झँवर

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। नगर का नाम   = झँवर
| प्रकार       = गाँव
| latd = 25.39 
| longd= 59.95 
| state_name   =राजस्थान
| जिला      = जोधपुर
| जनगणना का वर्ष = 2021
| जनसंख्या   = 10,000
| भाषा  =मारवाड़ी,हिन्दी
| पिनकोड    = 342014

'झँवर'लूणी तहसील का सबसे बड़ा गाँव है। इस गाँव की जनसंख्या लगभग 10,000 के निकट है। यह गाँव जोधपुर शहर से 25 किलोमीटर दुर है।

इस गांव में एक पुलिस थाना है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया व यूको बैंक हैं। झंवर में उपतहसील स्तिथ है। झंवर लूनी तहसील का सबसे बड़ा गांव है। झंवर एक आदर्श गांव की श्रेणी में आता है। जाट कालीराणा जाती द्वारा इसे बसाया गया था।

झंवर गाँव जोधपुर जिले की लूनी तहसील में जोधपुर-बाड़मेर मार्ग पर जोधपुर से 25 कि.मी. दूरी पर स्थित है.  ठाकुर देशराज ने 'मारवाड़ का जाट इतिहास' में लिखा है कि झंवर गाँव कालीराणा/ कालिरामणा गोत्र के जाटों ने बसाया था. गाँव के पश्चिम दिशा में एक कुआं है जिस पर संवत 1810 का लेख है और ब्रह्मा, विष्णु और महेश एवं गणेश कि मूर्तियाँ हैं. यह गाँव 800 वर्ष पहले का बसाया हुआ है.

इसको बसाने वाले मालजी नाम के कलीराणा चौधरी थे. कालीराना गोत्र का निकास गढ़ गजनी से है. फिर ये लोग दर्रा बोलन होते हुए, पंजाब होते हुए पाकपत्तन शहर के नजदीक से आकर हिसार के पास सीसवाड़ में आकर बस गए. यहाँ से चल कर ये मारवाड़ आगये.

यह गाँव दूदोजी के पुत्र मालजी ने बसाया था. मालजी के वंश में रामोजी, भींवराज जी, पाथोजी, जीवनजी, खेतोजी, सेवजी, पुरखोजी, भैरजी, हरजी, मालजी, चतुरोजी हुए जो वर्तमान में जिन्दा हैं.

कालीराणा जाटों को महादेव जी का वरदान था कि जो न्याय बादशाह नहीं कर सकेगा, वो न्याय तुम करोगे. कालीराणा जिस पत्थर की शिला पर बैठ कर न्याय करते थे 'पद्म शिला' कहलाती थी जो आज भी गाँव में बने भव्य 'न्यायेश्वर महादेव' के मंदिर प्रांगण में पड़ी है. मंदिर के आगे एक खेजड़ी है.

गाँव वालों ने बताया कि यह वही चंवरे (खेजड़ी की डाली) वाली खेजड़ी है, जिसे गाँव बसाते वक्त रोपा गया था और जिसके आधार पर गाँव का नाम चंवर से झंवर पड़ा. इस खेजड़ी के नीचे बैठ कर चौधरी न्याय करते थे. काली राणा चौधरी जिस पत्थर की शीला पर बैठ कर न्याय करते थे वो पद्म शीला कहलाती थी

जो आज भी गाँव में बने महादेव मंदिर के प्रांगन में पड़ी है, वहां खेजड़ी वही है जो टहनी से लगी थी . इन चौधरियों में भींवराजजी का न्याय बड़ा प्रसिद्द था. इनके बारे में कहा जाता है:

दुर्गादास जी मान्या, रामाजी मन भावणा ।भीवराज न्याय मोटा करे, कर्ण मींड कालीराणा ।।

अर्थात-जोधपुर रियासत का राजा दुर्गादास इन्हें मानता है. ये रामाजी के पुत्र हैं. भींवराज एतिहासिक फैसले कर कालीराणा का नाम कर रहे हैं.

कहते हैं कि झंवर के चौधरियों को दिल्ली बादशाह ने ताम्र पत्र दिया था. आजादी से पूर्व रियासत क़ी तरफ से इन्हें प्रति वर्ष पाग (सफ़ा) बंधाई जाती थी. इसी वंश के एक पुरखोजी के बारे में कहा जाता था-

पुरखो पढ्यो पाटवी, गेण हुई गज बम्ब ।न्याय करे नव लाखो, जटियायत रो थम्ब ।।

अर्थात - पुरखो चौधरी अपने बाप का सबसे बड़ा पुत्र यानि पाटवी है . यह गजब का बुद्धिशाली है , जोकि नौ लखां (अनुपम) न्याय करता है . यह जाट समाज का स्तम्भ है .

झंवर गाँव के बसने के पीछे भी एक रोचक कहानी है. एक समय कालीराणा, सारण आदि जाटों का काफिला चारे-पानी की तलास में हरियाणा से मारवाड़ होते हुए सिंध की तरफ जा रहा था. इन्हें एक साधू ने चंवर (खेजड़ी की टहनी) दिया और कहा कि जहाँ रात्रि विश्राम करो, वहीँ यह रोप देना, जिस स्थान पर यह हरी हो जाये, वहीँ बस जाना.

जोधपुर से 25 कि.मी. पश्चिम में गाँव के स्थान पर कालीराणा जाटों का काफिला जहाँ रुका हुआ था वहां यह डाली हरी हो गयी. यहीं पर इन्होने बसने का निर्यण लिया. सारणों के काफिला उस समय तक काफी आगे निकल चूका था. इसी चंवर का अपभ्रंश होकर गाँव का नाम कालांतर में झंवर हो गया. कहते हैं कि वह खेजड़ी का पेड़ आज भी विद्यमान है.


सन्दर्भ[संपादित करें]