त्रैलंग स्वामी

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त्रैलंग स्वामी
गुरु/शिक्षक भगीरथानंद सरस्वती
दर्शन दशनामी
खिताब/सम्मान "वाराणसी के सचल विश्वनाथ" नाम से प्रसिद्ध
धर्म हिन्दू
दर्शन दशनामी

त्रैलंग स्वामी (जिन्हें तैलंग स्वामी भी कहते हैं) (ज्ञात [nb 1] १५२९ ई. या १६०७[2] -१८८७[2][3]) एक हिन्दू योगी थे, जो अपने आध्यात्मिक शक्तियों के लिये प्रसिद्ध हुए। ये जीवन के उत्तरार्द्ध में वाराणसी में निवास करते थे।[2] इनकी बंगाल में भी बड़ी मान्यता है, जहाँ ये अपनी यौगिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों एवं लम्बी आयु के लिये प्रसिद्ध रहे हैं। कुछ ज्ञात तथ्यों के अनुसार त्रैलंग स्वामी की आयु लगभग ३०० वर्ष रही थी,[2][4] जिसमें ये वाराणसी में १७३७-१८८७ तक (लगभग १५० वर्ष) रहे।[3] इन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है। साथ ही इन्हें वाराणसी के 'सचल विश्वनाथ' (चलते फिरते शिव) की उपाधि भी दी गयी है।[5][6]

जीवन-परिचय[संपादित करें]

तैलंग स्वामी का जन्म आंध्र प्रदेश के विजियाना नामक जनपद के होलिया नामक एक गाँव में हुआ था।[7] इनके पिता का नाम नृसिंह राव और माता का नाम विद्यावती था। इनका जन्म पन्द्रहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में हुआ था।[8] इनकी निश्चित जन्म-तिथि ज्ञात नहीं है। कहीं इन्हें १५२९ में तो कहीं १६०७ ई॰ में उत्पन्न माना जाता है। इनकी माता भगवान शिव की उपासिका थी। भगवान शिव के कृपा-स्वरूप इनका जन्म मानने के कारण उन्होंने इनका नाम शिवराम रखा था। बचपन से ही सहज वैराग्य एवं विषय-विरक्ति का इनका स्वभाव था, जिसे इनकी माता भी समझती थी। अपने इसी स्वभाव के कारण ये अविवाहित रहे। जब ये ४० वर्ष के हुए तभी इनके पिता का और जब ये लगभग ५२ वर्ष के हुए तब इनकी माता का देहांत हो गया। इसके बाद इन्होंने अपनी साधना स्थानीय श्मशान भूमि से आरंभ की और वहाँ २०वर्ष तक साधना की। फिर इन्हें संयोगवश ही पंजाब से आए स्वामी भागीरथानंद सरस्वती से भेंट हुई और उनके साथ इन्होंने सदा के लिए होलिया गाँव का परित्याग कर दिया। अनेक प्रदेशों का पर्यटन करते हुए ये दोनों प्रसिद्ध पुरुष पुष्कर तीर्थ पहुँचे। वहीं लगभग ७८ वर्ष की अवस्था में शिवराम ने भगीरथ स्वामी से संन्यास की दीक्षा ली। उनका नया नामकरण हुआ- 'गणपति सरस्वती'। दीक्षा ग्रहण करने के बाद ये गंभीर साधना में निमग्न हो गये। भगीरथ स्वामी का पुष्कर तीर्थ में ही देहांत हो गया। इस पवित्र क्षेत्र में लगभग दस वर्षों तक कठोर साधना करने के बाद ये भारत के प्रसिद्ध तीर्थों की परिक्रमा के लिए निकले। तब उनकी आयु लगभग ८८ वर्ष की थी। इस उम्र में भी उनका शरीर पूरी तरह सुगठित था और बुढ़ापा का कोई चिह्न नहीं था।[9] इसके बाद नेपाल, तिब्बत, गंगोत्री, यमुनोत्री, मानसरोवर आदि क्षेत्रों में कठोर साधना करके इन्होंने अनेक सिद्धियाँ प्राप्त कीं। फिर नर्मदाघाटी, प्रयागराज आदि अनेक तीर्थस्थानों में निवास एवं साधना करते हुए अंततः ये काशी पहुँचे।[7] आंध्र प्रदेश के तैलंग क्षेत्र से आने के कारण काशी के लोग इन्हें 'तैलंग स्वामी' के नाम से पुकारने लगे और इस प्रकार इनका नाम 'तैलंग स्वामी' प्रसिद्ध हो गया।[7][10] वहाँ ये लगभग १५० वर्ष रहे। विक्रम संवत् १९४४ (फसली साल १२९४) में पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि (सन् १८८७) को इन्होंने नश्वर शरीर छोड़ा।[7][11]

वाराणसी-निवास[संपादित करें]

वाराणसी में तैलंग स्वामी के दर्शन के लिए स्वयं रामकृष्ण परमहंस भी कई बार गये थे। स्वामी जी उन दिनों मणिकर्णिका घाट पर मौनव्रत धारण करके रहते थे। जब पहली बार परमहंस जी मिलने गये तभी स्वामी जी ने अपनी सुँघनी की डिब्बी श्री रामकृष्ण परमहंस के आगे रखकर उनका स्वागत किया था। परमहंस जी ने स्वामी जी के शरीर के सभी लक्षणों को बारीकी से देखकर लौटते समय अपने अनुयायी हृदय से कहा था "इनमें यथार्थ परमहंस के सभी लक्षण दिखाई देते हैं, ये साक्षात् विश्वेश्वर हैं।"[12] तैलंग स्वामी लाहिड़ी महाशय के परम मित्र थे। उनके सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे ३०० वर्ष से भी अधिक आयु तक जीवित रहे। उनका वजन ३०० पौंड था। दोनों योगी प्रायः एक साथ ध्यान में बैठा करते थे। त्रैलंग स्वामी के चमत्कारों के सम्बन्ध में अनेक बाते कही जाती हैं। अनेक बार घातक विष का पान करने के बाद भी वे जीवित रहे।[13] अनेक लोगो ने उन्हे गंगा के जल में उतरते देखा था। कई दिनो तक वे गंगा में जल के ऊपर बैठे रहते थे अथवा लम्बे समय तक जल के नीचे छिपे रहते थे। वे गर्मी के दिनो भी मध्यान्त समय मणिकर्णिका घाट के धूप से गर्म शिलाओं पर निश्चल बैठे रहते थे। इन चमत्कारो के द्वारा वे यह सिद्ध करना चाहते थे कि मनुष्य ईश्वर-चैतन्य के द्वारा ही जीवित रहता है। मृत्यु उनका स्पर्श नहीं कर सकती थी। आध्यात्मिक क्षेत्र में तो त्रैलंग स्वामी तीव्रगति वाले थे ही उनका शरीर भी बहुत विशाल था किन्तु वे भोजन यदा कदा ही करते थे। वे माया विनिमुक्ति हो चुके थे और उन्होने इस विश्व को ईश्वर के मन की एक परिकल्पना के रूप में अनुभव कर लिया था। वे यह जानते थे कि यह शरीर धनीभूत शक्ति के कार्य साधक आकार अतिरिक्त कुछ नहीं है। अत: वे जिस रूप में चाहते, शरीर का उपयोग कर लेते थे।

मस्त स्वभाव[संपादित करें]

त्रैलंग स्वामी सदा नग्न रहा करते थे किन्तु उन्हे अपनी नग्नावस्था का तनिक भी भान नहीं होता था। उनकी नग्नावस्था के बारे में पुलिस सतर्क थी। अत: उन्हे पकड़कर पुलिस ने जेल में डाल दिया। इतने में त्रैलंग स्वामी जेल की छत पर दिखाई पड़े। जिस कोठरी में पुलिस ने त्रैलंग स्वामी को बन्द कर ताला लगा दिया था, उस कोठरी का ताला ज्यों का त्यों था और त्रैलंग स्वामी जेल की छत पर कैसे आ गये यह आश्चर्य का विषय था। हताश होकर पुलिस अधिकारियों ने पुन: उन्हे जेल की कोठरी में बन्द कर ताला लगा दिया और कोठरी के सामने पुलिस का पहरा भी बैठा दिया किन्तु इस बार भी महान योगी शीघ्र छत पर टहलते दिखाई दिये।[13]

त्रैलंग स्वामी सदा मौन धारण किये रहते थे। निराहार रहने के बाद भक्त यदि कोई पेय पदार्थ लाते तो उसे ही गृहण कर अपना उपवास तोड़ते थे। एक बार एक नास्तिक ने एक बाल्टी चूना घोलकर स्वामी जी के सामने रख दिया और उसे गाढ़ा दही बताया। स्वामी जी ने तो उसे पी लिया किन्तु कुछ ही देर बाद नास्तिक व्यक्ति पीड़ा ने छटपटाने लगा और स्वामी जी से अपने प्राणो की रक्षा की भीख मांगने लगा। त्रैलंग स्वामी ने अपना मौन भंग करते हुए कहा कि तुमने मुझे विष पीने के लिये दिया, तब तुमने नहीं जाना कि तुम्हारा जीवन मेरे जीवन के साथ एकाकार है। यदि मैं यह नहीं जानता होता कि मेरे पेट में उसी तरह ईश्वर विराजमान है जिस तरह वह विश्व के अणु-परमाणु में है तब तो चूने के घोल ने मुझे मार ही डाला होता। अब तो तुमने कर्म का देवी अर्थ समझ लिया है, अत: फिर कभी किसी के साथ चालाकी करने की कोशिश मत करना। त्रैलंग स्वामी के इन शब्दो के साथ ही वह नास्तिक कष्ट मुक्त हो गया।[13]

आध्यात्मिक शक्ति[संपादित करें]

त्रैलंग स्वामी की प्रबल आध्यात्मिक शक्ति के अनेक उदाहरण मिलते है।[13]

  • एक बार परमहंस योगानन्द के मामा ने उन्हे बनारस के घाट पर भक्तो की भीड़ के बीच बैठे देखा। वे किसी प्रकार मार्ग बनाकर स्वामी जी के निकट पहुंच गये और भक्तिपूर्ण उनका चरण स्पर्श किया। उन्हे यह जानकर महान आश्चर्य हुआ कि स्वामी जी का चरण स्पर्श करने मात्र से वे अत्यन्त कष्टदायक जीर्ण रोग से मुक्ति पा गये।
  • काशी में त्रैलंग स्वामी एक बार लाहिड़ी महाशय का सार्वजनिक अभिनन्दन करना चाहते थे जिसके लिये उन्हे अपना मौन तोड़ना पड़ा। जब त्रैलंग स्वामी के एक शिष्य ने कहा कि आप एक त्यागी संन्यासी है। अत: एक ग्रहस्थ के प्रति इतना आदर क्यों व्यक्त करना चाहते है? उनर रूप में त्रैलंग स्वामी ने कहा था मेरे बच्चे लाहिड़ी महाशय जगत जननी के दिव्य बालक है। मां उन्हे जहां रख देती है, वही वे रहते है। सांसारिक मनुष्य के रूप में कर्तव्य का पालन करते हुए भी उन्होने मनुष्य के रूप में वह पूर्ण आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है जिसे प्राप्त करने के लिये मुझे सब कुछ का परित्याग कर देना पड़ा। यहां तक कि लंगोटी का भी।

टिप्पणी[संपादित करें]

  1. The Guinness Book of Records states that the longest confirmed lifespan in human history is 122 years 164 days (44,724 days in total)[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकार्ड, १९९९, पृ. १०२, ISBN 0-85112-070-9.
  2. Varishthananda 2007
  3. McDermott, Rachel Fell (2001). Mother of My Heart, Daughter of My Dreams. Oxford University Press. पृ॰ 145.
  4. Yogananda, Paramhansa (1948). "Chapter 31". Autobiography of a Yogi. Philosophical Library.
  5. Rao 2004, पृष्ठ xii
  6. भारत के महान साधक, प्रथम खंड, प्रमथनाथ भट्टाचार्य, नवभारत प्रकाशन, दरभंगा (बिहार), चतुर्थ संस्करण-१९८६, पृष्ठ-९.
  7. हिंदी विश्वकोश, खंड-१२, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, संस्करण-१९७०, पृष्ठ-२७४.
  8. भारत के महान साधक, प्रथम खंड, प्रमथनाथ भट्टाचार्य, नवभारत प्रकाशन, दरभंगा (बिहार), चतुर्थ संस्करण-१९८६, पृष्ठ-२.
  9. भारत के महान साधक, प्रथम खंड, प्रमथनाथ भट्टाचार्य, नवभारत प्रकाशन, दरभंगा (बिहार), चतुर्थ संस्करण-१९८६, पृष्ठ-२-४.
  10. भारत के महान साधक, प्रथम खंड, प्रमथनाथ भट्टाचार्य, नवभारत प्रकाशन, दरभंगा (बिहार), चतुर्थ संस्करण-१९८६, पृष्ठ-४.
  11. भारत के महान साधक, प्रथम खंड, प्रमथनाथ भट्टाचार्य, नवभारत प्रकाशन, दरभंगा (बिहार), चतुर्थ संस्करण-१९८६, पृष्ठ-२३.
  12. श्रीरामकृष्णलीलामृत, श्री नरहर रामचन्द्र परांजपे, अनुवादक- पंडित द्वारकानाथ तिवारी, रामकृष्ण मठ, नागपुर, अष्टम संस्करण, पृष्ठ-२५६.
  13. त्रैलंग स्वामी। शैवाल.कॉम

अतिरिक्त पठन[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]