ज्वालामुखी राख
| टेफ्रा (ज्वालामुखी सामग्री) | |
|---|---|
|
ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान उत्पन्न प्राकृतिक सामग्री |


ज्वालामुखी राख चट्टानों के छोटे टुकड़ों, खनिज क्रिस्टलों और ज्वालामुखी काँच का एक बारीक मिश्रण है, जो ज्वालामुखी विस्फोटों के दौरान उत्पन्न होता है। इसके कणों का व्यास 2 मिलीमीटर (0.079 इंच) से कम होता है।[1] अक्सर "ज्वालामुखी राख" शब्द का प्रयोग अनौपचारिक रूप से सभी प्रकार के विस्फोटक उत्पादों (जिन्हें भूविज्ञान में 'टेफ्रा' या टेफ्रा कहा जाता है) के लिए भी किया जाता है, जिनमें 2 मिमी से बड़े कण भी शामिल होते हैं।
ज्वालामुखी राख का निर्माण मुख्य रूप से तब होता है जब मैग्मा में घुली हुई गैसें अचानक फैलती हैं और वायुमंडल में अत्यधिक दबाव के साथ हिंसक रूप से बाहर निकलती हैं। गैसों का यह प्रचंड बल मैग्मा को छोटे-छोटे टुकड़ों में विखंडित कर देता है। ये टुकड़े वायुमंडल में जाकर ज्वालामुखी चट्टान और काँच के कणों के रूप में ठोस हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, जब मैग्मा पानी (जैसे भूजल, झील या समुद्र) के संपर्क में आता है, तो पानी तुरंत भाप में बदल जाता है, जिससे मैग्मा का और भी तीव्र विखंडन होता है। हवा में पहुँचने के बाद, यह बारीक राख हवा के बहाव के साथ उद्गम स्थल से हजारों किलोमीटर दूर तक फैल सकती है।
अपने व्यापक फैलाव के कारण, ज्वालामुखी राख समाज और पर्यावरण पर कई तरह के प्रभाव डाल सकती है, जिनमें मानव और पशु स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, विमानन में बाधा, और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (जैसे- बिजली आपूर्ति प्रणाली, दूरसंचार और कृषि) को नुकसान शामिल है।
निर्माण
[संपादित करें]ज्वालामुखी राख का निर्माण मुख्यतः विस्फोटक ज्वालामुखी उद्गारों और मैग्मा के जल के साथ संपर्क के दौरान होता है। जैसे-जैसे मैग्मा पृथ्वी की सतह की ओर बढ़ता है, उसका दबाव कम होने लगता है। इससे मैग्मा में घुले हुए वाष्पशील पदार्थ (मुख्य रूप से पानी और कार्बन डाइऑक्साइड) गैस के बुलबुले बनाने लगते हैं। जब ये बुलबुले मैग्मा के आयतन का 70-80% हिस्सा घेर लेते हैं, तो वे एक-दूसरे से जुड़कर हिंसक रूप से फट जाते हैं और मैग्मा को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देते हैं। यही विखंडित पदार्थ वायुमंडल में जाकर ठंडे होते हैं और राख का रूप ले लेते हैं।
जल के साथ संपर्क के मामलों में (लीडेनफ्रॉस्ट प्रभाव के कारण), अत्यधिक गर्म मैग्मा और ठंडे पानी के बीच तेजी से ऊष्मा का स्थानांतरण होता है, जिससे भाप का भयानक विस्फोट होता है और राख के अत्यधिक बारीक कण उत्पन्न होते हैं।
गुण और विशेषताएँ
[संपादित करें]रासायनिक
[संपादित करें]ज्वालामुखी राख में मौजूद खनिज और तत्व सीधे उस मैग्मा की रासायनिक संरचना पर निर्भर करते हैं जिससे वे उत्पन्न हुए हैं। बेसाल्ट जैसे कम ऊर्जा वाले विस्फोटों से गहरे रंग की राख उत्पन्न होती है, जिसमें लगभग 45-55% सिलिका होता है और यह लोहे और मैग्नीशियम से भरपूर होती है। दूसरी ओर, रायोलाइट जैसे अत्यधिक विस्फोटक उद्गारों से हल्के रंग की राख बनती है, जिसमें सिलिका की मात्रा 69% से अधिक होती है।
ताजी राख की सतह पर अक्सर अम्लीय गैसों (जैसे सल्फर डाइऑक्साइड और हाइड्रोक्लोरिक एसिड) का लेप होता है। यह लेप पानी के संपर्क में आने पर संक्षारक और विद्युत का सुचालक हो सकता है, जिससे बिजली के तारों और उपकरणों को भारी नुकसान पहुँचता है।[2]
भौतिक
[संपादित करें]राख के कणों का घनत्व सामग्री के आधार पर भिन्न होता है (जैसे प्यूमिस के लिए 700-1200 kg/m³, और काँच के टुकड़ों के लिए 2350-2450 kg/m³ तक)। ये कण बहुत ही कठोर और नुकीले होते हैं (मोह्स कठोरता पैमाने पर इनकी कठोरता लगभग 5 होती है)। इसी नुकीलेपन के कारण यह राख अत्यधिक अपघर्षक होती है और मशीनों या उपकरणों को घिस सकती है।
मुख्य प्रभाव
[संपादित करें]मानव और पशु स्वास्थ्य
[संपादित करें]राख के बारीक कणों (10 माइक्रोमीटर से कम) को सांस के माध्यम से अंदर लेने पर श्वसन संबंधी समस्याएं, आंखों और त्वचा में जलन, और गले में खराश हो सकती है। सामान्यतः यह प्रभाव अल्पकालिक होता है, लेकिन लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से 'सिलिकोसिस' जैसी बीमारी का खतरा रहता है। जानवरों के लिए यह और भी घातक है; राख से ढका चारा खाने पर जानवरों के दांत घिस सकते हैं और उच्च फ्लोरीन सामग्री होने की स्थिति में 'फ्लोरीन विषाक्तता' के कारण उनकी मृत्यु भी हो सकती है।[3]
बुनियादी ढाँचा
[संपादित करें]- विमानन: उड़ते हुए विमानों के लिए ज्वालामुखी राख सबसे बड़ा खतरा है। राख विमान के इंजनों के अंदर जाकर पिघल जाती है और टर्बाइन ब्लेड पर जम जाती है, जिससे इंजन बीच हवा में काम करना बंद कर सकते हैं। विमान की खिड़कियों को भी इन अपघर्षक कणों से भारी नुकसान पहुँचता है। 2010 में आइसलैंड के ज्वालामुखी विस्फोट के कारण यूरोप का संपूर्ण हवाई यातायात कई दिनों तक ठप हो गया था।
- विद्युत और जल आपूर्ति: भीगी हुई ज्वालामुखी राख बिजली के तारों और इंसुलेटर पर जमा होकर 'फ्लैशओवर' या शॉर्ट-सर्किट का कारण बन सकती है। इसके अलावा, खुले जल स्रोत और जल शोधन संयंत्र भी राख गिरने से प्रदूषित और अवरुद्ध हो सकते हैं।
- इमारतें: राख के भारी जमाव और उस पर होने वाली बारिश के कारण छतों का वजन अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है, जिससे कमजोर इमारतों की छतों के गिरने का गंभीर खतरा रहता है।
पर्यावरण और कृषि
[संपादित करें]यद्यपि प्रारंभ में भारी राख का गिरना फसलों, चरागाहों और छोटे जंगलों को नष्ट कर सकता है, लेकिन दीर्घावधि में यह मिट्टी के लिए अत्यधिक फायदेमंद साबित होता है। ज्वालामुखी राख में फास्फोरस, नाइट्रोजन और अन्य महत्वपूर्ण खनिज भरपूर मात्रा में होते हैं। वर्षा के पानी के साथ यह मिट्टी में घुलकर उसे अत्यधिक उपजाऊ 'एंडिसोल' मिट्टी में बदल देती है। विश्व भर के ज्वालामुखीय द्वीपों पर मौजूद हरे-भरे जंगल इसी राख से समृद्ध मिट्टी का परिणाम हैं।
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Rose, W.I.; Durant, A.J. (2009). "Fine ash content of explosive eruptions". Journal of Volcanology and Geothermal Research. 186 (1–2): 32–39. डीओआई:10.1016/j.jvolgeores.2009.01.010.
- ↑ Cronin, S.J.; Neall, V.E.; Lecointre, J.A. (2003). "Environmental hazards of fluoride in volcanic ash: a case study from Ruapehu Volcano, New Zealand". Journal of Volcanology and Geothermal Research. 121 (3–4): 271–291. डीओआई:10.1016/S0377-0273(02)00465-1.
- ↑ Cronin, S.J.; Neall, V.E.; Lecointre, J.A. (2003). "Environmental hazards of fluoride in volcanic ash: a case study from Ruapehu Volcano, New Zealand". Journal of Volcanology and Geothermal Research. 121 (3–4): 271–291. डीओआई:10.1016/S0377-0273(02)00465-1.