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जॉन मॉट

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जॉन रैलघ मॉट

१९१० में जॉन मॉट
जन्म 25 मई 1865
लिविंगस्टन मैनर, न्यूयॉर्क, संयुक्त राज्य अमेरिका
मौत 31 जनवरी 1955(1955-01-31) (उम्र 89 वर्ष)
ऑरलैंडो, फ्लोरिडा, संयुक्त राज्य अमेरिका
पेशा आध्यात्मिक नेता, समाज सेवक, लेखक, कूटनीतिज्ञ
प्रसिद्धि का कारण वाई.एम.सी.ए. का नेतृत्व, विश्व छात्र ईसाई संघ के संस्थापक
पुरस्कार नोबेल शांति पुरस्कार (१९४६)

जॉन रैलघ मॉट (अंग्रेज़ी: John Raleigh Mott; जन्म: २५ मई १८६५ – ३१ जनवरी १९५५) बीसवीं शताब्दी के एक मूर्धन्य समाज सेवक, दूरदर्शी आध्यात्मिक नेता और विश्वव्यापी युवा तथा पारस्परिकता आंदोलनों के अग्रदूत थे।[1] उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रों के मध्य सांस्कृतिक, शैक्षिक और आध्यात्मिक सेतुओं के निर्माण में समर्पित कर दिया। उनके इसी अप्रतिम योगदान और विश्व शांति को सुदृढ़ करने के सतत प्रयासों के फलस्वरूप, वर्ष १९४६ में उन्हें विश्व के सर्वोच्च सम्मान नोबेल शांति पुरस्कार से अलंकृत किया गया।[2] मॉट को आधुनिक इतिहास में एक ऐसे महामानव के रूप में स्मरण किया जाता है, जिन्होंने भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं को लांघकर वैश्विक बंधुत्व की संकल्पना को साकार किया।[3]

प्रारंभिक जीवन एवं बौद्धिक पृष्ठभूमि

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जॉन मॉट का जन्म २५ मई १८६५ को संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य में स्थित लिविंगस्टन मैनर नामक एक अल्पज्ञात कस्बे में हुआ था।[4] उनके जन्म के कुछ समय पश्चात् ही उनका परिवार आयोवा प्रांत के पोस्टविले नामक स्थान पर स्थानांतरित हो गया, जहाँ उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा संपन्न हुई।[5]

बचपन से ही उनकी कुशाग्र बुद्धि और अध्ययनशीलता अत्यंत प्रखर थी। उन्होंने 'अपर आयोवा विश्वविद्यालय' से अपनी उच्च शिक्षा का श्रीगणेश किया।[6] तत्पश्चात्, ज्ञानार्जन की उत्कट पिपासा उन्हें विख्यात कॉर्नेल विश्वविद्यालय ले गई।[7] कॉर्नेल में अध्ययन के दौरान, उनका संपर्क एक प्रख्यात वक्ता और दार्शनिक आर्थर पियर्सन से हुआ, जिनके ओजस्वी विचारों ने मॉट के जीवन की दिशा ही परिवर्तित कर दी। १८८८ में दर्शनशास्त्र और इतिहास में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के उपरांत, उन्होंने अपना जीवन मानवता की सेवा के लिए उत्सर्ग करने का दृढ़ संकल्प लिया।[8]

वैश्विक नेतृत्व एवं संगठनात्मक विस्तार

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जॉन मॉट की संगठनात्मक क्षमता अद्वितीय थी। उन्होंने 'यंग मेन्स क्रिश्चियन एसोसिएशन' (वाई.एम.सी.ए.) के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सचिव के रूप में दशकों तक अपनी सेवाएँ प्रदान कीं।[9] उनका स्वप्न युवाओं को एक ऐसे वैश्विक मंच पर एकत्रित करना था जहाँ वे वैचारिक संकीर्णता से मुक्त होकर मानवता के कल्याणार्थ कार्य कर सकें। इसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए, १८९५ में उन्होंने 'विश्व छात्र ईसाई संघ' की स्थापना की।[10] यह संगठन उस कालखंड में विश्व भर के बौद्धिक युवाओं का सबसे सशक्त समागम बन गया था।

वर्ष १९१० में एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड) में आयोजित ऐतिहासिक 'विश्व मिशनरी सम्मेलन' की अध्यक्षता जॉन मॉट ने ही की थी।[11] इस सम्मेलन को आधुनिक युग के समन्वयवादी आंदोलन का उद्गम स्थल माना जाता है, जहाँ विभिन्न राष्ट्रों और संस्कृतियों के प्रतिनिधि एक साझा कल्याणकारी नीति निर्माण के लिए एकत्रित हुए थे।[12]

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तथा शांति के भगीरथ प्रयास

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जॉन मॉट का कार्यक्षेत्र केवल धार्मिक अथवा सामाजिक सुधारों तक ही सीमित नहीं था, अपितु वे एक निपुण कूटनीतिज्ञ भी थे। प्रथम विश्व युद्ध (१९१४-१९१८) की विभीषिका के मध्य, जब संपूर्ण विश्व घृणा और रक्तपात की अग्नि में धधक रहा था, मॉट ने शांति दूत की भूमिका का निर्वहन किया।[13]

उन्होंने युद्ध-बंदियों के अधिकारों की रक्षा और युद्ध से विस्थापित हुए लाखों शरणार्थियों के लिए राहत कार्य संचालित करने हेतु अथक प्रयास किए।[14] तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन उनके गहन चिंतन और वैश्विक प्रभाव से अत्यधिक प्रभावित थे। इसीलिए १९१७ में कूटनीतिक 'रूट मिशन' के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में उन्हें रूस भेजा गया, जिसका उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका और रूस के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना था।[15] इसके अतिरिक्त, मॉट ने शांति और शिक्षा का प्रसार करने के लिए अपने जीवनकाल में लगभग अस्सी देशों की यात्रा की, जो उस युग में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान था।[16]

नोबेल शांति पुरस्कार (१९४६)

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विभिन्न राष्ट्रों, संस्कृतियों और युवाओं के मध्य भ्रातृत्व भाव एवं शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की स्थापना के लिए किए गए उनके युगांतरकारी योगदान का विश्व स्तर पर संज्ञान लिया गया।[17] वर्ष १९४६ में, नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने जॉन मॉट को शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया।[18] यह पुरस्कार उन्होंने विख्यात अमेरिकी शांतिवादी महिला एमिली ग्रीन बाल्च के साथ साझा किया था।[19] नोबेल समिति ने अपने प्रशस्ति पत्र में उल्लेख किया था कि मॉट ने राष्ट्रीय सीमाओं के पार एक ऐसा शांति-संवर्धक वैचारिक भ्रातृत्व स्थापित किया है, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक अनुकरणीय आदर्श है।[20] ३१ जनवरी १९५५ को फ्लोरिडा के ऑरलैंडो में अठासी वर्ष की आयु में इस महान मानवतावादी का देहावसान हो गया।[21]

प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ

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जॉन मॉट केवल एक व्यावहारिक नेता ही नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के विचारक और सिद्धहस्त लेखक भी थे। उनकी रचनाएँ वैचारिक गहनता और भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। उनकी कुछ सर्वाधिक प्रशंसित और कालजयी कृतियाँ निम्नलिखित हैं:

  • द इवेंजलाइजेशन ऑफ द वर्ल्ड इन दिस जनरेशन (इस पीढ़ी में विश्व का सुसमाचार प्रचार, १९००) - इस पुस्तक में मॉट ने वैश्विक संचार और त्वरित प्रसार की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।[22]
  • द पादरी एंड मॉडर्न मिशन्स (पादरी और आधुनिक मिशन, १९०४) - यह कृति आधुनिक संदर्भ में धार्मिक नेताओं के सामाजिक उत्तरदायित्वों को परिभाषित करती है।[23]
  • द फ्यूचर लीडरशिप ऑफ द चर्च (चर्च का भावी नेतृत्व, १९०८) - इसमें युवाओं को नेतृत्व के लिए प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।[24]
  • द प्रेजेंट वर्ल्ड सिचुएशन (वर्तमान विश्व की स्थिति, १९१४) - प्रथम विश्व युद्ध की पूर्व संध्या पर प्रकाशित यह पुस्तक तत्कालीन भू-राजनीतिक परिदृश्य का सूक्ष्म विश्लेषण करती है।[25]
  • कंफ्रंटिंग यंग मेन विद द लिविंग क्राइस्ट (१९२३) - इस रचना में मॉट ने युवाओं के मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक द्वंद्वों को स्वर प्रदान किया है।[26]

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. "John R. Mott - American religious leader". Encyclopedia Britannica. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  2. "The Nobel Peace Prize 1946: John R. Mott". Nobel Prize Outreach AB. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  3. Hopkins, Charles Howard (1979). John R. Mott, 1865-1955: A Biography. Eerdmans.
  4. Mackie, Robert C. (1965). Layman Extraordinary: John R. Mott, 1865-1955. Association Press.
  5. "John R. Mott - Biographical". Nobel Prize Outreach AB. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  6. Fisher, Galen M. (1952). John R. Mott: Architect of Cooperation and Unity. Association Press.
  7. "John R. Mott Papers". Cornell University Library. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  8. Cracknell, Kenneth (2001). John R. Mott: A Christian Statesman. Epworth Press.
  9. "History of the YMCA". World YMCA. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  10. Shedd, Clarence Prouty (1934). Two Centuries of Student Christian Movements. Association Press.
  11. Stanley, Brian (2009). The World Missionary Conference, Edinburgh 1910. Eerdmans.
  12. "History of the Ecumenical Movement". World Council of Churches. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  13. Olds, Mason (1998). John R. Mott and the Peace Movement. University Press of America.
  14. "Humanitarian Relief in World War I". International Committee of the Red Cross. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  15. Kennan, George F. (1956). Soviet-American Relations, 1917-1920. Princeton University Press.
  16. Mott, John R. (1946). Addresses and Papers of John R. Mott (Vol. 1-6). Association Press.
  17. "Nobel Peace Prize Shared by Dr. Mott and Emily G. Balch". The New York Times. 1 नवंबर 1946. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  18. "Award Ceremony Speech: The Nobel Peace Prize 1946". Nobel Prize Outreach AB. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  19. "The Nobel Peace Prize 1946: Emily Greene Balch". Nobel Prize Outreach AB. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  20. Abrams, Irwin (2001). The Nobel Peace Prize and the Laureates. Science History Publications.
  21. "Dr. John R. Mott Dies at 89; YMCA Leader, Nobel Winner". The Washington Post. 1 फरवरी 1955. अभिगमन तिथि: 1 जून 2026.
  22. Mott, John R. (1900). The Evangelization of the World in This Generation. Student Volunteer Movement for Foreign Missions.
  23. Mott, John R. (1904). The Pastor and Modern Missions. Student Volunteer Movement.
  24. Mott, John R. (1908). The Future Leadership of the Church. Student Department YMCA.
  25. Mott, John R. (1914). The Present World Situation. Student Volunteer Movement.
  26. Mott, John R. (1923). Confronting Young Men with the Living Christ. Association Press.

बाहरी कड़ियाँ

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