टी टॉरी स्टार
टी टॉरी तारे (अंग्रेज़ी: T Tauri star), जिन्हें संक्षेप में TTS भी कहा जाता है, खगोल विज्ञान में अत्यधिक युवा और कम द्रव्यमान वाले 'पूर्व-मुख्य अनुक्रम' तारों का एक वर्ग है। इन तारों की आयु आमतौर पर 1 करोड़ (10 मिलियन) वर्ष से कम होती है। इनका द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान से लगभग 3 गुना तक हो सकता है। ये तारे 'मुख्य अनुक्रम' में प्रवेश करने से ठीक पहले के विकास चरण का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसका अर्थ है कि इनके कोर में अभी तक हाइड्रोजन का स्थिर 'नाभिकीय संलयन' शुरू नहीं हुआ है। इस वर्ग का नाम इसके प्रोटोटाइप तारे टी टॉरी के नाम पर रखा गया है, जो वृष तारामंडल में स्थित है और जिसे 1852 में ब्रिटिश खगोलशास्त्री जॉन रसेल हिंड द्वारा खोजा गया था।[1][2]
टी टॉरी तारे अपने प्रौढ़ समकक्षों (जैसे हमारे वर्तमान सूर्य) से कई भौतिक मायनों में बिल्कुल अलग होते हैं:
- ऊर्जा का स्रोत: चूँकि इन तारों के केंद्र में नाभिकीय संलयन के लिए आवश्यक तापमान (लगभग 1 करोड़ केल्विन) और दबाव अभी तक नहीं पहुँचा है, इसलिए इनकी ऊर्जा का मुख्य स्रोत गुरुत्वाकर्षण संकुचन है। जैसे-जैसे तारा गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ता है, उसकी स्थितिज ऊर्जा ऊष्मा और प्रकाश में बदल जाती है।[3]
- लिथियम की प्रचुरता: टी टॉरी तारों की सबसे बड़ी रासायनिक पहचान उनके स्पेक्ट्रम में भारी मात्रा में लिथियम का पाया जाना है। मुख्य अनुक्रम के तारों में (जैसे सूर्य), लिथियम लगभग 25 लाख केल्विन तापमान पर आसानी से नष्ट हो जाता है। इसलिए, किसी तारे में लिथियम की उच्च मात्रा इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि तारा अभी बहुत युवा है और इसके कोर का तापमान उस विनाशकारी सीमा तक नहीं पहुँचा है।[4]
- तारकीय पवन और चुंबकीय गतिविधि: ये तारे अत्यधिक सक्रिय होते हैं। इनका घूर्णन बहुत तेज़ होता है, जो अत्यंत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है। इस कारण से, टी टॉरी तारों में बड़े पैमाने पर 'सनस्पॉट', तीव्र एक्स-रे उत्सर्जन, और भयंकर 'तारकीय पवनें' देखी जाती हैं।
ग्रहीय निर्माण और प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क
[संपादित करें]टी टॉरी तारों का अध्ययन खगोलविदों के लिए इसलिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि ये ग्रह निर्माण के मुख्य स्थल हैं।
लगभग सभी 'शास्त्रीय' टी टॉरी तारे गैस और धूल की एक मोटी, चपटी डिस्क से घिरे होते हैं, जिसे प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क कहा जाता है। यह डिस्क उसी 'आणविक बादल' का बचा हुआ हिस्सा है जिससे तारे का निर्माण हुआ था। लाखों वर्षों के दौरान, इस डिस्क के भीतर धूल के छोटे कण आपस में टकराकर और चिपककर बड़े पिंड बनाते हैं, जो अंततः क्षुद्रग्रहों, धूमकेतुओं और ग्रहों में बदल जाते हैं। खगोलविदों का मानना है कि लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व, हमारा सूर्य भी एक टी टॉरी तारा ही था, और हमारी पृथ्वी का निर्माण भी इसी प्रकार की एक डिस्क के भीतर हुआ था।[5]
अवलोकन के आधार पर टी टॉरी तारों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बाँटा जाता है:
- क्लासिकल टी टॉरी तारे: ये सक्रिय रूप से अपनी आस-पास की प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क से पदार्थ खींच रहे हैं, जिसके कारण इनके स्पेक्ट्रम में मजबूत 'उत्सर्जन रेखाएँ' दिखाई देती हैं।
- कमजोर-रेखा वाले टी टॉरी तारे: इन तारों ने अपनी गैस और धूल की डिस्क को पूरी तरह से उड़ा दिया है या ग्रहों के निर्माण में सोख लिया है, इसलिए इनमें उत्सर्जन रेखाएँ बहुत कमजोर होती हैं।[6][7]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Appenzeller, Immo (1998). Star Formation and Stellar Evolution. Springer. pp. 45–52. ISBN 978-3540643111.
- ↑ "T Tauri Variable Stars"
- ↑ Stahler, Steven W. (1983). "The Evolution of Pre-Main-Sequence Stars". The Astrophysical Journal. 274: 822–829. डीओआई:10.1086/161495.
- ↑ Bodenheimer, Peter (1965). "Stellar Evolution Toward the Main Sequence". Annual Review of Astronomy and Astrophysics. 3: 141–170.
- ↑ An empirical criterion to classify T Tauri stars and substellar analogs using low-resolution optical spectroscopy
- ↑ Feigelson, Eric D.; Montmerle, Thierry (1999). "High-Energy Emission from Young Stellar Objects". Annual Review of Astronomy and Astrophysics. 37: 363–408.
- ↑ "T Tauri Stars, Naked and Otherwise"