तरलता जाल
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- तरलता जाल (Liquidity Trap) कीन्स के अर्थशास्त्र की एक स्थिति है।
- इसमें ब्याज दर बहुत कम हो जाती है।
- ब्याज दर घटने से लोग बैंकों में पैसा नहीं रखते।
- लोग निवेश करने के बजाय अपने पास नकद (कैश) रखना पसंद करते हैं।
- तरलता जाल के लिए दो चीजें जरूरी हैं: नकारात्मक ब्याज दर और शून्य निचली सीमा।
- बैंकिंग संकट या भारी कर्ज के कारण ब्याज दरें शून्य से नीचे जा सकती हैं।
- आबादी घटने और असमानता बढ़ने से भी ऐसा हो सकता है।
- एक अच्छी और भरोसेमंद मौद्रिक नीति (monetary policy) इस समस्या को ठीक कर सकती है।
- मंदी, कम मांग या युद्ध के डर से लोग नकदी जमा करने लगते हैं।
- इस स्थिति को ही तरलता जाल (Liquidity Trap) कहते हैं।
- इसमें ब्याज दरें शून्य के बहुत करीब पहुंच जाती हैं।
- इस दौरान बाजार में पैसा बढ़ाने पर भी महंगाई नहीं बढ़ती है।
The Great Depression, the Great Recession and Japan's Lost Decades तरलता जाल के उदाहरण हैं।[1]
- जब ब्याज दर बहुत कम हो जाती है, तो लोग कर्ज देने के बजाय अपने पास नकद रखना चाहते हैं।
- इस स्थिति में केंद्रीय बैंक का ब्याज दरों पर कोई नियंत्रण नहीं रहता है।
- हालांकि यह स्थिति भविष्य में आ सकती है, लेकिन लेखक के अनुसार अभी तक इसका कोई उदाहरण नहीं देखा गया है। [1]
- मौद्रिक नीति (monetary policy) के बेअसर होने के विचार को ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन हिक्स ने आगे बढ़ाया।
- उन्होंने कीन्स के सिद्धांतों को समझाने के लिए 'आईएस-एलएम मॉडल' (IS-LM model) बनाया।
- नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमैन ने भी मौद्रिक नीति पर काम करते समय हिक्स के इसी मॉडल का इस्तेमाल किया।
- तरलता जाल में सरकार की पुरानी मौद्रिक नीतियां (monetary policies) काम करना बंद कर देती हैं।
- ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ब्याज दरें शून्य के बहुत करीब पहुँच जाती हैं।
- इस स्थिति में बाजार में नया पैसा डालने का भी कोई असर नहीं पड़ता है।
- लोग पैसे को बैंक या बांड में रखने के बजाय अपने पास रखना बेहतर समझते हैं।
- तरलता जाल में लोगों के लिए नकदी (कैश) और बांड दोनों एक जैसे हो जाते हैं।
- ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दोनों पर मिलने वाला ब्याज लगभग बराबर होता है।
- नकदी पर शून्य (0%) ब्याज मिलता है और बांड पर भी ब्याज शून्य के करीब होता है।
- इसलिए केंद्रीय बैंक बाजार में पैसा बढ़ाकर भी ब्याज दर को नहीं बदल पाता और उस पर अपना नियंत्रण खो देता है।
- कीन्स के अनुसार, तरलता जाल में लोग बांड खरीदना बिल्कुल बंद कर देते हैं।
- वे बांड के बजाय अपने पास नकद (कैश) रखना ज्यादा पसंद करते हैं।
- लोग अपने बांड को बेचकर तुरंत नकद पैसा ले लेते हैं।
- इस वजह से बांड के दाम अचानक बहुत गिर जाते हैं और उन पर मिलने वाला रिटर्न (yield) बढ़ जाता है।
- इसके बावजूद लोग नकद ही चाहते हैं, चाहे बांड पर कितना भी ज्यादा फायदा या ब्याज क्यों न मिले।
- हाइमन मिन्स्की के अनुसार, भारी कर्ज और मंदी के बाद बाजार में नया पैसा डालने से भी फायदा नहीं होता।
- इस स्थिति में नया पैसा आने पर भी दूसरी वित्तीय संपत्तियों (जैसे शेयर या बांड) की कीमतें नहीं बढ़ती हैं।
- इसके कारण उन संपत्तियों पर ब्याज दरें बढ़ जाती हैं जिन्हें आसानी से नकद में नहीं बदला जा सकता।
- लोग केवल उसी पैसे या संपत्ति को सुरक्षित मानते हैं जो पूरी तरह से नकद (लिक्विड) हो। [1]
- पैसों की मांग को ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव से जोड़कर देखा जा सकता है।
- खास हालातों में, ब्याज दर थोड़ी सी भी बदलने पर पैसों की मांग बहुत ज्यादा (असीमित) बढ़ सकती है।
- ऐसी स्थिति को ही तरलता जाल (Liquidity Trap) कहा जाता है।
- यह स्थिति अक्सर बड़ी मंदी या किसी बड़े वित्तीय संकट (Financial Crisis) के तुरंत बाद पैदा होती है। [1, 2, 3]

- 1930 और 1940 के दशक में कीन्स के विचारों के बाद कुछ नए (नियोक्लासिकल) अर्थशास्त्री आए।
- इन अर्थशास्त्रियों ने यह साबित करने की कोशिश की कि तरलता जाल का असर कम किया जा सकता है।
- डॉन पैटिनकिन और लॉयड मेट्ज़लर ने इसके लिए "पिगो प्रभाव" (Pigou Effect) का सहारा लिया।
- इस नियम के अनुसार, लोगों के पास जमा नकद पैसा सीधे तौर पर बाज़ार में चीज़ों की मांग को बढ़ाता है।
- यह मांग सीधे आईएस/एलएम मॉडल के 'निवेश बचत' (IS Curve) को बदल देती है।
- इस तरह तरलता जाल होने पर भी मौद्रिक नीति बाज़ार में सुधार ला सकती है।
- मिल्टन फ्रीडमैन और अन्ना श्वार्ट्ज जैसे मुद्रावादी (Monetarists) अर्थशास्त्री तरलता जाल की बात को नहीं मानते थे।
- उनका कहना था कि जब तक सभी तरह के सरकारी और निजी कर्ज पर ब्याज दर शून्य न हो, तब तक तरलता जाल नहीं हो सकता।
- इसमें छोटे और लंबे समय (अल्पकालिक और दीर्घकालिक) के लिए दिए जाने वाले दोनों तरह के कर्ज शामिल हैं।
- उनके अनुसार, अगर बाजार में किसी भी तरह के कर्ज पर थोड़ा भी ब्याज मिल रहा है, तो तरलता जाल की स्थिति पैदा नहीं हो सकती।
- जापान की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक मंदी में फंसी रही।
- वहां ब्याज दरें लगभग शून्य थीं, फिर भी सुधार नहीं हुआ।
- इस वजह से तरलता जाल (Liquidity Trap) का विचार फिर से चर्चा में आ गया।
- कीन्स के अनुसार तरलता जाल में ब्याज दर थोड़ी ज्यादा भी हो सकती है।
- लेकिन 1990 के दशक में जापान में यह दर शून्य या उसके बेहद करीब (ZIRP) पहुँच गई थी।
- अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ब्याज दर कभी भी शून्य से नीचे नहीं जा सकती।
- निकोलस क्राफ्ट्स जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि इस जाल से बचने के लिए केंद्रीय बैंक को महंगाई का एक लक्ष्य (Inflation-targeting) तय करना चाहिए।
- ऑस्ट्रियाई स्कूल के अर्थशास्त्री कीन्स के इस सिद्धांत को पूरी तरह से गलत मानते हैं।
- उनका कहना है कि कम ब्याज दर होने पर भी लोग निवेश क्यों नहीं करते।
- इसका कारण पैसे बचाकर रखने की आदत (तरलता वरीयता) नहीं है।
- इसका असली कारण पुरानी गलत नीतियां, फिजूलखर्ची और समय के साथ बदलती ज़रूरतें हैं।
- शिकागो स्कूल के अर्थशास्त्री भी तरलता जाल के इस विचार का हमेशा विरोध करते हैं।
- ब्रैड डेलॉन्ग और साइमन व्रेन-लुईस जैसे अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अर्थव्यवस्था अभी भी आईएस-एलएम मॉडल (IS-LM model) पर ही चलती है।
- हालांकि, अब इसके लिए एक नए और सुधरे हुए (Updated) मॉडल की जरूरत है।
- उनके अनुसार, इस स्थिति में अर्थव्यवस्था के काम करने के नियम "पूरी तरह बदल गए हैं"।

- साल 2008 के आर्थिक संकट के समय अमेरिका और यूरोप में कम समय के कर्ज पर ब्याज दरें शून्य के करीब पहुँच गई थीं।
- पॉल क्रुगमैन जैसे अर्थशास्त्रियों का मानना था कि अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे विकसित देश तरलता जाल (Liquidity Trap) में फंस चुके थे।
- साल 2008 से 2011 के बीच अमेरिका ने बाजार में पैसे की मात्रा को तीन गुना बढ़ा दिया था।
- इसके बावजूद वहां चीजों की कीमतों या डॉलर की कीमत पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।
- स्कॉट समनर जैसे दूसरे अर्थशास्त्रियों ने भी इस बात का समर्थन किया।
- अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि तरलता जाल के कारण ही बाजार में बहुत ज्यादा पैसा आने पर भी महंगाई नहीं बढ़ती है।
- साल 2008 के संकट के बाद अमेरिका ने क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) के तहत बाजार में 3.5 ट्रिलियन डॉलर डाले थे।
- विशेषज्ञों के अनुसार, जब ब्याज दर शून्य होती है, तो लोगों को नकद पैसा पास में रखने पर कोई नुकसान नहीं होता।
- इसलिए निवेशक उस पैसे को खर्च करने के बजाय अपने पास ही जमा करके रख लेते हैं।
- इस पैसे की जमाखोरी के कारण बाजार में महंगाई उम्मीद से आधी ही बढ़ सकी।
- अर्थशास्त्रियों का यह भी कहना है कि तरलता जाल की स्थिति केवल तभी आती है जब अर्थव्यवस्था बहुत भारी मंदी में हो।
- साल 2020 में कोविड-19 संकट के समय केंद्रीय बैंकों ने बाजार में बहुत भारी मात्रा में पैसा डाला था।
- इसके बावजूद बाजार में महंगाई बहुत कम रही और अर्थव्यवस्था में कोई खास सुधार नहीं हुआ।
- इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि लोगों ने उस पैसे को खर्च करने के बजाय अपने पास नकद (कैश) जमा करके रख लिया था।
- उत्तर-कीनेसियन (Post-Keynesian) अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मुख्यधारा के अर्थशास्त्री जानबूझकर तरलता जाल की गलत परिभाषा बताते हैं।
- उनका कहना है कि ये अर्थशास्त्री राजकोषीय नीति (Fiscal policy) के बजाय मौद्रिक नीति (Monetary policy) को बेहतर दिखाने के लिए ऐसा करते हैं।
- अमेरिका में क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) के कारण संपत्तियों (जैसे शेयर या बांड) के दाम बढ़े और ब्याज दरें घटीं।
- कीन्स के नियमों के अनुसार, असली तरलता जाल तब तक नहीं हो सकता जब तक बांड के दाम गिर न रहे हों और उन पर ब्याज दरें बढ़ न रही हों।
- इस स्थिति में बाजार में नया पैसा डालने से न तो ब्याज दरों पर कोई असर पड़ा और न ही चीजों के दाम बढ़े।
- कुछ आलोचकों का मानना है कि साल 2008 के संकट के बाद अमेरिकी केंद्रीय बैंक (फेडरल रिजर्व) ने ब्याज दरों पर अपना नियंत्रण कभी नहीं खोया।
- उनके अनुसार, अमेरिका ने सिर्फ साल 2009 और 2010 की शुरुआत में ही तरलता जाल (Liquidity Trap) का सामना किया था।
- इस छोटे समय के बाद वहां कोई तरलता जाल नहीं था, क्योंकि सरकारी और निजी बांड की बाजार में बहुत ज्यादा मांग थी।
- यह बात कीन्स के उस नियम के खिलाफ है जिसमें उन्होंने कहा था कि लोग बांड के बजाय सिर्फ नकद (कैश) रखना चाहते हैं।
- आधुनिक अर्थशास्त्र में नकद और बांड की परिभाषा बदल गई है, जहाँ कुछ सरकारी बांड (Treasuries) को कर्ज नहीं बल्कि नकद के बराबर ही माना जाता है।
- महंगाई पर फोकस
- उल्टा उपज वक्र
- हेलीकॉप्टर का पैसा
- उत्पादकता
- निवेश पर प्रतिफल
- अटकलबाजी बुलबुला
- सबप्राइम बंधक संकट
- असफल होने के लिए बहुत बड़ा
- शून्य ब्याज दर नीति
- ↑ Eggertsson, Gauti B.; Egiev, Sergei K. (2025). "Liquidity Traps: A Unified Theory of the Great Depression and the Great Recession". Journal of Economic Literature (अंग्रेज़ी भाषा में). 63 (4): 1424–1551. डीओआई:10.1257/jel.20241306. आईएसएसएन 0022-0515.
- ↑ Krugman, Paul R. (9 October 2011). "IS-LMentary". The New York Times.
- ↑ Krugman, Paul R. (7 January 2017). "The Shock of the Normal". The New York Times.