जैसलमेर की चित्रकला

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चित्रकला की दृष्टि से जैसलमेर का विशिष्ट स्थान रहा है। भारत के पश्चिम थार मरुस्थल क्षेत्र में विस्तृत यह राज्य यहाँ दूर तक मरु के टीलों का विस्तार है, वहीं कला संसार का खजाना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। प्राचीन काल से ही व्यापारिक स्वर्णिम मार्ग के केन्द्र में होने के कारण जैसलमेर ऐश्वर्य, धर्म एवं सांस्कृतिक अवदान के लिए प्रसिद्ध रहा है। जैसलमेर में स्थित सोनार किला, चिन्तामणि पार्श्वनाथ जैन मंदिर (१४०२-१४१६ ई.), सम्भवनाथ जैन मंदिर (१४३६-१४४० ई.), शांतिनाथ कुन्थनाथ जैन मंदिर (१४८० ई.), चन्द्रप्रभु जैन मंदिर तथा अनेक वैषण्व मंदिर धर्म के साथ-साथ कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। १८वीं-१९वीं शताब्दी में बनी जैसलमेर की प्रसिद्ध हवेलियाँ तो स्थापत्य कला की बेजोड़ मिसाल है। इन हवेलियों में बने भित्ति चित्र काफी सुंदर हैं। सालिम सिंह मेहता की हवेली, पटवों की हवेली, नथमल की हवेली तथा किले के प्रासाद और बादल महल आदि ने जैसलमेर की कलात्मदाय को आज संसार भर में प्रसिद्ध कर दिया है।

जैसलमेर में चित्रकला के निर्माण, सचित्र ग्रंथों की नकल एवं प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों के संरक्षण के लिए जितना योगदान रहा है, उतना किसी अन्य स्थान का नही। जब आक्रमणकारी भारतीय स्थापत्य कला एवं पांडुलिपियों को नष्ट कर रहे थे, उस समय भारत के सुदूर मरुस्थली पश्चिमांचल में जैसलमेर का त्रिकुटाकार दुर्ग उनकी रक्षा के लिए महत्वपूर्ण स्थान समझा गया। इसलिए संभात, पारण, गुजरात, अलध्यापुर एवं राजस्थान के अन्य भागों से प्राचीन साहित्य, कला की सामग्री को किले के जैन मंदिरों के तलधरों में सुरक्षित रखा गया।

ज्ञान भंडार[संपादित करें]

जैसलमेर में लगभग सात ज्ञान भंडार हैं, जिनमें 'जिन भद्रसूरि ज्ञान भंडार' सबसे बड़ और वृद्ध सामग्री का आगार है, इसलिए इसे बड़ भंडार के नाम से पुकारते हैं। इस भंडार में लगभग ४०० से अधिक ताड़फीय ग्रंथ, लगभग २३०० हस्तलिखित कागज के ग्रंथ, अनेक चित्र पट्टिकाएँ उपलब्ध हैं।

उपर्युक्त ग्रंथों में अनेक सचित्र ग्रंथ हैं जिनके माध्यम से भारतीय चित्रकला के विकास की अनेक कड़ियाँ जोड़ी जा सकती हैं। जैन कला का यह अथाह भंडार आज भारतीय संस्कृति की अमर धरोहर है। यहाँ के जान ज्ञान भंडार में संग्रहित कतिपय प्राचीन चित्रावशेषों का अत्यधिक महत्व है। दशवैकालिक सूत्र चूर्णि एवं ओधनिर्युक्ति (१०६० ई.) जिन्हें नागपाल के वंशज आनन्द ने पाहिल नामक व्यक्ति से प्रतिलिपि कराया था, प्राचीनतम चित्रित ग्रंथ है। इन ग्रंथों में लक्ष्मी, इन्द्र, हाथी आदि की आकृतियाँ कलामय एवं दर्शनीय हैं।

जैसलमेर में खरतर गच्छी साधुओं का विशेष रूप से आवगमन रहा। उनकी चित्रकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कई धर्मग्रंथों को चित्रित ही नहीं कराया, अपितु उनके ऊपर लगनेवाली काष्ठ पट्टिकाओं को अलंकृत करवाया था। जैसलमेर भण्डार में विभिन्न चित्रों से अलंकृत कुछ पट्टिकाएँ संग्रहित हैं। इन पर की गई मानव आकृति अपने आप में पूर्ण है। इन पर किया गया रंग अपभ्रंश चित्र शैली के अनुरुप ही है।

चौहान कालीन पंचशक प्रकरणवृत्ति (११५० ई.) उपदेश प्रकरण वृत्ति (११५५ ई.), कवि रहस्य (११५९ ई.) दश वैकालिक सूत्र आदि, जिसका चित्रण पाली और अजमेर में हुआ था, जैसलमेर ज्ञान भंडार में संग्रहित है। इसी प्रकार दयाश्रम काव्य सार्दशतक प्रति, अजित शांत स्तोत्र आदि १३वीं शताब्दी के चित्रित जैन ग्रंथ भी जैन भंडार में विधमान हैं। १४वी शताब्दी के कल्प सूत्र टिप्पणक ग्रंथ में पार्श्वनाथ का घुड़सवार के रूप में चित्र, पुरुष आकृतियों के छोटे-छोटे मुकुट, पृष्ठभूमि में बादल, पेड़ों आदि के अंकन अपभ्रंश चित्रण शैली की परम्परा के कुछ भिन्न रूप में प्रदिर्शित किया गया है। जैसलमेर के एक शिलालेख के अनुसार शंकवाल खेतों ने कल्प सूत्र चित्रित करवाए थे। १५वीं. एवं १६वीं शताब्दी में जैसलमेर एक समृद्ध राज्य के रूप में उदित हुआ। अकबर के शान काल के दौरान जैसलमेर मुगलों के संपर्क में आया तथा इस काल में इसका व्यापार अफगानिस्तान, इरान से होने के कारण यहाँ पर इरान की चित्रकला का बहुत प्रभाव था।

जैन कला[संपादित करें]

जैन भण्डार में संग्रहित ग्रन्थ जैसलमेर की चित्रकथा के विकास पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डालते। परंतु उनका वहाँ होने मात्र से ही जैसलमेर नगर का देश-विदेश में बड़ महत्व है। वैसे जैसलमेर में चित्रकला की सुदृढ़ परंपरा का आभाव है। उसका स्पष्ट कारण यह है कि यहाँ पत्थर, चूने और लकड़ी की कलात्मक कटाई का अधिक प्रचलन रहा है। पत्थर पर खुदाई का काम रेखाकृत डिजाइन जिनमें सरथ तथा वृत्ताकार दोनों प्रकार की रेखाएँ प्रयुक्त होती थी, फूल पत्तीदार डिजाइन में महल और हवेलियों के अग्रभाग को इतनी पूर्णता और संपन्नता से अलंकृति किया जाता था कि वहाँ पर फिर चिड़ों के प्रर्दशन करने की आवश्यकता का अनुभवी नहीं होता था। कुछ विद्वानों का मानना है कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर आदि चित्र शैली की भाँती यहाँ भी स्वतंत्र शैली का जन्म हुआ था। किंतु किन्ही कारणों से मध्यकाल में यह चित्रकला जैसलमेर से लुप्त हो गई। चित्रकार भी जैसलमेर से पलायन कर गए थे, १९वीं शताब्दी के प्रारंभ में जैसलमेर में चित्रकाया का पुन: प्रार्दुभाव हुआ। १९वीं शताब्दी से प्राप्त चित्रों के अवलोकन करने पर हम कह सकते हैं कि चित्रकला की दृष्टि से जैसलमेर वैभवपूर्ण रहा है। ये चित्र कागज व लकड़ी की तख्तियों के अतिरिक्त दीवारों, छतों, आलों इत्यादि पर भी चित्रित किए गए हैं। जैसलमेर के राजप्रसादों, पटुवों की हवेलियों, दीवान नातमल की हवेली, सालम सिंह की हवेली तथा अन्य धनपतियों के घरों में कलात्मक भित्ति चित्र उपलब्ध है। जैन श्रवकों के पास भी चित्रों का संग्रह है। दुर्ग स्थित राजप्रसादों, विशेषकर हावप्रोल के ऊपर निर्मित रंगमहल के भित्ति चित्र बड़े आकर्षक बने हैं। यहाँ राधा-कृष्ण के प्रसाधन दृश्य, शिव परिवार, नर्तकियाँ, गणगौर, दशहरा जुलूस, परिहारिन, गौचरन, सरोवर, नायिका, फूल-पत्तियों आदि के चित्र बड़े मनमोहक हैं। पटवों की हवेली के दीवान खाने के भित्ति चित्र जिनमें हाथियों का दंगल, सुअर का शिकार, दानलीला, राग-रागिनी, युद्ध के दृश्य, विशेष उल्लेखनीय है। दीवान नाथमल की हवेली में भी चित्रकला के अच्छे नमूने प्रस्तुत हैं। यहाँ रासलीला, गोधूली बेला में गायों का घर की ओर आगमन, दही मथने का आकर्षक चित्रण हैं।

जैसलमेर के चित्रों में सामान्यत: लाल (हरिमिजीलाल), गहरा हरा और पीला, नारंगी रंगों का प्रयोग हुआ है। इन चित्रों में रंगों को अधिक महत्व न देकर भावों की सजीवता व सौन्दर्य पर बल दिया गया है। जैसलमेर के महारावल बैरीला ने चित्रकला को सदैव प्रोत्साहित किया। उसके राजदरबार में अनेक कलाकारों को प्रश्रय प्राप्त था।