ताग़ूत
अरबी लफ़्ज़ ताग़ूत तुग़ियान से निकला है, जिसका मतलब है सरकशी।
किसी को ताग़ी कहने के बजाय अगर ताग़ूत (सरकशी) कहा जाए तो इसका मतलब ये है कि वो बेइन्तिहा सरकश है। मिसाल के तौर पर किसी को हसीं (ख़ूबसूरत) कहने के बजाय अगर ये कहा जाए कि वो हुस्न (ख़ूबसूरती) है तो इसका मतलब ये होगा कि वो ख़ूबसूरती में इन्तिहाई दर्जे को पहुँचा हुआ है।
ताग़ूत लुग़त (शब्दकोष) के लिहाज़ से हर उस शख़्स को कहा जाएगा, जो अपनी जाइज़ हद से आगे निकल गया हो। क़ुरआन की ज़बान में ताग़ूत से मुराद वो बंदा है, जो बन्दगी की हद से आगे निकलकर ख़ुद मालिक और ख़ुदा होने का दम भरे और ख़ुदा के बन्दों से अपनी बन्दगी कराए। ख़ुदा के मुक़ाबले में एक बन्दे की सरकशी के तीन दर्जे हैं-
पहला दर्जा ये है कि उसूली तौर पर कोई बंदा ख़ुदा की फ़रमाँबरदारी ही को हक़ माने, मगर अमली तौर पर उसके हुक्मों की ख़िलाफ़वर्ज़ी करे। इसका नाम फ़िस्क़ (नाफ़रमानी) है।
दूसरा दर्जा ये है कि वो उसकी फ़रमाँबरदारी से उसूली तौर पर मुँह फेरकर या तो ख़ुदमुख़्तार बन जाए या उसके सिवा किसी और की बन्दगी करने लगे। ये कुफ़्र है।
तीसरा दर्जा ये है कि वो मालिक से बाग़ी होकर उसके मुल्क और उसकी रैयत में ख़ुद अपना हुक्म चलाने लगे। इस आख़िरी दर्जे पर जो बंदा पहुँच जाए, उसी का नाम ताग़ूत है और कोई आदमी सही मायनों में अल्लाह को माननेवाला नहीं हो सकता जब तक कि वो उस ताग़ूत का इनकारी न हो।...[1]