददास खेची के साथ राजकुमार को डुगबा नामक गाँव में जयदेव ब्राह्मण के घर भेज दिया।[4]

औरंगजेब नें कोतवाल भेजे और दोनों रानियों नें आत्महत्या कर ली। लड़ाई में जो बचे थे वे दुर्गादास के साँथ रानियों का शव लेकर चले और आबू की पहाड़ियों में दाह क्रिया की। सब लोग ब्राह्मण के यहाँ गए और एक दिन बाद सब कल्याणगढ़ दुर्गादास के घर चले गए वहाँ दुर्गादास की बूढ़ी माँ तथा उसका भाई जसकरण और उसका बेटा तेजकरण था। बादशाह नें जसवंतसिह के भतीजे के कहने पर यह फरमान जारी किया कि सारे राजपूतों को जिंदा या मुर्दा पकड़ के लाओ। सब राजपूत भागे, इधर दुर्गादास सोनिंगी के साथ आवागढ़ चले गए वहाँ शोनिंगी नें एक संदुकची देते हुए बोला "यह राजा का दिया हुआ है, इसे मैं सुरक्षित नही रख सकता इसे तुम ले लो तथा जोधपुर में जो युवक राजा बनें उसे दे देना, खोलना मत!"

दुर्गादास उस संदुकची को लेकर चला गया। रास्ते में दो राजपूतों को मुगल सिपाही घेरे थे जिसमें से एक मर गया था और महासिंह नामक घायल था। उन्हे बचाते हुए दुर्गादास नें जोरावर को मार डाला और महासिंह को साथ ले अपने घर पहुँचा। सुबह होते ही दुर्गादास अपने बेटे तथा भाई के साथ माँ से विदा लेकर जाने लगा और वह संदुकची अपने नौकर नाथू को दे दी। उनके जाने के बाद शमशेर खाँ आया और दुर्गादास की माँ को बेरहमी से मार डाला शमशेर के एक सैनिक खुदाबक्श के संग महाँसिह माड़ो चले गए और नाथू दुर्गादास को माँ की मौत की खबर देने चला गया।

दुर्गादास माता के मृत्यु की बात से आगबबूला हो सीधा जाकर शमशेर खाँ को मार डाला।[5]

इसी प्रकार कई महान काम करते हुए उसने औरंगज़ेब को मारवाड़ से भगा दिया।

अब दुर्गादास बूढ़ा हो चला था उसने अजीतसिंह को राजगद्दी पर बिठा दिया, अजीतसिंह घमंड में आकर दुर्गादास को मारने की कोशिश की पर आखिर उसे भी पता चल ही गया कि जिसके डर से औरंगज़ेब भाग गया उसे वो क्या कर सकेगा।

वीर दुर्गादास जोधपुर से चले गए और थोड़े दिन राणा जयसिंह के यहाँ रहे और फिर उज्जैन चले गए, बचे दिनों में श्रद्धा से महाकालेश्वर की पूजा की। संवत् 1765 में उनका देहांत हो गया।[6]

वीर दुर्गादास राठौड़ की मृत्यु तो हो गई परंतु उनकी वीरगाथा सदा के लिये अमर रहेगी।

अंत में प्रेमचंद लिखते हैं जिसने यशवन्तसिंह के पुत्र की प्राण-रक्षा की और मारवाड़ देश का स्वामी बनाया, आज उसी वीर का मृत शरीर क्षिप्रा नदी की सूखी झाऊ की चिता में भस्म किया गया। विधाता! तेरी लीला अद्भुत है।


भगवान की लीला भगवान ही जाने...

नजर डालें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]