दिल्ली प्रेस

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शुभ होली

जितनी मनोरम रीति उतनी ही पुरानी भी है, होली खेलनी भी है, होली जलानी भी है !!

रंगीन पावन पर्व यह हमारी संस्कृति का, शुभाशीष देवों का और वरदान प्रकृति का ! जो संस्कृति करती विश्वहित की कामना, चराचर जगत के कल्याण की प्रार्थना ! पुरातन यह पावन धरोहर बचानी भी है, होली खेलनी भी है, होली जलानी भी है !!

देवदुर्लभ नरजीवन है उसी रंग में रंगना होगा, मानव देह मिली है तो मानव ही बनना होगा ! पंचरंग में रंग दें अंतर्तम की श्वेत चूनर को, शून्य कर दें अपने अंतःकरण के अंतर को ! मन की कालिख धोने को प्रेम का पानी भी है, होली खेलनी भी है, होली जलानी भी है !!

याद रहे पावन पर्वों में विकृति न आने पाये, पश्चिमी प्रभाव में श्रेष्ठ आदर्श न खो जाए ! कृष्ण बनकर द्रौपदी की चीर बचानी भी है, प्रह्लाद को बचाकर होलिका जलानी भी है ! मनभेद मिटाकर मानवता निभानी भी है , होली खेलनी भी है, होली जलानी भी है !!

- नवीन जोशी 'नवल' २० मार्च २०१९

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