वार्ता:टमकोर ……. इतिहास के आईने से

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टमकोर उत्तर पूर्वी राजस्थान के झुंझुनू जिले के उत्तरी कोने पर बसा एक छोटा सा क़स्बा है जिसका इतिहास विविधताओं से भरा है | लगभग ४५० वर्ष पूर्व गाँव के पूर्वी छोर पर कस्बों का गाँव बसा हुआ था ,कस्बों का टमकोर के नाम से जाना जाता था |महला (जाट) परिवार जो कस्बों के रिश्ते में भांजे थे कुछ समय उपरान्त धीरे-धीरे इस गाँव में आकर बसने लगे | यहाँ पिने के लिए (जहाँ वर्तमान में जोह्ड़ा है के पास ) एक कुवा हुआ करता था ,(जिसके अवशेष अभी भी देखे जा सकते है ) पिने के पानी को लेकर एक बार दोनों (कस्बों और महलो )परिवारों के बीच तकरार हुआ ,और झगडे का रूप लेने से दोनों परिवारों में मन मुटाव हो जाने से आपस में दुश्मनी हो गई | कालांतर में किसी विशेष आयोजन पर क़स्बा परिवार को महला परिवार ने सामूहिक भोज पर बुलाया उस समय एक घटना में (घटना ही माना जाता है ,सचाई क्या थी ? प्रमाण नहीं मिलते ) जहाँ कस्वां परिवार एक बाड़े में खाना खा रहा था उसमे भयंकर आग लग गई और देखते ही देखते कस्वां परिवार के ज्यादातर सदस्य जलकर समाप्त हो गए ,बचे कुछ लोग थोड़े दिनों बाद कहीं और जा कर बस गए | आगे के इतिहास में टमकोर को दो भागों में विभक्त बताते है |उत्तरी भाग दुंद लोध ठिकाने से सम्बन्ध रखता था एवं दक्षिणी भाग बिसाऊ ठिकाने से |उत्तरी भाग में मुल्क्पुरिया (शेखावत-राजपूत)परिवार का वर्चस्व था |दक्षिणी भाग में सबसे पहले गिडिया (ओसवाल )परिवार आकर बसा था ,एवं कालांतर में अन्य परिवार पडिहार राजपूत, ब्राह्मण ,गुज़र,गौड़,एवं नाइ परिव्वर भी दक्षिणी भाग में आकर बस गए |

समय परिवर्तन के साथ दोनों भाग बिसाऊ ठिकाने के अंतर्गत आ गए इसके पीछे भी एक घटना का होना माना जाता है ......बिसाऊ के ठाकुर घोड़े पर गाँव से जा रहे थे ,उसी समय कुछ महिलाएं सिर पर पानीं के घड़े लिए पानी भरने जा रही थी |महिलाओं को असुविधा न हो (उस ज़माने में पर्दा प्रथा का ज्यादा प्रचालन हुआ करता था )ठाकुर एक तरफ जा कर छिप गए,महिलाओं के गुजर जाने के बाद ठाकुर बहार निकले पर उनकी अचकन बाड़ में अटक कर फट गयी थी ,गाँव आकर मुल्क्पुरिया परिवार को कहा की रास्ते जरा चौड़े रखे ताकि किसी राहगीर को असुविधा न हो,इस मुल्पुरिया परिवार ने कुछ इस तरह से कहा की ठाकुर को बात लग गई (कहा की आप अपने क्षेत्र की चिंता करे ,हमें क्या और कैसे करना है हमें अछि तरह मालूम है ) इस बात की बिसाऊ ठिकाने को खबर लगने पर दुन्द्लोद ठिकाने में सन्देश भिजवाया की आप चाहें तो टमकोर का हमारा हिस्सा ले लें या आप अपना हिस्सा हमें दे दें ,दोनों ठिकानो की परस्पर रिश्तेदारी थी ,अतः टमकोर को पूर्णतया बिसाऊ ठिकाने के आधीन कर दिया |इस निर्णय से मुल्परिया परिवार रुष्ट हो कर पास के धेतरवाल गाँव चला गया ,वहां कठिनाई के कारण वापस टमकोर में ही आकर बस गए| उस समय टमकोर जयपुर रियासत में आता था ,परन्तु सीमाएं बीकानेर रियासत से घिरी हुई थी ,जगात आदि के लिए यहीं पर व्यवस्था थी |राज कर्मचारी अनाज की अछि मंडी होने की वजह से अक्सर आते जाते रहते थे | मंडी के कारन लोगो का ऊँटो पर बहुतायत से आना होता था |जयपुर रियासत के लिए सुरक्ष्या की नजर में टमकोर का काफी महत्व था

गाँव में व्यापर की अछि संभावनाएं थी जिससे आगे चलकर महाजन परिवार भी आकर बसने लगे ,महाजनों में चोरडिया परिवार ज्यादा थे ,पर सबसे पहले महाजनों में गिडिया परिवार आकर बसा था ,लगभग २०० वर्षो पूर्व दुलीचंद जी चोरडिया (वंशावली -टमकोर ) बहल (वर्तमान में हरियाणा ) से आकर बस गए उसके साथ कालांतर में उनके भाई आदि सभी यहाँ आकर बस गए |ठाकुरों का राज-पाट का काम सँभालने के लिए यहाँ एक गढ़ का निर्माण किया गया ,पिने के पानी के लिए कुंडो(जमीन में वर्षात के पानी को एकत्रित करने के लिए पक्के टेंक )पर निर्भरता थी व् अभी भी वोही स्थिति है ,भुगार्विय जल नमकीन व् खारा होने से वर्षात पर खेती एवं पिने के पानी के लिए पूर्ण तया निर्भरता थी | अनुकूल वारिश नहीं होने पर जमीनी पानी पीना पड़ता एवं अनेको बिमारियों का खतरा हो जाता था ,इन सभी के मध्य नजर उस समय के ठाकुर जवाहर सिहं ने लोगों की शोच जाने की जगह को पानी की समस्या से निजात पाने के लिए एक पक्के जोहड़े का निर्माण के लिए सन १७१७ में चुना ,और लोगो की कुछ समस्या कम हुई |इस प्रकार गढ़ (किले ) का निर्माण जोहड़े के निर्माण (१७१७ )से पहले हुआ था ,दोनों निर्माण आज भी उसी (लगभग)स्थिति में देखे जा सकते है | कालांतर में टमकोर के क्षेत्र का कुछ हिसा लेकर ठाकुर जवाहर सिंह ने जवाहरपुरा गाँव अलग से बसाया ,टमकोर के अधीन अठारह हजार बीघा जमीन थी ,उसमे से छः हजार बीघा जमीन पर जवाहरपुरा बसाया गया | गाँव की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए किलेदार होते थे,सहायक के तौर पर गाँव के प्रमुख व्यक्ति को पटवारी बनाया जाता था ,पटवारी के रूप में गिडिया परिवार एवं चोरडिया परिवार ने काफी समय तक अपनी सेवाएँ दी ,तत्पश्च्यात श्री रावतमल जी अगरवाल को पटवारी का दायित्व सोंपा गया,वो देश की स्वतंत्रता के बाद प्रथम सरपंच चुने गए ,लेकिन उनके नाम के साथ पटवारी जीवन भर जुदा रहा वो पटवारी जी के नाम से ही जाने जाते रहे | विक्रम संवत १७१७ से पिने के पानी का स्रोत जवाहर सागर जोह्ड़ा रहा जो वर्तमान में भी लगभग पूर्व हालत में है पर पानी का उपयोग पिने के आलावा अन्य उपयोग में लिया जारहा है ,कारण गाँव के लोगों ने कुंडो का निर्माण करना प्रारंभ कर दिया था ,वर्तमान में शायद राजस्थान प्रदेश में सबसे अधिक कुंडो की संख्या इसी क्षेत्र में (टमकोर के आस पास ) होंगे | गाँव की आबादी लगभग ८००० की है,उसमे परिवारों के हिस्साब से ओसवाल और अगरवाल परिवार बहुतायत से है,ओसवाल में सभी परिवार तेरापंथ संप्रदाय के है,टमकोर को मंदिरों का गाँव कहा जाता है ,यहाँ प्राय सभी देवी देवताओं के मंदिर भव्य रूप से बनवाये गए है ,मस्जिद,आर्य समाज,ओसवाल भवन,आदि सभी धर्मो के लोग भाईचारे के साथ निवास कर रहे है | आध्यात्मक द्रष्टि से टमकोर का अग्रणीय स्थान है -इस धरा से २७ भाई -बहन तेरापंथ जैन धर्म संघ में दीक्षित हुए है ,जिनमे धर्म संघ के दशम आचार्य आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की आज विश्व के उच्च कोटि के दार्शनिको में गिनती होती है | टमकोर में धार्मिक द्रष्टि से सनातन धर्मावलम्बियों का बाहुल्य है,जहाँ आर्य समाज का अच्छा प्रभाव है वहीँ तेरापंथ जैन समुदाय ने विश्व को आचार्य महाप्रज्ञ जैसे महान संत ,महान दार्शनिक देने का गौरव हासिल है |यहाँ सभी धर्मावलम्बियों में परस्पर सौहार्द के वातावरण से विवधता में एकता का परिचय मिलता है जो एक मिशाल है | अजित चोरडिया (वार्ता) 08:19, 26 अक्टूबर 2011 (UTC) अजित चोरडिया (वार्ता) 13:37, 25 अक्टूबर 2011 (UTC)

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