दानव हयग्रीव

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हयग्रीव महर्षि कश्यप और दनु का पुत्र और कालकेतु , रंभ , करंभ , शुम्भ , निशुम्भ , स्वरभानु , वप्रीचिति , दैत्यराज तथा नमुचि का भाई और एक प्रसिद्ध असुर (दानव) था। जो हयग्रीव रूपी विष्णु मारा गया था।

हयग्रीव संतों को परेशान करता हुआ

कथा[संपादित करें]

एक बार माता लक्ष्मी गहनों से सुसज्जित होकर भगवान विष्णु के पास आईं। भगवान विष्णु उन्हें देखकर मुस्कुराए माता लक्ष्मी ने उसे अपना अपमान समझा और भगवान विष्णु को श्राप दिया ''कि आपका मस्तक आपके धड़ से विलग हो जाएगा ''। उसी समय हयग्रीव नाम का एक पराकर्मी दानव सरस्वती नदी के तट पर चला गया और वहां उसने माता पार्वती की घोर तपस्या आरम्भ कर दी। माता पार्वती ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान मांगने को कहा तो वह बोला ''कि हे माते मुझे अमरता का वर दीजिए ’'। माता पार्वती ने कहा '' कि हे असुर राज संसार में जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी अवश्य होती है यह विधि का विधान है ''। जब माता पार्वती ने हयग्रीव को अमरता का वर देने से इंकार किया तो वह बोला कि ''हे मां मैं ही इस सृष्टि में एक ऐसा प्राणी हूं जिसका सिर घोड़े का और धड़ मनुष्य का है सो मुझे वरदान दीजिए कि मेरी मृत्यु हयग्रीव के ही हाथों हों ''। माता पार्वती तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गई। इस वरदान का उसने दुरुपयोग शुरू कर दिया क्योंकि वह सोचने लगा कि एकमात्र वही सृष्टि पर ऐसा है जो हयग्रीव है इसलिए उसने ब्रह्मा जी से वेदों की शक्तियों को अपने भीतर समाहित कर लिया जिससे वेद शक्तिहीन हो गए और संसार से ज्ञान का प्रकाश हट गया और पाप का अंधकार छा गया। भगवान विष्णु को उसने युद्ध के लिए ललकारा। भगवान विष्णु तत्काल गरुड़ पर आरूढ़ होकर हयग्रीव से युद्ध करने गए। दोनों का युद्ध कई दिनों तक चला। दोनों को युद्ध करते हुए एक सप्ताह हो गया था आठवें दिन हयग्रीव तथा भगवान विष्णु दोनों थककर विश्राम करने लगे। ब्रह्मा जी ने उस समय अपने तेज़ से एक कीड़ा उत्पन्न किया और उसे आदेश दिया कि वह नारायण के धनुष की प्रत्यंचा काट दे। उसने आदेश मानते हुए ऐसा ही किया और भगवान विष्णु के धनुष की प्रत्यंचा काट दी जिससे भगवान विष्णु का सिर उनके धड़ से अलग हो गया उस कारण चारों ओर अन्धकार छा गया। देवताओं ने अश्विनी कुमारों का स्मरण किया। ब्रह्मा जी भी एक घोड़े की गर्दन ले आए। अश्विनी कुमारों ने भगवान विष्णु के धड़ से घोड़े की गर्दन का जुड़ाव किया जिसके कारण भगवान विष्णु का हयग्रीव अवतार हुआ। हयग्रीव रूपी विष्णु तथा हयग्रीव में बहुत भयानक युद्ध चला। हयग्रीव रूपी भगवान विष्णु ने एक बाण चलाया जिससे सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ और सुदर्शन चक्र ने पलक झपकते ही हयग्रीव का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु ने दुष्ट दानव हयग्रीव का वध करके वेदों की शक्तियों को उसके भीतर से निकलकर ब्रह्मा जी को सौंप दिया।