तन सिंह

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तन सिंह

कार्यकाल
1962-1977

कार्यकाल
1952-1957

श्री क्षत्रिय युवक संघ की स्थापना [1]

जन्म २५ जनवरी १९२४
बेरसीयाला, जैसलमेर
मृत्यु 7 दिसम्बर 1979(1979-12-07) (उम्र 55)
राजनीतिक दल जनता पार्टी
धर्म हिन्दू धर्म

तन सिंह एक भारतीय राजनेता, व लेखक थे। [2] वे दो बार सांसद और दो बार राजस्थान विधानसभा से सदस्य रह चुके थे उन्होंने श्री क्षत्रिय युवक संघ नामक संस्था की स्थापना की जो राजपूत समाज के बालक-बालिकाओं में संस्कार निर्माण का कार्य करती हैं।[3]

==तन सिंह की प्रमुख कृतियां== [4]

  • राजस्थान रा पिछोला
  • समाज चरित्र
  • बदलते दृश्य
  • होनहार के खेल
  • साधक की समस्याएं
  • शिक्षक की समस्याएं
  • जेल जीवन के संस्मरण
  • लापरवाह के संस्मरण
  • पंछी की राम कहानी
  • एक भिखारी की आत्मकथा
  • गीता और समाज सेवा
  • साधना पथ

तनसिंहजी की प्रमुख राजस्थानी रचनाएँ[संपादित करें]

  • धरती रा थाम्भा कद धसकै / तन सिंह
  • ए जी थांरा टाबर झुर-झुर रोवै म्हारी माय / तन सिंह
  • चालण रो वर दे माँ मार्ग कांटा सूं भरपूर / तन सिंह
  • भूल्या बिसरया भाईडां ने / तन सिंह
  • भायला

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. https://www.patrika.com/pali-news/kshatriya-youth-association-seeding-sanskars-in-younger-generation-5540214/
  2. https://sridungargarhtimes.com/celebrated-the-death-anniversary-of-tansingh-ji-the-founder-of-shri-kshatriya-youth-federation/
  3. "6th Lok Sabha Members Bioprofile". मूल से 15 जून 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 30 जून 2014.
  4. https://shrikys.org/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%af/
Jivan 

कुल 56 साल कुछ महीने का उनका जीवन था लेकिन कोई एक ही जीवन में इतना कुछ कर जाए इस पर यक़ीन नहीं होता।उस जमाने में बाड़मेर जैसलमेर में शिक्षा नाम की कोई चीज नहीं थी पर वो चौपासनी में पढ़े व ओर वहां बेस्ट स्टूडेंट का तमग़ा मिला।

वहाँ से पिलानी व फिर नागपुर से LLB की।बाड़मेर के दलित मोची समाज ने उनको अपने वार्ड में बुलाकर पार्षद बनाया इस तरह से वो शहर के पहले नगरपालिका अध्यक्ष बने।उन्हीं दिनों एक संघर्ष नाम का अख़बार निकाला ओर बाड़मेर के पहले पत्रकार भी बन गए।52 के चुनाव में बाड़मेर के पहले विधायक बने पहली ही विधानसभा में वो सन 56 में नेता प्रतिपक्ष बने।

57में दोबारा विधायक हुवे।62 में गायत्री देवी ने उनको Parliament का इलेक्शन लड़ने के लिए कहा उन्होंने मना कर दिया कहा मेरे पास पैसा नहीं हैं।गायत्री देवी ने 21000का चैक दिया उन्होंने विश्व के सबसे बड़े संसदीय क्षैत्र बाड़मेर जैसलमेर शेरगढ का चुनाव महज़ 11हजार रूपये व एक जीप के सहारे जीता।शेष पैसा भी उन्होंने लोटा दिया ऐसा करने वाले भी वो पहले व्यक्ति थे।

संसद उन दिनों भी अपने स्वरूप में इलीट थी जब उनको मोटे लठ्ठे के कपड़े साफ़ा क़मीज़ धोती व पगरखी में देखा तो कई सांसदों को लगा कोई अनपढ़ ग्रामीण जीत कर आ गया है। एक महिला सांसद ने दया भाव से पूछा कुछ पढ़े लिखे हो तो बोले LLB हूँ ।

बाद में जब Parliamentary Debates में बोलने लगे तो उनकी क़ाबलियत सामने आई।62 में चीन का अटेक हो गया नेहरू अपनी चाईना पोलिसी पर घिर गए।विपक्ष के तीखे हमले ओर चीन की दग़ाबाज़ी का दुख लेकिन ऐसे वक्त में संसद में एक ऐसा सांसद जिसने नेशनल स्पिरिट दिखाई ‘’आज वक्त प्राइममिनिस्टर की खामिया निकालने का नहीं है उनके साथ खड़े रहने का है।

अब हम सौ व पाँच नहीं वयम पंचाधिकम शतम है।एक व्यक्ति डूब रहा है हम किनारे पर कह रहे है हमने तो पहले ही कहा था कि डूबोगे उसको सहायता के हाथ की ज़रूरत है”। नेहरू ने खड़े होकर पहली बार के सांसद को शुक्रिया कहा।

वो पहले सांसद थे जो अपने साल भर का ब्यौरा सासंद के रूप में जनता के सामने रखते थे ‘आपके प्रतिनिधि के रूप में लोकसभा में पहला साल’इस नाम से बुकलेट निकालते।संसद में क्या सवाल किये क्या मुद्दे उठाये किन मंत्रियों को पत्र लिखे मुलाक़ात की क्या मसले हल हो गए क्या नहीं हुवे व संसदीय क्षैत्र के किन गाँवों का टूर किया’।67 का लोकसभा वो अमृत नाहटा से 17000वोट से हार गए।

तब उन्होंने सामूहिक रोज़गार सृजन का एक नया मोडल पेश किया व उस जमाने में सैकड़ो नौजवानों को रोज़गार दिया।सांसद हार गए तो अपने हाथ से खेती करने लग गए।दस साल बाद 77के चुनाव आए जनता पार्टी ने उनको MP का चुनाव लड़ने के लिए कहा।उन्होंने फिर मना कर दिया कि मेरे पास चुनाव लड़ने का पैसा नहीं है।पार्टी ने चुनाव खर्च के लिए आश्वस्त किया ओर वो रेकर्ड वोट से जीत गए।

दिसंबर 79 में सांसद रहते हुवे ही अंतिम साँस ली।अपने जीवन काल में दर्जन भर उच्च कोटि की किताबें लिखी 250 गीत लिखे हज़ारों पत्र लिखे एक पत्रिका संघ शक्ति नाम से निकाली।रोज डायरी लिखते थे खुद का आत्मविश्लेषण अपने सम्पर्क वालो का मार्गदर्शन ओर आध्यात्मिक अनुभूतियां ।

व्यवहार में एक फ़ीसदी भी कृत्रिमता का स्थान नहीं खरे प्रमाणिक जिसको अपनाया लाख कमियों के बाद छोड़ा नहीं ,जो जचा नहीं वो कितना ही बड़ा रहा उसकी कोई लल्लो चप्पो नही की।

अपनी धुन व संकल्प के इतने पक्के थे कि कितनी ही विकट परिस्थिति हो जो तय किया वो करके ही रहते थे।उनकी माताजी की सहज टिप्पणी थी ‘तणैराज रे गद्दो रे पोणी री गुटकी पीयोड़ी है इये कारण बादीलो(हठी) है’।

वो उच्च कोटि के आध्यात्मिक व्यक्ति थे कभी आम जनमानस तक उनकी लिखी आध्यात्मिक संपदा भी पहुंचेंगी ।उन्होंने 22साल की उम्र में जो संस्था बनाई वो आज भारत की कुछ गिनती की संस्थाओं में एक है।आइंस्टाइन ने गांधी के लिए कहा था कि ‘आने वाले समय में दुनिया आश्चर्य करेगी कि हाड़ मांस का कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर रहा था’।

मैं आइंस्टाइन तो नहीं हूँ पर पूरे आत्मविश्वास से कह सकता हूँ उनके अनेकों छुपे पहलू जब दुनियाँ के सामने आएँगे तो लोग ज़रूर अचरज से भरेंगे कि ऐसा महापुरुष इस रेगिस्तान में पैदा हुवा था।