शिवराम शंकर आपटे

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शिवराम शंकर आपटे उपाख्य दादासाहेब आपटे (02 फरवरी,1905 - 10 अक्टूबर, 1985), विश्व हिन्दू परिषद के संस्थापक तथा प्रथम महासचिव थे। उन्होने युनाइटेड प्रेस ऑफ इण्डिया में कार्य किया एवं बाद में हिन्दुस्थान समाचार एजेन्सी https://web.archive.org/web/20190331170940/http://www.hindusthansamachar.in/ की स्थापना की।

शिवराम शंकर उपाख्‍य दादा साहब आप्‍टे :

·        शिवराम शंकर आप्टे उपाख्‍य दादा साहेब आप्टे जी का जन्म 02 फरवरी,1905 को गुजरात राज्य के बड़ोदरा में हुआ था। प्राथमिक एवं महाविद्यालयी शिक्षा पूर्ण करने के बाद एल.एल.बी. हेतु मुंबई में आए। संस्कृत विद्यालय में अर्थोपार्जन के साथ-साथ इन्होंने कानून की उपाधि प्राप्त की।

·        उन्‍होंने कानूनी बारीकियों के साथ राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा उस जमाने के विधिवेता तथा भारतीय संस्कृति के उपासक कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी से प्रारंभिक तौर पर प्राप्‍त की। अपनी कार्यकुशलता तथा अध्ययन की पैनी दृष्टि के कारण वे मुंबई के प्रमुख ‘लियो प्रेस’ से जुड़े। वे मुम्बई उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के अलावा फाली नरीमन जैसे वरिष्ठ वकीलों के सहायक रहे।

·        कुछ समय वे एक अंग्रेजी पत्रिका में सम्पादक भी रहे। दो-ढाई साल वे वीर सावरकर जी के घर पर रहे।  उन दिनों अंग्रेजी अखबार भारतीय पक्ष के समाचार प्रायः नहीं छापते थे।  सावरकर जी ने उनसे भारतीय मन को समझने वाली समाचार संस्था बनाने को कहा।  अतः यह काम सीखने के लिये उन्होंने दो साल तक रात की पारी में यूपीआई. नामक समाचार संस्था में काम किया।

·        दादासाहब बड़े शाही स्वभाव के व्यक्ति थे।  सूट, बूट, टाई, हैट तथा सिगार उनके स्थायी साथी थे।  न्यायालय के बाद वे शिवाजी पार्क में जाकर बैठते थे। वहां संघ की शाखा लगती थी ।  आबा जी थत्ते, बापूराव लेले, नारायणराव तर्टे आदि उस शाखा पर आते थे।  उनके सम्पर्क में आकर दादासाहब 1944 में स्वयंसेवक बने और इसके बाद तो उनका जीवन ही बदल गया। वकालत तथा पत्रकारिता को छोड़कर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गए तथा उन्हें तमिलनाडु में संघ कार्य के विकास के लिए भेजा गया।

·        उन्ही दिनों उन्होंने अपने दैनंदिनी में लिखा कि जीवन तो जुआ नहीं है। इसलिए उसे राष्ट्र को समर्पित करना चाहिए परंतु विवाह तो जुआ है। राष्ट्र कार्य में लगे व्यक्ति को ऐसा जुआ खेलने की जरूरत नहीं है। शिवराम शंकर उपा’य दादा साहेब आप्टे स्वयंसेवकों के स्वयंसेवक बन गए। उनके लिए राष्ट्रकार्य ही सबकुछ था। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विहिप के आधार स्तंभ थे। आज जब हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दु परिषद् की संबंध में विचार करते हैं तो हमें दादा साहेब आप्टे का नाम एकाएक चिंतन पटल पर आ जाता है।


हिन्‍दुस्‍थान समाचार संवाद एजेंसी का आरंभ :

·        भारतीय मीडिया का स्वरूप आजादी पूर्व तथा आजादी बाद भी प्राय: अधिकांश बड़े स्‍तर पर अराष्ट्रीय दिखाई दे रहा था। ऐसे में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के द्व‍ितिय सरसंघ चालक (श्री गुरूजी) ने यह अनुभव किया कि राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से ओत-प्रोत एक ऐसी संवाद समिति देश में आवश्यकता है जो न केवल अंग्रेजी बल्‍कि भारतीय भाषाओं में समाचारों को निष्पक्ष एवं तटस्थ भाव से त्‍वरित प्रेषित कर सके।     श्री गुरूजी ने संघ से प्रथम प्रतिबंध हटने के बाद विभिन्न राज्यों से अनुभवी एवं प्रमुख प्रचारकों को हिन्दुस्थान समाचार संवाद समिति के कार्य को खड़ा करने के लिए संघ से भेजा।  जिसमें बापूराव लेले, नारायण राव तर्टे, बालेश्वर अग्रवाल के साथ ही अशोक पंडित जैसे तात्‍कालीन समय में अपने विषय के उच्‍च श्रेणी विद्वान शामिल थे। इन सभी के उस समय आधार स्तंभ) बने दादा साहेब आप्टे यानी कि शिवराम शंकर आप्‍टे जी । आगे अपने अल्प समय में ही आपके प्रयासों से हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी ने दूरमुद्रकों के द्वारा समाचार प्रेषण में जो कीर्तिमान स्थापित किया वो अपने आप में ही गौरव की बात है।

·        हिन्दुस्‍थान समाचार की स्थापना सन् 1948 में दादा साहेब आप्टे जी द्वारा की गई । तब से अब तक यह भारत की प्रमुख समाचार संस्था बनी हुई है। इस न्‍यूज एजेंसी की ताकत इसका भाषायी होना है। यह हिन्दी, मराठी, गुजराती, असमिया, ओड़िया, कन्नड, बांग्ला, तेलगु, पंजाबी, असमिया, अंग्रेज, नेपाली आदि कई भाषाओं में समाचार उपलब्ध कराती है। इस दृष्टि से यह संस्था भारतीय भाषाओं की आवाज है। देशभर में भाषायी समाचार पत्रों की कुल संख्‍या में से अकेले 4 हजार से अधिक अखबार इस एजेंसी की न्‍यूज सेवा लेते हैं। सभी राज्यों की राजधानियों एवं भारत के प्रमुख शहरों में इसके ब्यूरो एवं कार्यालय हैं।

·        उन दिनों विश्व में केवल अंग्रेजी के दूरमुद्रक (टेलीप्रिंटर) ही प्रचलित थे । दादासाहब ने 1954 में हिन्दी का दूरमुद्रक विकसित किया । इससे हिन्दी पत्रकारिता जगत में क्रान्ति आ गयी । हिन्दुस्थान समाचार समिति भविष्‍य में किसी की निजि समिति नहीं बन सके इसके लिए तत्‍कालीन समय में दादा साहब आप्‍टे की प्रेरणा से यह निर्णय हुआ कि हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी एक सहकारी समिति में बदल दिया जाए। 1957 में ‘हिन्दुस्थान समाचार’ एजेंसी एक सहकारी संवाद समिति बन गयी। इसके फलस्वरूप भारतीय भाषाओं के प्रति श्रद्धा तथा भक्ति रखनेवाले घनश्याम गुप्त, आर. आर. दिवाकर, डॉ. हरेकृष्ण मेहताब, हरिश्चंद्र माथुर, डॉ. रामसुमन सिंह, डॉ. सरोजिनी महिषी, डॉ. जयसुखलाल हाथी, गंगाशरण सिंह आदि दिग्गजों का शुभाशिर्वाद प्राप्त हुआ। समिति दिन पर दिन आगे बढ़ने लगी।

·        दादा साहेब आप्टे लियो नार्दो द विंची की तरह ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे कानून के ज्ञाता थे, पत्रकार थे, लेखक थे, वक्ता थे, चित्रकार थे, यायावर थे, घुमक्कड़ थे। इतना ही नहीं तो वे प्राच्‍य विद्या एवं  वेदों तथा उपनिषदों के ज्ञाता भी थे। श्री आप्टे एक कुशल संगठक भी थे।


विश्‍व‍ हिन्‍दू परिषद की स्‍थापना

·        राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के कार्य से कई राज्‍यों में जब उनके प्रवास हो रहे थे, खासकर तब उनका लगातार गुजरात से महाराष्‍ट्र और कर्नाटक के साथ दक्षिणभारत के राज्‍यों में सुदूर ग्रामांचलों में जाना हो रहा था, तब उनके ध्‍यान में आया कि हिन्‍दू समाज में आपस में ही ऊंच-नीच के गहरे भाव के चलते अधिकांश समस्‍याएं दि‍खाई देती हैं। इसलिए एक ऐसा संगठन हो जो सभी सनातन धर्म हिन्‍दू समाज का प्रतिनिधित्‍व कर सके। आगे इसी विचार की प्रेरणा से विश्‍व‍ हिन्‍दू परिषद नाम से संगठन की स्‍थापना मुंबई के सांदीपनी आश्रम से 28 अगस्त, 1964 को की गई।

·        उसमें द्वारकापीठ के शंकराचार्य, पूजनीय अभिनव सच्चिदानंद, नामधारी पंथ के गुरू प्रताप जी, कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी, संत तुकड़ो जी महाराज, मास्टर तारा सिंह, हनुमान प्रसाद पोद्दार, स्वामी चिंमयानंद, सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर, जैन संत सुशील मुनि, परमपूज्य दलाईलामा, स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी महाराज, श्री अय्यर के साथ ही गोरक्षा पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ जी प्रमुख रूप से पहली बार किसी मंच पर एक साथ उपस्‍थ‍ित हुए और सम्‍वेत् स्‍वर में उद्घोष किया गया कि हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्। मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र: समानता।

·        देश-विदेश में प्रवास कर इसके विस्तार के लिये दादासाहब ने अथक प्रवास किया ।  इस कारण शीघ्र ही विश्व हिन्दू परिषद का काम विश्व भर में फैल गया । उन्‍होंने अथक परिश्रम करके 22 देशों में विश्‍वहिन्‍दू परिषद (विहिप)  को स्थापित किया। वे विश्व हिन्दू परिषद के संस्थापक तथा प्रथम महासचिव थे।

·        दादासाहब एक अच्छे लेखक, चित्रकार तथा छायाकार भी थे, उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में अनेक पुस्तकें लिखीं।  इनमें से ‘शकारि विक्रमादित्य’ को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।  ‘राष्ट्रगुरु रामदास’ नामक चित्रकथा के लिये उन्होंने चित्र भी बनाए, इसी से आगे चलकर महापुरुषों के जीवन चरित्र प्रकाशित करने वाली ‘अमर चित्रकथा’ की नींव पड़ी।

·        दादासाहब प्रतिदिन डायरी लिखते थे। 1942 से 1979 तक की उनकी डायरियाँ भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। कानून का जानकार होने के कारण 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तथा फिर विश्व हिन्दू परिषद का संविधान बनाने में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभायी।

·        1974 के बाद कई वर्ष उन्होंने महामंडलेश्वर स्वामी गंगेश्वरानन्द उदासीन के साथ विश्व-भ्रमण कर वेदों की पुनर्प्रतिष्ठा का प्रयास किया।  जीवन के अन्तिम वर्षों में उन्होंने स्वयं को सब बाहरी कामों से अलग कर लिया था।

·        पूणे का ‘कौशिकाश्रम’ यह वह स्थान है जहां राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के वरिष्ठ वृद्ध प्रचारकों का निवास है, इसको न्यास बनाकर भेंट करने का कार्य भी दादा साहेब आप्टे जी द्वारा ही पूरा किया गया। लगभग दो दशक तक राष्ट्र की आराधना अविरत भाव से करने वाले पथिक ने अनुभव किया कि अब इस हाड़-मांस के शरीर से अधिक श्रम करना संभव नहीं है तो क्यों न हमें श्री रज्जू भैया के शब्दों में – ‘तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित’ कहते हुए वापिस अपने धाम चले जाना चाहिए। अत: 10 अक्टूबर, 1985 को दादा साहब आप्‍टे जी स्वर्ग सिधार गए।

·        निष्काम कर्मयोगी दादा साहेब जी का कथन है कि ‘मैं तो निमित्त मात्र हूं। एक संदेशवाहक अथवा सर्वसाधारण की भाषा में एक संदेशवाहक की भूमिका मात्र निभा रहा हूं और मैं यही सहर्ष करना भी चाहता हूं।

लेख : डॉ. मयंक चतुर्वेदी