मोहन अवस्थी

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डॉ॰ मोहन अवस्थी (जन्म २० जनवरी १९२९) को पिपरगाँव फ़र्रूख़ाबाद में हुआ। डॉ॰ अवस्थी की काव्य कृतियाँ ‘अग्निगंध’ और ‘अभिशप्त महारथी’ उल्लेखनीय हैं। अभिशप्त महारथी उच्चकोटि का काव्य ग्रंथ है, जिसमें उन्होंने भारतीय संस्कृति का चित्र प्रस्तुत किया है और यह आशा प्रकट की है कि यह ग्रंथ ‘देश की आधुनिक समस्याओं का समाधान खोज निकालने में सहायक होगा।’ सम्प्रति इलाहाबाद विश्व विद्यालय हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त होकर साहित्य सृजन में रत हैं।[1] प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही हुई। आपने १९४२ में वर्नाक्युलर फाइनल परीक्षा उत्तीर्ण की। अवस्थी जी बतलाते हैं कि ‘मेरी प्रारम्भिक शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण में पं० त्रियुगी दयाल दीक्षित जी व अबोध मिश्र जैसे कवियों का अत्यधिक योगदान है, जिनका सानिध्य प्राप्त होने से मेरे कवि-रूप को प्रौढ़ता प्राप्त हुई।’ हाई स्कूल करने के बाद आपने एक अमरीकी कम्पनी में ‘असिस्टेंट मैनेजर’ के रूप में तथा डिस्ट्रिक बोर्ड के एकाउन्ट विभाग में ‘असिस्टेंट एकाउंटेंट’ के रूप में कार्य किया। तदनन्तर इण्टरमीडिएट व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में बी०एन०एस०डी० कालेज कानपुर से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। 1951 में आगरा विश्व विद्यालय से सम्बद्ध एस0डी0 कालेज कानपुर से स्नातक परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1951 से जून 1953 तक कन्हैयालाल रामशरण रस्तोगी इण्टरमीडिएट कालेज, फर्रुखाबाद में अध्यापन कार्य किया। रस्तोगी इण्टर कालेज में अवस्थी जी को श्री सुरेश चन्द्र शुक्ल से बड़े भाई का स्नेह मिला। शुक्ल जी के अतिरिक्त अन्य सहयोगियों में श्री आत्मानन्द श्रीवास्तव एवं श्री मनोहर सिंह चॉहान प्रमुख थे। विकासमान व्यक्तित्व में स्थिरता कहाँ? अतः अवस्थी जी ने अध्यापन कार्य छोड़कर 1954 में इलाहाबाद विश्व विद्यालय से पहले अंग्रेजी से एम0ए0 प्रथम वर्ष किया’ किन्तु हिन्दी प्रेम के कारण अंग्रेजी छोड़कर 1956 में हिन्दी से प्रथम श्रेणी और विश्व विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपने गन्तव्य की प्रथम मंजिल प्राप्त की। 1958 में डी0फिल्0 की उपाधि प्राप्त कर इलाहाबाद विश्व विद्यालय में ही प्राध्यापक नियुक्त हुए। अध्यापन कार्य करते हुए 1974 में डी0लिट्0 की उपाधि हासिल की। प्रवक्ता, रीडर एवं प्रोफेसर के पदों पर कार्य करते हुए 1989 में अवकाश प्राप्त किया। डॉ अवस्थी के व्यक्तित्व का यदि विश्लेषण किया जाय, तो कहा जा सकता है कि उनके पास न तो चन्द्रोन्नत ललाट है न केशरी वक्षस्थल और न ही वे आजानुबाहु हैं। उन्होंने सौन्दर्य की प्रतिस्पद्र्धा में कामदेव को विजित भी नहीं किया है। वे एक साधारण और सामान्य से दिखने वाले इंसान हैं। उनका शरीर लम्बा, छरहरा और क्षीण है। उनकी आँखों में ताकने (लीन होने) और निहारने (संधान अनुसंधान) की वृत्ति, हाथ में कर्म की कलम, मस्तिष्क में लोकहित का चिंतन, मन में ईश्वर का ध्यान एवं असाधारण संतोषवृत्ति तथा हृदय में असीम सहृदयता, भावुकता, संवेदना और परदुःख कातरता का भाव है। वे एक तीव्र प्रज्ञा, नीर-क्षीर-विवेकी, गम्भीर प्रकृति और अन्तर्मुखी व्यक्तित्व के ध्ाारक हैं।

काव्य साहित्य[संपादित करें]

1. महारथी- इस ग्रंथ में कर्ण कथा वर्णित है। मई 1946 में इसके 18 छन्द ‘सुकवि’ मासिक पत्रिका में ‘कर्ण-वध’ नाम से प्रकाशित हुए थे। बाद में इस कथा को विस्तृत कर ‘महारथी’ का रूप दिया गया। 1947 में यह ग्रंथ पूर्ण हुआ और 1948 में पं0 श्रीनारायण चतुर्वेदी जी को समर्पित कर दिया गया। प्रकाशन 1953 में इण्डियन प्रेस इलाहाबाद से हुआ।

2. बाल कविता- इसमें पाँच रचनाएँ हैं- गाँध्ाी जी के बाल मुकुन्द, संयम राय, मुनि और मूषक, परिश्रम का फल और एकलव्य। इसका प्रकाशन इण्डियन प्रेस इलाहाबाद से सन् 1954 में हुआ।

3. देखभाल कर चलो- इस काव्य पुस्तिका में पर्व में ऋतु सम्बंध्ाी गीत हैं। इसके अध्ािकांश गीत इलाहाबाद से निकलने वाले मासिक ‘बाल सखा’ में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। पुस्तकाकार में इसका प्रकाशन सरोज प्रकाशन इलाहाबाद से 1959 में हुआ। रचनाएँ बाल-व्यक्तित्व निर्माणोपयोगी हैं-

इस महान राष्ट्र को सवाँरते हुए
लोक की कुरीतियाँ सुधारते हुए
नवीन सूर्य विश्व में निकालकर चलो
चलो, परन्तु यह देखभाल कर चलो !

4. अभिशप्त महारथी- इस खण्डकाव्य में ‘महारथी’ के कुछ छन्द समाहित हैं, लेकिन यह ‘महारथी’ से भिन्न प्रकार की रचना है। ‘महारथी’ इतिवृत्मक है; किन्तु इसमें देश की वर्तमान समस्याओं की चिन्ता है। खासकर दलित चेतना को अभिव्यक्ति देने वाला यह प्रथम खण्ड काव्य है, जो सोहनलाल द्विवेदी द्वारा प्रशंसित एवं डाॅ0 राममूर्ति त्रिपाठी द्वारा उत्कृष्ट घोषित है। राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी का विचार है- “चरित्र निर्माण करने वाले खण्ड-काव्यों का आज नितान्त अभाव है। ऐसी स्थिति में युगानुरूप प्रेरणा प्रदान करने वाला यह चरित्र काव्य इसकी सुचारु पूर्ति करेगा।” यह काव्य जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर, कानपुर विश्वविद्यालय कानपुर व डाॅ0 राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय फैजाबाद के पाठ्यक्रम में सम्मिलित रहा है। यह सरस्वती प्रेस इलाहाबाद से 1975 में प्रकाशित हुआ।

5. अग्नि गंधा- यह ग्रंथ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं- सरस्वती, विशाल, वीणा, साहित्यकार, मध्यप्रदेश संदेश एवं नई ध्ाारा आदिमें प्रकाशित गीतों तथा अनुगीतों का संग्रह है। 72 पृष्ठों की इस पुस्तिका का प्रकाशन साहित्य संगम, इलाहाबाद से 1982 में हुआ।

6. चाबीदार खिलौने- इस पुस्तक के अधिकांश छन्द ‘बाल सखा’ में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। कवि ने इस बाल काव्य गं्रथ में सहज, सरल और प्रभविष्णु भाषा का प्रयोग किया है। प्रकाशन साहित्य संगम, इलाहाबाद से 1984 में हुआ।

7. एक हमारा देश- इसमें एक हमारा देश, वीर आर्यों की हम संतान, तुम वीर बनो बलवान बनो, नव वर्ष, होली ने सारा रंग बदला आदि 13 गीत हैं। प्रकाशन साहित्य संगम इलाहाबाद से 1985 में हुआ।

8. हुआ उजाला- अरविन्द प्रकाशन आगरा से 1993 में प्रकाशित इस ग्रंथ में बालगीत संग्रहीत हैं।

9. हलचल के पंख- इस संग्रह में 1963 से 1984 तक के रचित कुल 118 अनुगीत हैं। अनुगीत विध्ाा को हिन्दी साहित्य में प्रस्थापित करने वाला यह प्रथम काव्य ग्रंथ है। रचनाकार ने भूमिका में अनुगीत की अवध्ाारणा को स्पष्ट करते हुए जीवन की विविध्ा अनुभूतियों को अनुगीतों के माध्यम से ध्वनित किया है। इस कृति को पढ़कर प्रसिद्ध आलोचक प्रो॰ रामविलास शर्मा ने अपनी मंगल कामना प्रेषित की- “कवि रूप में आपकी ख्याति ओर उन्नति के लिए मेरी मंगल कामना है।” (21-9-1995 के लिखित पत्र से) प्रकाशन इलाहाबाद से 1995 में हुआ।

गद्य साहित्य[संपादित करें]

1. हिन्दी साहित्य का अद्यतन इतिहास-यह इतिहास ग्रंथ डाॅ0 अवस्थी की मौलिक प्रतिभा का परिचय देता है। डाॅ0 अवस्थी ने आचार्य शुक्ल के नामकरण और काल विभाजन की तर्क सम्मत समीक्षा करते हुए हिन्दी साहित्य के इतिहास का जो विभाजन एवं नामकरण किया है, वह अति वैज्ञानिक एवं औचित्यपूर्ण है। यह ग्रंथ उच्च शिक्षा के शिक्षार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है। प्रकाशन- सरस्वती प्रेस इलाहाबाद से 1970 में हुआ।

2. आधुनिक हिन्दी काव्य-शिल्प- इस शोध-प्रबंध में 1900-1940 तक की कविता का शिल्पगत विवेचन है। मुख्य विशेषता यह है कि इसमें प्रकाशित पुस्तकों से अध्ािक उन रचनाओं को आध्ाार बनाया गया जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपी हैं। प्रकाशन- हिन्दी परिषद् प्रकाशन इलाहाबाद से 1962 में हुआ।

3. निराला और ‘तुलसीदास’ काव्य- इस ग्रंथ में सर्वप्रथम निराला के तुलसीदास काव्य की विद्वतापूर्ण व्याख्या की गई है। जिसकी प्रशंसा डाॅ0 रामविलास शर्मा ने भी की है। यह ग्रंथ सरोज प्रकाशन इलाहाबाद से 1964 में प्रकाशित हुआ।

4. हिन्दी रीति कविता और समकालीन उर्दू काव्य-1943 से 1850 तक के हिन्दी-उर्दू काव्य का शैल्पिक एवं सांस्कृतिक-तुलनात्मक और तलस्पर्शी विवेचन है। इस गं्रथ की पं0 विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डाॅ0 रसाल एवं डाॅ0 नगेन्द्र ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। डाॅ0 रामशंकर शुक्ल रसाल का विचार है- “डाॅ0 अवस्थी का यह ग्रंथ नितान्त मौलिक एवं अनूठा है। ऐसा काम अभी तक हिन्दी या उर्दू भाषा में नहीं हुआ।” और आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जी ने तो यहाँ तक कहा- “डाॅ0 मोहन अवस्थी के इस कृतित्व में जैसा श्रम है और अर्थों की परतें जिस सूक्ष्मता से उद्घटित हुई हैं वैसी महनीय शोध्ा साध्ाना वाला रीति ध्ाारा पर प्रबंध्ा पहले कोई नहीं दिखा।” प्रकाशन- सरस्वती प्रेस इलाहाबाद से 1978 में हुआ।

5. समीक्षण और परीक्षण- इस ग्रंथ में केशव के प्रति समालोचकों का एकांगी दृष्टिकोण, बेकन और पं0 रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त का काव्य शिल्प, कुरुक्षेत्र, उर्वशी आदि 9 समीक्षक निबंध संग्रहित हैं। ये सभी निबंध्ा लेखक के मौलिक चिन्तन के द्योतक हैं। प्रकाशन साहित्य संगम इलाहाबाद से 1985 में हुआ।

6. देश के गौरव (भाग 1, भाग 2)-इन दोनों खण्डों में देश के महापुरुषों- नानक, गाँधी आदि का जीवन चरित्र वर्णित है। प्रकाशन सरस्वती प्रेस इलाहाबाद से 1980 में हुआ।

सम्पादित साहित्य[संपादित करें]

1. हिन्दी निबंध की विभिन्न शैलियाँ-राजा शिव प्रसाद सितारे हिन्द से लेकर पं0 विद्यानिवास मिश्र तक के सभी निबंधकारों के विभिन्न शैलियों के निबंध्ा संग्रहीत हैं। प्रकाशन सरस्वती प्रेस इलाहाबाद से 1969 में हुआ।

2. श्रेष्ठ हिन्दी एकांकी-इस संग्रह में डॉ॰ रामकुमार वर्मा आदि के श्रेष्ठ एकांकियों का संग्रह है। प्रकाशन सरस्वती प्रेस इलाहाबाद से 1970 में हुआ।

3. उर्दू काव्य संग्रह-इस संग्रह में बली, सौदा, मीर, मीर हसन, नज़ीर अकबरावादी, जौक, गालिब, अनीस और हाली आदि 12 उर्दू कवियों की गज़लों व अन्य कवियों की कविताओं का संग्रह है। प्रकाशन नारायण पब्लिसिंग हाउस इलाहाबाद से 1969 में हुआ।

4. सूर संग्रह- इसमें सूरदास के 151 पद संग्रहीत हैं। इस सम्पादन में कथाक्रम को ध्यान में रखा गया है। इस प्रकार इसमें सूरसागर की पूरी कथा क्रमबद्ध एवं संक्षिप्त रूप में मिलती है। प्रकाशन हिन्दी परिषद् प्रकाशन इलाहाबाद से 1972 में हुआ।

5. सूरसागर सार संग्रह- इस संपादन में डॉ॰ धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार संग्रह’ की विद्वतापूर्ण व्याख्या है। प्रकाशन ज्ञान भारती इलाहाबाद 1972।

6. निबंध संग्रह - इस संग्रह की भूमिका में निबंध के उद्भव और विकास का तथ्यपूर्ण विवेचन हुआ है और इसमें भी विविध्ा प्रकार के निबंध संग्रहीत हैं। प्रकाशन- हिन्दी परिषद् प्रकाशन इलाहाबाद से 1980। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि डॉ॰ अवस्थी उत्कृष्ट कोटि के कवि, समीक्षक और संपादक हैं। डॉ॰ अवस्थी का कार्य-क्षेत्र बड़ा व्यापक है। वे आकाशवाणी इलाहाबाद की क्षेत्रीय परामर्श दात्री समिति के सदस्य, आकाशवाणी की चयन समितियों के विशेषज्ञ सदस्य, केन्द्रीय विद्यालयों की चयन समितियों के विशेषज्ञ सदस्य, अनेक विश्व विद्यालयों की चयन समितियों के राज्यपाल द्वारा नामित विशेषज्ञ सदस्य तथा जीवाजी विश्व विद्यालय ग्वालियर, बुन्देलखण्ड विश्व विद्यालय झाँसी, कुमाऊँ विश्व विद्यालय नैनीताल, अवध विश्व विद्यालय फैजाबाद, विश्व भारती विश्व विद्यालय शान्ति निकेतन की हिन्दी पाठ्यक्रम निर्धारण समितियों एवं शोध-समितियों के सदस्य रहे हैं।

सम्मान एवं उपाधियाँ[संपादित करें]

1. ‘अभिषेक श्री’ संस्था द्वारा- अभिषेक श्री सम्मान 1993.

2. ‘उदीयमान’ संस्था द्वारा- उदीयमान सम्मान 1995.

3. प्रयाग सांस्कृतिक मंच द्वारा- अभिनन्दन 1995.

4. अक्षयवट संस्था, इलाहाबाद द्वारा- अक्षय वट सम्मान 1969.

5. उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा- बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ सम्मान 1996.

6. उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा- साहित्य भूषण सम्मान 1998.

7. नगर पालिका इलाहाबाद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में गुजरात के राज्यपाल महामहिम श्री अंशुमान सिंह द्वारा ‘तुलसी सम्मान’ 1998.

8. ‘साहित्यकार संसद’ प्रयाग द्वारा अभिनन्दन 1998.

9. ‘शलभ’ संस्था इलाहाबाद द्वारा अभिनन्दन 1998.

10. पारिजात संस्था इलाहाबाद द्वारा अभिनन्दन 1998.

11. सहयोगी मुद्रणालय प्रकाशन संस्था इलाहाबाद द्वारा अभिनन्दन 1998.

12. प्रकाशिनी हिन्दी निध्ाि कन्नौज द्वारा अभिनन्दन 1998.

13. अखिल भारतीय हिन्दी सेवी संस्थान इलाहाबाद द्वारा ‘साहित्य महारथी’ उपाध्ाि 1972.

14. हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा ‘साहित्य सारस्वत’ उपाध्ाि’ 1994.

15. हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा ‘विद्या वाचस्पति’ उपाध्ाि’ 1996.

16. अरुणिमा संस्था प्रयाग द्वारा ‘साहित्य सुध्ााकर’ उपाध्ाि 1996.

17. निराला साहित्य संस्थान इलाहाबाद द्वारा ‘सारस्वत’ उपाध्ाि 1997.

18. अमेरिकन बायोग्राफिकल द्वारा ‘मैन आॅफ द ईयर’ सम्मान 1996.

डाॅ0 अवस्थी का कृतित्व बहुआयामी है, किन्तु उनकी प्रतिभा का प्रकाशन और प्रसिद्धि मुख्य रूप से काव्य साहित्य के कारण हुई है। अतः उनकी कविता की संक्षिप्त चर्चा करना अपेक्षित है। उनके काव्य साहित्य को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

1. गीत-अनुगीत

2. प्रबंध्ा काव्य एवं लम्बी रचनाएँ

3. व्यंग्य रचनाएँ

4. बाल कविताएँ

डाॅ0 मोहन अवस्थी ने गीतों की रचना तब से प्रारम्भ कर दी थी, जब वे हाई स्कूल के विद्यार्थी थे। 1950 से ही ‘सरस्वती’ जैसी पत्रिकाओं में उनकी कविताओं का प्रकाशन होने लगा था। डाॅ0 अवस्थी के गीतों का ‘शीर्षक’ इंसान ही है- पापी के भीतर भी है यदि पुण्य निहित, तो यह भी मेरी कविता का अभियान बनेगा। रहे भूमि पर या कि स्वर्ग में मेरी कविता मेरी कविता का शीर्षक इंसान बनेगा। (सरस्वती, फरवरी 1955)

डाॅ0 मोहन अवस्थी के गीत मानव जीवन की समस्त संवेदना, पीड़ा एवं दर्शन को समेटे हुए हैं- बात मुझसे करो तुम न उस मौत की शक्ल जिसने अभी तक दिखाई नहीं हर्ष में, शोक में, राग मे, द्वेष में आदमी के कभी काम आयी नहीं। (वीणा, 1956)

‘अनुगीत’ विध्ाा के तो डाॅ0 अवस्थी प्रवर्तक ही हैं। उन्होंने 29 अप्रैल 1973 को दैनिक ‘देशदूत’ इलाहाबाद में प्रकाशित एक अनुगीत के द्वारा इस विध्ाा का प्रवर्तन किया, जिसे ‘ध्ार्मयुग’ (18 मई 1995) में छपे अनुगीत से एक ध्ाारा के रूप में प्रतिष्ठा मिली। उनका अनुगीत संग्रह ‘हलचल के पंख’ इस समय साहित्यकारों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। उनके अनुगीत जीवन की विविध्ाता को रूपायित करते हैं। मानव दुःख से हताश होकर निराशा और कुण्ठा का शिकार हो जाता है, पर अवस्थी जी का विचार है कि दुःख जीवन का मसाला है, स्वाद है, मानवता का आध्ाार है- दीर्घ सन्नाटा मसानी शान्ति होती बस उदासी का तिमिर रहता घना दुःख न होता कौन किससे बात करता दुःख जीवन का मसाला कर दिया।

डाॅ0 अवस्थी का खण्ड-काव्य ‘अभिशप्त महारथी’ और लम्बी कविताएँ- अपना खोया गान, बढ़ा आज विज्ञान, मत आज स्वर्ग के गीत सुनाओ मुझको आदि अत्यध्ािक प्रसिद्ध हैं। उनकी व्यंग्य रचनाएँ- मेहमान का मारा, इण्टरव्यू, बाढ़, भगवान मकान पाश से मुझको बचाइये, कचहरी में मेरी पुकार हो रही है, आपात काल के बीच और कवि सम्मेलन का कवि आदि प्रमुख हैं। उनकी व्यंग्य रचनाओं में समाज और जीवन का सच उतरा है- घुसा जब कचहरी में कंकड़़ ने टेरा, रखो एक रुपया यहाँ, हक है मेरा। बराण्डों ने, कमरों ने, आ-आ के घेरा, मुझे हक दो मेरा, मुझे हक दो मेरा। लुटे आठ-दस-बीस रुपये उधर ही, जिधर होके मेरा लगा एक फेरा।। मरण हेतु मच्छर मसहरी में आता, शलभ ज्वाल माला सुनहरी में आता। नदी बीच गज धार गहरी में आता, औ गीदड़ है जलवायु शहरी में आता। मगर आदमी की जो शामत है आती, तो वो दौड़कर है कचहरी में आता।। -(सुकवि विनोद, मार्च 1975)

हिन्दी बाल साहित्य को समीक्षकों और विद्वानों ने उतना महत्व नहीं दिया, जितना कि अपेक्षित है। बाल साहित्य की रचना प्रौढ़ रचनाकार ही कर सकता है। डाॅ0 मोहन अवस्थी ने अनेक बालगीतों की रचना की है और उनके कई काव्य संग्रह प्रकाशित भी हो चुके हैं। डाॅ0 अवस्थी ‘कला कला के लिए’ नहीं अपितु ‘कला जीवन के लिए’ के हिमायती हैं। उन्होंने पर्याप्त बालोपयोगी साहित्य लिखा है। ‘चाबीदार खिलौने’ गीत में उन्होंने बतलाया है कि संसार के सभी जीव उस परम सŸाा के चाबीदार खिलौने हैं- हाथी घोड़ा ऊँट आदमी चिड़ियाँ या मृगछौने, सभी जीव हैं, उस ईश्वर के चाबीदार खिलौने। चन्दा सूरज खेत सुनहरे उसके दो गुब्बारे हैं, परमेश्वर के खेल निराले कितने प्यारे-प्यारे हैं।

डाॅ0 अवस्थी प्रगतिवाद के बाद के श्रेष्ठ रचनाकारों में से एक हैं। वे सभी प्रकार की साहित्यिक गुटबन्दियों, वादों एवं नारों से विरत रहकर और नयी कविता के समकालीन विभिन्न वादों की मैथुनी कविताओं से अप्रभावित रहकर उन्होंने अपने को पूरी निष्ठा और आस्था के साथ कविता को समर्पित कर दिया है। उनकी कविता का एक ही साध्य है कि आदमी पारा-पारा (टुकड़े-टुकड़े) न हो-

देह मति प्राण मन चेतना तत्क्रिया भावना युक्त कौशल कला रूप इसका समन्वित बना आदमी याद रखो कि वह पारा-पारा न हो।

   -(हलचल के पंख)

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. सिंह, डॉ॰राजकुमार (जनवरी २००७). विचार विमर्श. मथुरा (उत्तर प्रदेश)- २८१००१: सारंग प्रकाशन, सारंग विहार, रिफायनरी नगर. पृ॰ १२४. |access-date= दिए जाने पर |url= भी दिया होना चाहिए (मदद)