त्रिस्कन्ध-ज्योतिष

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त्रिस्कन्ध-ज्योतिष[संपादित करें]

त्रिस्कन्ध ज्योतिष का व्याख्यान नारद संहिता में मिलता है, जिसके अन्तर्गत गणित, जातक (होरा) और संहिता का नाम जाना जाता है। गणित स्कन्ध में परिकर्म (योग, अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, धन और धनमूल) ग्रहों के मध्यम और स्पष्ट करने की रीतियां बताई गई है, इसके अलावा अनुयोग (देश, दिशा और काल का ज्ञान), चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, उदय, अस्त, छायाधिकार, चन्द्रश्रंगोन्नति, गहयुति (ग्रहों का योग) और पात (महापात को सूर्य चन्द्र के क्रान्तिसाम्य को कहते हैं) का ज्ञान करवाया गया है। जातक स्कन्ध में राशिभेद, ग्रहयोनि (ग्रहों की जाति, रूप और गुण आदि), वियोनिज (मानवेतर-जन्मफ़ल), गर्भाधान, जन्म, अरिष्ट, आयुर्दाय, दशाक्रम, कर्माजीव (आजीविका), अष्टकवर्ग, राजयोग, नाभस योग, चन्द्रयोग, प्रव्रज्य योग, राशिशील, ग्रहद्रिष्टिफ़ल, ग्रहों के भाव फ़ल, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातकफ़ल, निर्याण (मृत्यु समय का विचार), नष्ट जन्मविधान (अज्ञात जन्म समय जानने का प्रकार), तथा द्रेष्काणों (राशि के तृतीय भाग दस अंश) आदि विषयों का वर्णन किया गया है। संहिता स्कन्ध में ग्रहचार (ग्रहों की गति), वर्ष के लक्षण, तिथि, दिन, नक्षत्र, योग, करण, मुहूर्त, उपग्रह, सूर्य संक्रान्ति, ग्रहगोचर, चन्द्रमा और तारा बल, सम्पूर्ण लग्नो और ऋतुदर्शन का विचार, गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोनयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्रासन, चूडाकरण, कर्णवेध, उपनयन, मौन्जीबन्धन (वेदारम्भ) क्षुरिकाबन्धन, समावर्तन, विवाह, प्रतिष्ठा, गृहलक्षण, यात्रा, गृहप्रवेश, तत्कालवृष्टि ज्ञान, कर्मवैल्क्षण्य और उत्पत्ति का लक्षण, इन सबका विवरण दिया गया है।