त्रिपुरा में बौद्ध धर्म

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त्रिपुरा को केन्द्र शासित क्षेत्र से बढ़कर राज्य का दर्जा जनवरी 21, 1972 को दिया गया। त्रिपुरा में अधिकाँश रूप से बंगाली समुदाय के लोगों का प्रभाव है। यहाँ 19 अनुसूचित जनजातियाँ भी हैं जो आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं।[1]

जनसंख्या में बौद्ध धर्म के मानने वाले लोग[संपादित करें]

मोग (बर्मा के मूल के लोग), चकमा, बरुआ और उचाई लोग त्रिपुरा में बौद्ध धर्म में आस्था रखते हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार त्रिपुरा में कुल मिलाकर 2,00,000 लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं जबकि राज्य की जनसंख्या 35 लाख है।

राज्य में 200 बौद्ध आश्रम और 250 बौद्ध भिक्षु हैं। त्रिपुरा के लगभग सभी बौद्ध थेरवाद बौद्ध धर्म को मानते हैं। पारम्परिक रूप से उनकी मान्यताएँ बर्मी और थाई लोगों से मिलती जुलती हैं।[1]

मोग बौद्ध[संपादित करें]

मोग बौद्ध के लोग पारम्परिक रूप से म्यानमार से बहुत प्रभावित हैं। लगभग सभी धम्मा ग्रन्थ इसी देश से लाए गए है और धार्मिक शिक्षा बर्मी लिपि में दी जाती है। इन लोगों की बोली भी बर्मी भाषा और राखेन भाषाओं से मिलती जुलती है।[1]

चकमा और बरुआ[संपादित करें]

चकमा और बरुआ लोग भी थेरवाद बौद्ध धर्म मानते हैं। यह लोग अधिकतर बंगाली भाषा का प्रयोग करते हैं।[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]