दशाश्वमेघ घाट

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यह एक काशी का सुप्रसिद्ध घाट है |हिंदू लोग इसे परम पवित्र मानते हैं | यहीं ब्रह्मा ने दशाश्वमेघ यज्ञों का अनुष्ठान किया था | कहा जाता है की काशी के सुप्रसिद्ध देवदास ने इस स्थान से देवतायों को खदेड़ दिया | तब महादेव ओर पार्वती दोनों ने मंदराचल का आश्रय लिया | देवदास को पराजय करने के लिए उन्होंने ब्रह्मा को बुलाया ओर आपस में परामर्श किया ओर उपाय सोचा | यह विचार कर की देवकार्य की त्रुटी होने से देवदास को अपराधी होना पड़ेगा, ब्रह्मा हंस पर चढकर काशीधाम पहुंचे ओर इस घाट पर आसन लगा देवदास से दश अश्वमेघ यज्ञों की सामग्री माँगने लगे | देवदास ने सब सामग्री भेज दी | तब उसकी कोई त्रुटी न देख ब्रह्मा ने इस घाट में उन यज्ञों को पूर्ण किया | तब से इस घाट को असाधारण पवित्रता प्राप्त हुई |

यह उपाय करने पर भी ब्रह्मा देवदास को परास्त करने में विफल मनोरथ हुए ओर बहुत लजाए, इसी लिए महादेव के पास नहीं लौटे किन्तु प्रसन्न चित्त हो काशी में रहने लगे |

इस घाट के ऊपर दशाश्वमेघ तथा ब्रह्मेश्वर का मंदिर है |