ढोला-मारू

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ढोला मारू रा दूहा ग्यारहवीं शताब्दी मे रचित एक लोकभाषा-काव्य है। मूलतः दोहों में रचित इस लोक काव्य को सत्रहवीं शताब्दी मे कुशलराय वाचक ने कुछ चौपाईयां जोड़कर विस्तार दिया। इसमे राजकुमार ढोला और राजकुमारी मारू की प्रेमकथा का वर्णन है।

'डोला-मारू' की कथा राजस्थान की अत्यन्त प्रसिद्ध लोक गाथा है। इस लोकगाथा की लोकप्रियता का अनुमान निम्नलिखित दोहे से लगाया जा सकता है, जो राजस्थान में अत्यन्त प्रसिद्ध है-

सोरठियो दूहो भलो, भलि मरवणरी बात।
जोवन छाई धण भली, तारांछाई रात।।

ये कथा कवि कलोल द्वारा लिखी गयी।

मूल कथा[संपादित करें]

राजस्थानी कथा[संपादित करें]

पूंगल देश का राजा अपने यहाँ अकाल पड़ने पर नरवर राज्य आता है। यहाँ वह अपनी बेटी मारू का विवाह नरवर के राजकुमार ढोला से करता है। उस समय ढोला की उम्र तीन और मारू की डेढ़ साल होती है। सुकाल आने पर पूंगल का राजा परिवार सहित अपने महल लौट जाता है। कई साल बीत जाते हैं।

ढोला बचपन के विवाह को भूल जाता है। बड़ा होने पर उसका दूसरा विवाह मालवणी से हो जाता है। मालवणी को अपनी सौतन मारू और उसकी सुन्दरता का किस्सा मालूम है। इसलिए वह पूंगल से आया कोई भी संदेश ढोला तक नहीं पहुंचने देती। उधर मारू एक रात सपने में ढोला को देखती है। उसके बाद उसके जी को चैन नहीं मिलता। मारू की यह हालत देख पूंगल का राजा एक चतुर गायक को नरवर भेजता है। गायक गाने के बहाने ढोला तक मारू का संदेश पहुंचाता है। गीतों में पूंगल और मारू का नाम सुनते ही ढोला को अपने पहले विवाह की याद आ जाती है। ढोला मारू से मिलने के लिए बेचैन हो उठता है, मगर मालवणी उसे किसी न किसी बहाने रोकती रहती है।

एक दिन ढोला मारू से मिलने तेज ऊंट पर सवार होकर निकल ही पड़ता है। मारू ढोला को देख झूम उठती है। जब वह मारू को लेकर नरवर के लिए लौटता है तो रास्ते में खलनायक उमर सूमरा मारू को छीनने की चाल चलता है। उमर सूमरा घोड़े पर बैठ कर उनका पीछा करता है, लेकिन हवा की रफ्तार से ऊंट दौड़ाता ढोला कहां उसके हाथ आने वाला। नरवर लौटकर वह मालवणी को भी मना लेता है। अंततः ढोला-मारू के साथ मालवणी भी खुशी-खुशी रहने लगती है।

विस्तृत कहानी- इस कहानी के अनुसार नरवर के राजा नल के पुत्र साल्हकुमार का विवाह महज 3 साल की उम्र में बीकानेर स्थ‍ित पूंगल क्षेत्र के पंवार राजा पिंगल की पुत्री से हुआ। चूंकि यह बाल-विवाह था, अत: गौना नहीं हुआ था। जब राजकुमार वयस्क हुआ तो उसकी दूसरी शादी कर दी गई, परंतु राजकुमारी को गौने का इंतजार था। बड़ी होकर वह राजकुमारी अत्यंत सुंदर और आकर्षक बन गई थी।

राजा पिंगल ने दुहन(पुत्री) को भेजने के लिए नरवर तक कई संदेश भेजे लेकिन राजकुमार की दूसरी पत्नी उस देश से आने वाले हर संदेश वाहक की हत्या करवा देती थी। राजकुमार अपने बचपन की शादी को भूल चुके थे, लेकिन दूसरी रानी इस बात का जानती थी। उसे डर था कि राजकुमार को सब याद आते ही वे दूसरी रानी को छोड़कर चले जाएंगे, क्योंकि पहली रानी बेहद खूबसूरत थी।

पहली रानी इस बात से अंजान, राजकुमार को याद किया करती थी। उसकी इस दशा को देख पिता ने इस बार एक चतुर ढोली को नरवर भेजा। जब ढोली नरवर के लिए रवाना हो रहा था, तब राजकुमारी ने उसे अपने पास बुलाकर मारू राग में दोहे बनाकर दिए और समझाया कि कैसे उसके प्रियतम के सम्मुख जाकर गाकर सुनाना है।

चतुर ढोली एक याचक बनकर नरवर के महल पहुंचा। रात में रिमझिम बारिश के साथ उसने ऊंची आवाज में ने मल्हार राग में गाना शुरू किया। मल्हार राग का मधुर संगीत राजकुमार के कानों में गूंजने लगा। ढोली ने गाते हुए साफ शब्दों में राजकुमारी का संदेश सुनाया। गीत में जैसे ही राजकुमार ने राजकुमारी का नाम सुना, उसे अपनी पहली शादी याद आ गई। ढोली ने बताया कि उसकी राजकुमारी कितनी खूबसूरत है और वियोग में है।

ढोली के अनुसार राजकुमारी के चेहरे की चमक सूर्य के प्रकाश की तरह है, झीणे कपड़ों में से शरीर ऐसे चमकता है मानो स्वर्ण झांक रहा हो। मोरनी जैसी चाल, हीरों जैसे दांत, गुलाबी सरीखे होंठ है। बहुत से गुणों वाली, क्षमाशील, नम्र व कोमल है, गंगा के पानी जैसी गोरी है, उसका मन और तन श्रेष्ठ है। लेकिन उसका साजन तो जैसे उसे भूल ही गया है और लेने नहीं आता।

सुबह राजकुमार ने उसे बुलाकर पूछा तो उसने राजकुमारी का पूरा संदेशा सुनाया। आखिर साल्हकुमार ने अपनी पहली पत्नी को लाने का निश्चय किया पर उसकी दूसरी पत्नी मालवणी ने उन्हे रोक दिया। ढोला ने कई बहाने बनाए पुगल जाने के पर मालवणी हर बार उसे किसी तरह रोक देती।

आखिरकार एक दिन राजकुमार एक बहुत तेज चलने वाले ऊंट पर सवार होकर अपनी प्रियतमा को लेने पूंगल पहुंच गया। राजकुमारी अपने प्रियतम से मिलकर खुशी से झूम उठी। दोनों ने पूंगल में कई दिन बिताए। एक दिन जब दोनों ने नरवर जाने के लिए राजा पिंगल से विदा ली तब जाते समय रास्ते के रेगिस्तान में राजकुमारी को सांप ने काट लिया पर शिव पार्वती ने आकर उसको जीवन दान दे दिया।

लेकिन इसके बाद उनका सामना उमरा-सुमरा सें हुआ जो साल्हकुमार को मारकर राजकुमारी को हासिल करना चाहता था। वह उसके रास्ते में जाजम बिछाकर महफिल सजाकर बैठ गया। राजकुमार सल्हाकुमार अपनी खूबसूरत पत्नी को लेकर जब उधर से गुजरा तो उमर ने उससे मनुहार की और उसे रोक लिया। राजकुमार ने राजकुमारी को ऊंट पर बैठे रहने दिया और खुद उमर के साथ अमल की मनुहार लेने बैठ गया। इधर, ढोली गा रहा था और राजकुमार व उमर अफीम की मनुहार ले रहे थे। मारू के देश से आया ढोली बहुत चतुर था, उसे उमर सुमरा के षड्यंत्र का ज्ञान आभास हो गया था। ढोली ने चुपके से इस षड्यंत्र के बारे में राजकुमारी को बता दिया।

राजकुमारी भी रेगिस्तान की बेटी थी, उसने ऊंट को एड़ी मारी जि‍ससे ऊंट भागने लगा। ऊंट को रोकने के लिए राजकुमार दौड़ने लगा, जैसे ही राजकुमार पास आया, मारूवणी ने कहा - धोखा है जल्दी ऊंट पर चढ़ो, ये तुम्हें मारना चाहते हैं। इसके बाद दोनों ने वहां से भागकर नरवर पहुंचकर ही दम लिया। यहां राजकुमारी का स्वागत सत्कार किया गया और वह,वहां की रानी बनकर राज करने लगी। इतिहास में इस प्रेमी जोड़े को ढोला मारू के नाम से जाना जाता है। तब से आज तक उनके नाम व प्रेम का गुणगान किया जाता ह

छत्तीसगढ़ी कथा[संपादित करें]

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