ज्ञानेन्द्रियाँ

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ज्ञानेन्द्रियाँ मनुष्य के वे अंग है जो देखने, सुनने, महसूस करने, स्वाद-ताप-रंग अदि का पता लगाते हैं। मानव शरीर में त्वचा, आँख, कान, नाक और जिव्हा आदि पाँच प्रकार की ज्ञानेन्द्रियाँ होती है। त्वचा महसूस करने का, आँखे देखने का, कान सुनने का, नाक गंध का पता लगाने का और जिह्वा स्वाद को परखने का काम करती है। ज्ञानेंद्रियों का महत्व तब सामने आता है जब कोई व्यक्ति विशेष इन्हें अपने वश में कर ले। ज्ञानेंद्रियां मनुष्य जाति को श्रेणीबद्ध करने की एकल प्राकृतिक शक्तियां हैं। प्रकृति ने हर जीव मात्र को एक खास प्रकार की शक्तियों के साथ जन्म दिया है। उन मानविक शक्तियों में ज्ञानेंद्रियों की महत्ता विशेष है। जिस इंसान के भीतर जितना साफ आईना मौजूद होता है, उस इंसान के अंदर उतनी ही अधिक परस्पर ज्ञानेंद्रियों की ऊर्जा का विकास होता है। एक अंधे व्यक्ति या एक बहरे व्यक्ति के भीतर भी ऊर्जा का विकास होता है, उसी ऊर्जा से जीवन की कुशलता प्राप्त होती है। एक स्वस्थ एवं सुंदर इंसान के भीतर भी वह ऊर्जा विकसित नहीं हो पाती, जो एक कुरूप हो अथवा विकल अंगों के साथ जीवन का दर्शन करता है वहां ऊर्जा विकास कर फल देती है। ज्ञानेंद्रियों की एक खास गति से ही अलौकिक ऊर्जा का संबंध है। [1][2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "संग्रहीत प्रति". मूल से 4 मार्च 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 19 अक्तूबर 2015.
  2. http://m.shutterstock.com/images/270084920