त्रिपुरसुन्दरी

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त्रिपुरा सुंदरी
Tripura sundari 4.jpg
श्री ललिता त्रिपुर सुन्दरी, जिनका वाम पाद , श्रीचक्र पर विराजित है। उनके चारों ओर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, पराशिव और गणेश विद्यमान हैं। लक्ष्मी और सरस्वती उनको पंखे से हवा दे रहीं हैं।
संबंध देवी, आदि पराशक्ति, महाविद्या, पार्वती, बाला सुंदरी
अस्त्र पाश, अंकुश, धनुष और वाण [1]
जीवनसाथी कामेश्वर
चतुर्भुजा ललिता रूप में पार्वती, साथ में पुत्र गणेश और स्कन्द हैं। ११वीं शताब्दी में ओड़िशा में निर्मित यह प्रतिमा वर्तमान समय में ब्रिटिश संग्रहालय लन्दन में स्थित है।

त्रिपुरासुन्दरी दस महाविद्याओं (दस देवियों) में से एक हैं। इन्हें 'महात्रिपुरसुन्दरी', षोडशी, ललिता, लीलावती, लीलामती, ललिताम्बिका, लीलेशी, लीलेश्वरी, तथा राजराजेश्वरी भी कहते हैं। वे दस महाविद्याओं में सबसे प्रमुख देवी हैं। माँ त्रिपुरसुंदरी देवी के अनेकों सिद्धपीठ भारत मे है। लेकिन हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की सीमा से सटे गाँव त्रिलोकपुर मे माँ त्रिपुरसुंदरी देवी के दिव्य रूप के दर्शन होते हैं। त्रिलोकपुर मे माँ श्री त्रिपुरा बाला सुंदरी नाम से बाल रूप मे विराजमान है। त्रिलोकपुर गाँव के सामने पर्वत की चोटी पर माँ ललिता देवी के नाम से दर्शन देती है तो वही त्रिलोकपुर से लगभग १० किमी दूर माँ त्रिभवानी रूप मे विराजमान है।

त्रिपुरसुन्दरी के चार कर दर्शाए गए हैं। चारों हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण सुशोभित हैं। देवीभागवत में ये कहा गया है वर देने के लिए सदा-सर्वदा तत्पर भगवती मां का श्रीविग्रह सौम्य और हृदय दया से पूर्ण है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] जो इनका आश्रय लेते है, उन्हें इनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इनकी महिमा अवर्णनीय है। संसार के समस्त तंत्र-मंत्र इनकी आराधना करते हैं। प्रसन्न होने पर ये भक्तों को अमूल्य निधियां प्रदान कर देती हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें] चार दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें तंत्र शास्त्रों में ‘पंचवक्त्र’ अर्थात् पांच मुखों वाली कहा गया है। आप सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं, इसलिए इनका नाम ‘षोडशी’ भी है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवजी से पूछा, ‘भगवन! आपके द्वारा वर्णित तंत्र शास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जाएगी, किन्तु गर्भवास और मरण के असह्य दुख की निवृत्ति और मोक्ष पद की प्राप्ति का कोई सरल उपाय बताइये।’ तब पार्वती जी के अनुरोध पर भगवान शिव ने त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या साधना-प्रणाली को प्रकट किया।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

भैरवयामल और शक्तिलहरी में त्रिपुर सुन्दरी उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] ऋषि दुर्वासा आपके परम आराधक थे। इनकी उपासना श्री चक्र में होती है। आदिगुरू शंकरचार्य ने भी अपने ग्रन्थ सौन्दर्यलहरी में त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या की बड़ी सरस स्तुति की है। कहा जाता है- भगवती त्रिपुर सुन्दरी के आशीर्वाद से साधक को भोग और मोक्ष दोनों सहज उपलब्ध हो जाते हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

त्रिपुरसुन्दरी, काली का रक्तवर्णा रूप हैं। काली के दो रूप कृष्णवर्णा और रक्तवर्णा हैं। त्रिपुर सुंदरी धन, ऐश्वर्य, भोग और मोक्ष की अधिष्ठात्री देवी हैं। इससे पहले की महाविद्याओं में कोई भोग तो कोई मोक्ष में विशेष प्रभावी हैं लेकिन यह देवी समान रूप से दोनों ही प्रदान करती हैं।

तीन रूप[संपादित करें]

इस विद्या के तीन रूप हैं-

  1. आठ वर्षीय बालिका बाला, त्रिपुर सुंदरी
  2. षोडष वर्षीय, षोडषी
  3. युवा स्वरूप, ललिता त्रिपुरसुन्दरी

साधना पद्धति[संपादित करें]

त्रिपुरसुन्दरी की साधना में इनके तीनों रूपों के क्रम का ध्यान रखना आवश्यक है। जिन्होंने सीधे ललिता त्रिपुरसुन्दरी की उपासना की उन्हें शुरू में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।


सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Kinsley, David (1998). Tantric Visions of the Divine Feminine: The Ten Mahāvidyās. Motilal Banarsidass Publ. पृ॰ 112.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]