ज्याणी

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ज्याणी एक जाट गोत्र है।[1] Jyani

(Jiani, Jani, Jani)

Location  : Rajasthan, Haryana, Punjab,Amritsar and Madhya Pradesh

Religion  : Hinduism

Jyani (ज्याणी) Jiani (जियाणी) Jani (जाणी) Jani (जानी) Gotra Jats are found in Rajasthan, Haryana, Punjab and Madhya Pradesh. Jani clan is found in Afghanistan. Jani (जानी) Jat clan is found in Amritsar. They supported the ascendant clan Johiya and became part of a political confederacy:They had joined Parihar Confederation

अनुक्रम

History[संपादित करें]

Bhim Singh Dahiya writes that Jāli are mentioned by Panini under the name of Jālamani along with Jānaki, to be identified with the Jani clan in the Trigarta people.

According to H.A. Rose Jat clans derived from Joiya are: Pasal, Mondhla, Khichar, Jani, Machra, Kachroya, Sor and Joiya.

ज्याणी गौत्र का इतिहास[संपादित करें]

ईसराण गौत्र का यह इतिहास प्रो. हनुमानाराम ईसराण (Mob: 9414527293, Email:<hrisran@gmail.com>) द्वारा उपलब्ध कराया गया है। ये तथ्य बही भाट श्री कानसिंह गांव ढेंचवास, पोस्ट:चौसाला वाया डिग्गी, तहसील: मालपुरा, जिला:टोंक (राजस्थान) की बही में अभिलिखित है।

ज्याणी का गौत्रचारा

  • ऋषि-वंश : कपिल ऋषि
  • नख: दायमा
  • गौत्र: ब्रह्मेश्वर गौत्र
  • पूजा: माता दूधवती
  • देव: गोस्वामी (गोसांई जी की चरण पूजा)
  • देव-स्थान: गांव - जुंजाला, जिला - नागौर एवं रुणेचा, रामदेवरा (जोधपुर)

ज्याणी गोत्र की वंशावली:

ज्याणी गोत्र के प्रथम महापुरुष/संत पुरूष श्री महिदास जी हुए।

महिदास जी के 65 पीढ़ी उपरांत श्री पुरूषोतम नामक सिद्ध पुरुष हुए।

श्री पुरूषोत्तम जी के चार पुत्र हुए जिनसे निम्नानुसार जाट चार गोत्र प्रसिद्ध हुये :-

1. ज्ञानाराय ----ज्याणी
2. जोरराज----झूरिया
3. हेमराज----हुड्डा
4. ईसरराय---ईसराण

कटराथल के चौधरी[संपादित करें]

कटराथल के संबंध में रणमल सिंह ने लिखा है कि.... मेरे डोरवाल पूर्वज संवत 1807 तदनुसार 1759 ई में ग्राम बारवा, जिला झुंझूनुं से कटराथल आए थे। कारण एक दुर्घटना घटित हो गई थी। कहते हैं कि छपनिया अकाल से पूर्व खेजड़ी छांगते नहीं थे । भेड़ बकरियों को ही कुल्हाड़ा या अकूड़ा से काटकर चारा डाल दिया करते थे। उस समय गाय ही प्रमुख पशुधन था। ऊंट व भैंस नाम के ही थे। उस समय कहावत थी कि “घोड़ां राज और बल्दां (बैल) खेती” पाला (बेर की झड़ी की पत्तियाँ) बहुत होता था , सो गायों को पाला डाल देते और कड़बी का पूला तोड़ देते। उस समय छानी नहीं काटी जाती थी। मेरे पूर्वजों के खेत में चार राजपूतों के लड़के आए और उन्होने खेजड़ी की टहनियाँ काटकर अपनी बकरियों को डाल दी। हमारे पूर्वज के चार बेटे थे। सबसे छोटा बेटा बकरियाँ लेकर खेत गया हुआ था। उसने उनका विरोध किया औए अकेला ही उन चारों से भीड़ लिया। एक लड़के ने उसकी गरदन पर कुल्हाड़े से वार कर दिया और उसकी वहीं मृत्यु हो गई। इसका समाचार जब उसके पिता को दिया तो वह लट्ठ लेकर चल पड़ा। उन चारों में से एक लड़का तो भाग गया शेष तीन को उसने जान से ही मार डाला। गाँव के राजपूतों ने मंत्रणा की कि ये चारों बाप-बेटे हम से तो मार खाएँगे नहीं , क्योंकि सभी 6 फीट के जवान थे। अन्य गांवों और आस-पास के राजपूतों को बुलाकर लाओ और रात को इनके घर को आग लगाकर इन्हें जीवित जलादो। यह सूचना एक दारोगा (रावणा राजपूत) ने इनको दे दी। सो अपना गाड़ा (चार बैलों वाला) और दो बैलों में बर्तन भांडे, औरतें तथा बकरियों के छोटे बच्चों तथा गायों के छोटे बछड़ों को गाड़े में बैठाकर यहाँ से चल पड़े और रात को बेरी ग्राम के बीड़ में आकर रुके। सुबह उठकर कटराथल पहुँच गए। उस समय कटराथल में चौधरी (मेहता) ज्याणी गोत्र का जाट था। हमारे गाँव में मुसलमानों ने बौद्धकालीन मंदिर तोड़कर टीले पर गढ़ बनाया था। उस की एक बुर्ज आज भी खड़ी है। बौद्धकालीन मूर्तियों को गढ़ की नींव में औंधे मुंह डाल दिया। कालांतर में शेखावतों ने गढ़ पर कब्जा कर लिया था। हमारे गाँव के दो राजपूत जयपुर-भरतपुर के बीच हुये युद्ध (मावण्डा) में मारे गए थे। उनकी छतरियाँ आज भी गाँव मैं मौजूद हैं। दो विधवा ठुकराणियां एवं उनके नौकर-चाकर ही थे।


[पृष्ठ-112]: ज्याणी गोत्र के जाट चौधरी ने उन ठुकराणियों को बताया कि एक आदमी अपने परिवार एवं पशुओं सहित आया है तो उन्होने कहा कि उसे यहीं बसाओ। खीचड़ गोत्र के जाट हमारे पूर्वजों से 50 वर्ष पहले ही कटराथल में आकर बसे थे। उनके पास ही हमारे पूर्वजों को बसा दिया गया।

तेजाजी से संबंध[संपादित करें]

तेजाजी के ननिहाल दो जगह थे – त्योद (किशनगढ़, अजमेर) और अठ्यासन (नागौर)।

तेजाजी के पिता ताहड़देव जी धौलिया का पहला विवाह त्योद किशनगढ़ के दुल्हण जी सोढ़ी – ज्याणी जाट की पुत्री रामकुंवरी के साथ वि.स. 1106 (=1049 AD) में सम्पन्न हुआ। विवाह के 12 वर्ष पश्चात भी जब खरनाल गणराज्य के उत्तराधिकारी के रूप में किसी राजकुमार का जन्म नहीं हुआ तो राजमाता रामकुँवरी ने ताहड़ जी को दूसरे विवाह की अनुमति दी और स्वयं अपने पीहर त्योद जाकर शिव और नागदेवता की पूजा अर्चना में रत हो गई।

तेजाजी के प्रथम ननिहाल त्योद में ज्याणी जाटों के मात्र 3 घर ही हैं। इनके पूर्वज मंगरी गाँव में बस गए हैं।

संदर्भ – विश्वेन्द्र चौधरी ‘वीर तेजाजी विशेषांक’ (M:9983202007), लेखक: बलबीर घींटाला (M: 9024980515) , शोधकर्ता व लेखक – संत कान्हाराम सुरसुरा (M:9460360907)

तेजाजी का इतिहास[संपादित करें]

संत श्री कान्हाराम ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-84]: तेजाजी के जन्म के समय (1074 ई.) यहाँ मरुधरा में छोटे-छोटे गणराज्य आबाद थे। तेजाजी के पिता ताहड़ देव (थिरराज) खरनाल गणराज्य के गणपति थे। इसमें 24 गांवों का समूह था। तेजाजी का ससुराल पनेर भी एक गणराज्य था जिस पर झाँझर गोत्र के जाट राव रायमल मुहता का शासन था। मेहता या मुहता उनकी पदवी थी। उस समय पनेर काफी बड़ा नगर था, जो शहर पनेर नाम से विख्यात था। छोटे छोटे गणराज्यों के संघ ही प्रतिहार व चौहान के दल थे जो उस समय के पराक्रमी राजा के नेतृत्व में ये दल बने थे।


[पृष्ठ-85]: पनैर, जाजोता व रूपनगर गांवों के बीच की भूमि में दबे शहर पनेर के अवशेष आज भी खुदाई में मिलते हैं। आस पास ही कहीं महाभारत कालीन बहबलपुर भी था। पनेर से डेढ़ किमी दूर दक्षिण पूर्व दिशा में रंगबाड़ी में लाछा गुजरी अपने पति परिवार के साथ रहती थी। लाछा के पास बड़ी संख्या में गौ धन था। समाज में लाछा की बड़ी मान्यता थी। लाछा का पति नंदू गुजर एक सीधा साधा इंसान था।

तेजाजी की सास बोदल दे पेमल का अन्यत्र पुनःविवाह करना चाहती थी, उसमें लाछा बड़ी रोड़ा थी। सतवंती पेमल अपनी माता को इस कुकर्त्य के लिए साफ मना कर चुकी थी।

खरनाल व शहर पनेर गणराजयों की तरह अन्य वंशों के अलग-अलग गणराज्य थे। तेजाजी का ननिहाल त्योद भी एक गणराज्य था। जिसके गणपति तेजाजी के नानाजी दूल्हण सोढ़ी (ज्याणी) प्रतिष्ठित थे। ये सोढ़ीपहले पांचाल प्रदेश अंतर्गत अधिपति थे। ऐतिहासिक कारणों से ये जांगल प्रदेश के त्योद में आ बसे। सोढ़ी से ही ज्याणी गोत्र निकला है।


संत श्री कान्हाराम ने लिखा है कि....ताहड़ देव की प्रथम पत्नी त्योद निवासी ज्याणी गोत्र के जाट करसण जी के पुत्र राव दूल्हन जी सोढ़ी की पुत्री थी। यह सोढ़ी शब्द दूल्हन जी की खाँप या उपगोत्र अथवा नख से संबन्धित है। अब यहाँ ज्याणी गोत्री जाटों के सिर्फ तीन घर आबाद हैं। यहाँ से 20-25 किमी दूर आबाद मंगरी गाँव में ज्याणी रहते हैं।

तेजाजी का प्रथम ननिहाल त्योद त्योद - यह ग्राम तेजाजी का ननिहाल है। त्योद ग्राम तेजाजी के समाधि धाम सुरसुरा से 5-6 किमी उत्तर दिशा में है। त्योद निवासी ज्याणी गोत्र के जाट करसण जी के पुत्र राव दूल्हन जी सोढ़ी की पुत्री राम कुँवरी का विवाह खरनाल निवासी बोहित जी (बक्साजी) के पुत्र ताहड़ देव (थिर राज) के साथ विक्रम संवत 1104 में हुआ था।


[पृष्ठ-163]: विवाह के समय ताहड़ देव एवं राम कुँवरी दोनों जवान थे। ये सोढ़ी गोत्री जाट पांचाल प्रदेश से आए थे। यह ज्याणी भी सोढियों से निकले हैं। तब सोढ़ी यहाँ के गणपति थे। केंद्रीय सत्ता चौहानों की थी। यहाँ पर तेजाजी का प्राचीन मंदिर ज्याणी गोत्र के जाटों द्वारा बनवाया गया है। अब यहाँ पुराने मंदिर के स्थान पर नए भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जा रहा है। यहाँ पर जाट, गुर्जर, बनिया, रेगर, मेघवाल, राजपूत, वैष्णव , ब्राह्मण, हरिजन, जांगिड़ , ढाढ़ी , बागरिया, गोस्वामी, कुम्हार आदि जतियों के लोग निवास करते हैं।

किशनगढ़ तहसील के ग्राम दादिया निवासी लादूराम बड़वा (राव) पहले त्योद आते थे तथा तेजाजी का ननिहाल ज्याणी गोत्र में होने की वार्ता सुनाया करते थे। पहले इस गाँव को ज्याणी गोत्र के जाटों ने बसाया था। अब अधिकांस ज्याणी गोत्र के लोग मँगरी गाँव में चले गए हैं।


[पृष्ठ-164]: तेजाजी के जमाने से काफी पहले ज्यानियों द्वारा बसाया गया था। पुराना गाँव वर्तमान गाँव से उत्तर दिशा में था। इसके अवशेष राख़, मिट्टी आदि अभी भी मिलते हैं। वर्तमान गाँव की छड़ी ज्याणी जाटों की रोपी हुई है।

जाणी गोत्र के बारे में रोचक जानकारी[संपादित करें]

रामलाल जाट जाणी द्वारा बताया गया कि मेरी 75 वर्षीय दादी माँ के अनुसार हम पहले मथानिया जोधपुर में रहते थे। राजतन्त्र था कर तो देना ही पड़ता था। राजा का आदमी नियुक्त था जो फसल का कुंता करता था जिसे कणवारिया कहा जाता था। एक दिन एक अजीब घटना घटी पुरूष व महिलाऐं खेत में काम पर गए हुए थे। घर पर बहू अकेली थी। अनाज का बंटवारा किया हुआ नहीं था। बहू ने सोचा मैं बिना बंटे अनाज को पीस दूँ। सुबह का समय था वह सुबह जल्दी अनाज पीस रही थी तभी अचानक कणवारिया आ गया। जब वह झोपड़े में घुसने लगा तो बहू को लगा कि मैं अन्दर से दरवाजा बंद कर दूँ। जैसे ही वह कणवारिया अंदर घुसने लगा वैसे ही बहू ने दरवाजा बंद किया और वह कणवारिया दरवाजे में फंसकर मर गया। अब बड़ी उलझन हुई। बहु दौड़ी दौड़ी खेत में गई। वहां उनको बात बताई तो हमारे पूर्वज चिंता में पड़ गए कि अब क्या किया जाए। अब यहाँ रहना भी उचित नहीं है क्योंकि राजा फांसी दे देगा। तब हमारे पूर्वज वहाँ से निकल पड़े। उनको यह भी डर था राजा पीछा करेगा। तब तक हम हनुमान जी को अपना इष्ट देव मानते थे । वहां से निकलने के बाद थोडा दूर भंसेर गांव पड़ता है वहां माता काली का मंदिर था। पास में एक देवासी का रेवड़ था उसमे से दो बकरे उठाये और माता जी को चढ़ा दिए। तब फिर मन ने आशीर्वाद दिया और बकरों का मास गेंहू की लापसी बन गया और चमड़ी ऊन की लोवडी (वस्त्र) बन गई। तब राजा की वार (सैनिक) पीछा करती हुई आ गई लेकिन वो वार मंदिर की ओरण में घुसने पर अंधी हो गई। फिर हमारे पूर्वज पाबूबेरा में आकर बस गए। अब पाबुबेरा में जाणियों के 40 घर है ।हमारी सातवी पीढ़ी यहाँ आकर बसी । कणवारिये को मारने वाली बहादुर जाटणी हमारी सातवीं पीढ़ी में थी।

सन 1800 ईसवी के लगभग जाणी भैंसेर से पलायन करके पाबू बेरा आए थे यह आकर बसने वाले हमारे पूर्वज का नाम भेराराम था उनके दो पुत्र थे शेराराम और मघाराम उन्हीं दो पुत्रों से हमारे गांव में अब जाणियों के 40 से ज्यादा घर है अब हमारे गांव से हमारे कुछ भाई डूंगरी जालौर में रहते हैं तो कुछ कोठाला जाकर बस गए। अब काफी जागृति और शिक्षा का स्तर बढ़ा है और हमारा गोत्र भी काफी शिक्षित है एक हमारा भाई आर्मी में है और गांव में नजदीक ही मिडिल स्कूल है वहां लड़के लड़कियां पढ़ने के लिए जाते

Jani in Muslim History[संपादित करें]

H.A. Rose mentions about Jani in a mirasi's chāp or ballad regarding the great deeds of the Chaddrar clan, found along the whole length of the Chenab and Ravi valleys, but far most numerous in Jhang, where they for the most part regard themselves as Rajputs, the Chhadhars claim to be descended from Raja Tur, Tunwar.

Is kul te dātā Nūrā, Gahna, Jāni, Wāchi, Ibrahim Haqqāni. Meaning- Of this family were the generous Nur, Gahna, Jani, Wachu and Ibrahim the Haqqani.

Sir H. M. Elliot Edited by John Dowson writes about two Muslim Jani Rulers in Bengal and Bihar in 13th century: Sultan Sa'id Shamsu-d din sent armies several times from Dehli, and having conquered the province of Behar he stationed his officers there. In 622 (1225 A.D.) he invaded Lakhnauti and Ghiyasu-d din advanced his boats up the stream to oppose him, but peace was made between them. Shamsu-d din accepted thirty eight elephants, and treasure to the amount of eighty lacs. He ordered the Khutba to be read in his name. On his departure he gave Behar to Malik 'Alau-d din Jani. Ghiyasu-d din 'Auz came to Behar from Lakhnauti, and took it, and acted tyrannically. At last in the year 624 (1227 A.D.), Malik Shahid Nasiru-d din Mahmud, son of Sultan Shamsu-d din, having collected an army in Hindustan, and accompanied by 'Izzu-l Malik Jani, marched from Oude to Lakhnauti. At this time Ghiyasu-d din 'Auz had gone on an expedition to Bengal and Kamrup, and had left Lakhnauti stripped of defenders.

Sir H. M. Elliot Edited by John Dowson writes that After great revelling and rejoicing, news arrived in Jumada-l awwal, 626 (April, 1229), of the death of Prince Sa'id Nasiru-d din Mahmud. Balk Malik Khilji had broken out in rebellion in the territories of Lakhnauti, and Sultan Shamsu-d din led thither the armies of Hindustan, and having captured the rebel, he, in a.h. 627, gave the throne of Lakhnauti to Malik 'Alau-d din Jani, and returned to his capital in the month of Rajab of the same year.


Sir H. M. Elliot Edited by John Dowson writes that When Sultan Raziya succeeded to the throne, all things reverted to their old order. But the wazir of the State, Nizamu-l Mulk Junaidi did not give in his adhesion. He, together with Malik Jani, Malik Kochi, Malik Kabir Khan, and Malik 'Izzu-d din Muhammad Salari, assembling from different parts of the country at the gates of Dehli, made war against Sultan Raziya, and hostilities were carried on for a long time. After a while, Mahk Nasiru-d din Tabashi Mu'izzi, who was governor of Oudh, brought up his forces to Dehli to the assistance of Sultan Raziya. When he had crossed the Ganges, the generals, who were fighting against Dehli, met him unexpectedly and took him prisoner. He then fell sick and died.

The stay of the insurgents at the gates of Dehli was protracted. Sultan Raziya, favoured by fortune, went out from the city and ordered her tents to be pitched at a place on the banks of the


[p.334]: Jumna, Several engagements took place between the Turkish nobles who were on the side of the Sultan, and the insurgent chiefs. At last peace was effected, with great adroitness and judicious management. Malik 'Izzu-d din Muhammad Salar and Malik 'Izzu-d din Kabir Khan Ayyaz secretly joined the Sultan and came at night to her majesty's tents, upon the understanding that Malik Jani, Malik Kochi, and Nizamu-l Mulk Junaidi were to be summoned and closely imprisoned, so that the rebellion might subside. When these chiefs were informed of this matter they fled from their camps, and some horsemen of the Sultan pursued them. Malik Kochi and his brother Fakhru-d din were captured, and were afterwards killed in prison. Malik Jani was slain in the neighbourhood of Babul and Nakwan. Nizamu-l Mulk Junaidi went into the mountains of Bardar,1 and died there after a while.

Villages founded by Jyani clan[संपादित करें]

  • Jyanion Ki Dhani (Jalor)
  • Jyani Jayal (ज्याणी) - village in Jayal tehsil of Nagaur district in Rajasthan.
  • Janiyana (जानियाना) - Village in Pachpadra tahsil of Barmer district in Rajasthan.
  • Janiyon Ki Beri (जाणियों की बेरी) - village in Gudha Malani Tahsil of Barmer district in Rajasthan.
  • Janiyon Ki Dhani (जाणियों की ढाणी) - village in Gudha Malani Tahsil of Barmer district in Rajasthan.
  • Jyanion Ki Dhani (ज्याणीयों की ढाणी) - village in Jalore District in Rajasthan.
  • Nethawa - village in Churu District in Rajasthan
  • Bhalau Tal - village in Churu District in Rajasthan

Sub divisions of Johiya[संपादित करें]

Bhim Singh Dahiya provides us list of Jat clans who were supporters of the Johiya when they gained political ascendancy. The Jani clan supported the ascendant clan Johiya and became part of a political confederacy.

Distribution in Rajasthan[संपादित करें]

In Rajasthan jyani live in Hanumangarh, Ganganagar, Sikar, Churu, Jaisalmer, Jodhpur, Barmer, Bikaner, Jaipur,Nagaur&Tonk districts of Rajasthan.

Villages in Hanumangarh district[संपादित करें]

Bolanwali, Dingarh, Hanumangarh, Indrapura Hanumangarh, Katheda, Kulchander (कुलचन्द्र), Nyaulkhi, Pakka Saharana, Phephana, Ratanpura Sangaria, Sureshiyan,

Villages in Ganganagar district[संपादित करें]

3PP, Gharsana, Morjanda Khari, Sardarpura Jiwan,

Locations in Jaipur city[संपादित करें]

Bagruwalon ka Rasta, Purani Basti, Sanganer, Uniyaron ka Rasta,

Villages in Jaipur district[संपादित करें]

Bhadwa Phulera (), Bhojpur Dudu, Khadunja (15), Gahlota, Nachaniya ki Dhani (3), Jekampura, Rahlana, Maleda, Dudu

Villages in Nagaur district[संपादित करें]

Bachhwari, Badela, Banwarla, Barnel (Parbatsar), Dabriya, Dehroli, Gachhipura, Goganada, Joosariya, Mamdoli (14), Merasi, Narwa Kalan, Ransisar, Sabalpur Makrana, Thalanjoo

Villages in Pali district[संपादित करें]

Korilan sandelav, Giri,

Villages in Sikar district[संपादित करें]

The villages in Sikar district with number of Jyani families are:

Chainpura (200), Dhandhan (1), Dhilsar (15), Godia Bada (4), Fadanpura (55), Hirna (60), Kharinta (5),

Villages in Jhunjhunu district[संपादित करें]

Dheelsar,

Villages in Jaisalmer district[संपादित करें]

Bhaniyana,

Villages in Churu district[संपादित करें]

Bamboo, Bhalau Teeba, Binadesar (8), Chainpura Ratangarh, Chhapar Churu (30), Gogasar, Lalgarh, Sardarshahar, Satyun, Sujangarh (13),

Villages in Jodhpur district[संपादित करें]

Bijariya Bavri (20), Chadi, Champasar, Chamu, Cherai, Gagari, Hariya Dhana, Jodhpur, Mathaniya, Nandara Kalan, Pabupura, Palri Mangaliya, Panchla Khurd, Phalaudi, Pipad,Poonasar Thob,

Villages in Barmer district[संपादित करें]

Adarsh Rameshwar Nagar, Alamsar, Barmer, Baytu, Bayatu Bhimji, Bayatu Panji, Bhadrai, Bor Charnan, Bhimthal, Chandesara, Chaukriya Ki Dhani, Chhitar Ka Par, Chokhla,Dharasar Ka Tala, Dhorimanna, Janiyana, Janiyon Ki Beri, Jaydoo, Jhakh Barmer, Jiyaniyon Ki Basti, Janiyon Ki Dhani, Kosariya, Mokhab Khurd, Pabubera, Ramji Ka Gol (10),Ratasar, Sarla Barmer, Sindhari, Siyolon Ka Der (Peeprali), Udasar,

Villages in Jalore district[संपादित करें]

Jyanion Ki Dhani, Khara, Lalji Ki Dungari, Punasa,

Villages in Bikaner district[संपादित करें]

Ankhisar, Barsingsar, Kalu, Likhmadesar, Katariasar, Nakodesar, Ramnagar, Takhatpura,

Villages in Tonk district[संपादित करें]

Bilamata (4),

Villages in Udaipur district[संपादित करें]

Badgaon Bandh, Udakheda, Basda.

Villages in Ajmer district[संपादित करें]

Magri, Tyod (3),

Distribution in Haryana[संपादित करें]

Villages in Bhiwani District[संपादित करें]

Jyani Chappar, Loharwara Bhiwani,

Villages in Sirsa District[संपादित करें]

Chautala, Darba Kalan, Musahibwala, Nahranwali Sirsa,

Villages in Hisar District[संपादित करें]

Jakhod Khera,

Distribution in Punjab[संपादित करें]

Villages in Fazilka district[संपादित करें]

Katehara,

Villages in Firozepur district[संपादित करें]

Katora, Kular Firozpur,

Distribution in Madhya Pradesh[संपादित करें]

Betikheri (Mandsaur), Nimach city, Khategaon (Dewas)

Villages in Ratlam district[संपादित करें]

Villages in Ratlam district with population of this gotra are:

Banjali 3, Dantodiya 17, Dheekwa 1, Kalmoda 2, Kalori 1, Kanser 2, Kunwajhagar 14, Raoti 1, Ratlam 1, Rughnathgarh 1, Sailana 2, Salakhedi 2, Sikhedi 2, Surana 2,

Villages in Indore district[संपादित करें]

Dudhia,

Villages in Dewas district[संपादित करें]

Bagada Dewas, Dewas, Khategaon, Kothmir,

Villages in Harda district[संपादित करें]

Abagaon Khurd (1), Adampur Harda, Ajnai, Bichhola, Dudi Dhani, Nayapura, Nimakhedi, Oshopuram, Rundlay, Tajpura,

Distribution in Gujarat[संपादित करें]

Villages in Banas Kantha district[संपादित करें]

Deesa,

Notable persons[संपादित करें]

  • Dulhan Sodhi Jyani Jat - He was nanaji of Tejaji from village Tyod (Kishangarh, Ajmer).
  • Guru Jasnath Ji Maharaj (Jyani) - The founder of Jasnathi Sampradaya
  • Jyani Jat - Whose legends are still heard in the haryanvi and punjabi folk tales and in chaupal.
  • Chaudhari Ramnarayan Jyani - The motivator of Chaudhary Bahadur Singh Bhobia Trust, Sangaria in memory of Swami Keshwanand.
  • Rawata Ram Jani - Martyr of 1965 Indo-Pak War. Village: Chandesara , Pachpadra Tahsil, Barmer, Rajasthan.
  • Ajay Pal Jyani - RAS Rajasthan, (PR-06/Sriganganagar), DOB - 11/02/1958,Vill. 3PP, POST- 5KK(Chunawad) Distt.- Sriganganagar. 335022, Mob.No. - 9413379500, 9829313083, Phone : 01554-2445078, Email Address : jyaniap@gmail.com,jyaniap@yahoo.co.in
  • Surjit Singh Jyani - Ex-MLA and Ex-Minister in Punjab Government
  • Shanti Lal Jani - Agriculture, Residential School, and Hostel. Ex. Sarpanch of Dudhia (Indore) (1986-95), Director Janpad Panchayat Indore (2001-5), Upadhyaksh Kisan Congress and Khet Mazdoor and Incharge Dewas district. Ph: 0731-2863247, Mob:9977140404
  • Ramdev Singh Jyani - Date of Birth : 11-April-1957, Jr. Hydrogeologist Ground Water Deptt.VPO- Ransisar Jodha, Via -Kolia, tah.- Didwana, Nagaur, Present Address : Ransisar house, Ward No 42,Inside Charan Singh Gate, Sikar, Phone: 01580-273109 Mob: 9414032586
  • Virmaram Jyani - Journalist ZEE NEWS H.Q., Date of Birth : 1-September-1980,Jyaniyon Ki Dhani, Bara Bhadvi, dist. Jalore, Raj-343029, Present Address : ZEE NEWS, fc19, sec 16A, NOIDA,UP, Phone Number : 9818736479, Mob: 9818736479, Email: thejat80@hotmail.com, thejat80@gmail.com
  • Arjun Ram Choudhary (Jyani) - X.En. PHED , Home District : Pali, Date of Birth : 5-July-1958, 8C, Subhash Nagar, Pal Road, Jodhpur, Phone : 0291-2786009, Mob: 9414300341, Email : carjunram@yahoo.com
  • Naveen Jiani - Rohini, Delhi
  • Justice Jagat Singh Jyani - Date of Birth : 1-March-1941, Ex.Member, Human Rights Commission, Raj., Raj. High Court, Home District : Ferozpur, Punjab. Address : K-17,Income Tax Colony, Durgapura, Tonk Road,Jaipur, Rajasthan, Resi. Phone: 0141-2550339, Mobile Number : 9414033027
  • चौ. बलेन्द्र सिंह पुत्र श्री कृपाराम ज्याणी चक 3 पी.पी. पो.ओ. 5-के के वाया चुनावढ़ जिला श्रीगंगानगर
  • Krishan Jyani: Danics 2012 batch, CEO, Daman Municipal Council, DS , DIC,Industry, Daman, From Bikaner, Earlier BDO, Rajasthan, IRTS 2013, M: 8285216185
  • Ram Lal Jani S/O Shri Harkha Ram Jani from Village Pabubera POST Bhimthal Tehsil Dhorimanna, Barmer, M: 8003041770
   jat history blog  जाट इतिहास    https://jatguru.blogspot.in/ 

Gallery of Jyani people[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. डॉ॰ पेमाराम (2010). "राजस्थान के जाटों का इतिहास". p. 301. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-86103-96-1. 

2.https://www.jatland.com/home/Jat_History_Dalip_Singh_Ahlawat/Parishisht-I

.3https://www.jatland.com/home/Jat_History_Thakur_Deshraj/Chapter_IX

4..https://www.jatland.com/home/An_Inquiry_Into_the_Ethnography_of_Afghanistan