जैसलमेर का इतिहास

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सँकरी गलियों वाले जैसलमेर के ऊँचे-ऊँचे भव्य आलीशान भवन और हवेलियाँ सैलानियों को मध्यकालीन राजशाही की याद दिलाती हैं। शहर इतने छोटे क्षेत्र में फैला है कि सैलानी यहाँ पैदल घूमते हुए मरुभूमि के इस सुनहरे मुकुट को निहार सकते हैं। माना जाता है कि जैसलमेर की स्थापना भाटी राजपूत, राव जैसल ने 12 वीं शताब्दी में की थी। इतिहास की दृष्टि से देखें तो जैसलमेर शहर पर खिलजी, राठौर, मुगल, तुगलक आदि ने कई बार आक्रमण किया था। इसके बावजूद जैसलमेर के शाही भवन राजपूत शैली के सच्चे द्योतक हैं। इसका इतिहास भी उतना ही रोचक है, जितना यह शहर है।

प्रागैतिहासिक काल[संपादित करें]

प्रागऐतेहासिक कालीन भू-वैज्ञानिक दृष्टि से इस प्रदेश में उपलब्ध वेलोजोइक, मेसोजोइक, एवं सोनाजाइक कालीन अवशेष इस प्रदेश की प्रागऐतेहासिक कालीन स्थिति को प्रमाणित करते हैं। ज्यूटालिक चट्टानों के अवशेष इस संपूर्ण क्षेत्र को प्राचीन काल में यहाँ समुद्र होने का प्रमाण देते हैं। यहाँ से विस्तृत मात्रा में जीवश्यों की होने वाली प्राप्ति में भी यहाँ समुद्र होने का प्रमाण मिलता है। जब यह प्रदेश सागरीय जल से मुक्त हो गया, तो यहाँ मानव ने रहना प्रारंभ किया। यद्यपि जैसलमेर क्षेत्र की मुख्य भूमि में अभी तक कोई उल्खनन कार्य नहीं हुआ है, परंतु इसके पश्चिम में मोहनजोदाड़ो व हड़प्पा, उत्तर-पूर्व में कालीबंगा व पूर्वी क्षेत्र में सरस्वती के उल्खनन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नि:सन्देह इस क्षेत्र में आदि मानव का अस्तित्व अवश्य रहा होगा।

पौराणिक इतिहास[संपादित करें]

बाल्मिकी रामायण में किष्किन्धा कांड में पश्चिम दिशा के जन पदों के वर्णन में मरु स्थली नामक जनपद की चर्चा की गई है। डॉ ए.बी. लाल के अनुसार यह वही मरु भूमि है। महाभारत के अश्वमेघिक पूर्व में वर्णन है कि भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर से जब द्वारका जा रहे थे तो उन्हें रास्ते में बालू, धूल व काँटों वाला मरुस्थल (मरुभूमि) का रेगिस्तान पड़ा था। महाभारत के वन पूर्व में इस भू-भाग को सिंधु-सौवीर कहकर सम्बोधित किया गया है। महाभारत के समापर्व के अध्याय ३२ में वर्णित है कि पाण्डु पुत्र नकुल ने अपने पश्चिम दिग्विजय में मरुभूमि, सरस्वती की घाटी, सिंध आदि प्रांत को विजित कर लिया था। मरुभूमि आधुनिक माखाड़ का ही विस्तृत क्षेत्र है।

मध्य कालीन इतिहास[संपादित करें]

पौराणिक काल की सीमा से निकल कर ऐतिहासिक काल के प्रांरभ में इस क्षेत्र को माडमड़ प्रदेश के नाम से जाना जाता था। इरान के नागेश-ए-रुस्तम नाम स्थान पर प्राप्त शिलालेख की २२वीं पंक्ति से ३०वीं पंक्ति में दिए विभिन्न प्रदेशों के नामों से ज्ञात होता है। इस लेख के अनुसार ये प्रदेश ५२२-४८६ बी.सी. में परसियन शासक जेरियास के अधिकार क्षेत्र में था। इसके उपरांत शक संवत ७२ (१५० ई.) के रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में इस भू-भाग को "मरु" सम्बोधित करते हुए सिंधु-सौवीर के साथ प्रयुक्त किया गया है। इस प्रदेश के लिए माड़ शब्द का प्रयोग हमें पुन: प्रतिहार शासक कक्कुट के घटियाला अभिलेख से प्राप्त होता है। इसमें इसे त्रवणी तथा वल्ल के साथ प्रयोग किया गया है "येन प्राप्ता महख्याति स्रवर्ण्यो वल्ल माड़ ये"। इस लेख में वल्ल तथा माड़ को समास के रूप में प्रयोग किए जाने से तात्पर्य निकलता है कि वल्ल तथा माड़ समीपवर्ती राज्य रहे होंगे। माड़ प्रदेश उस समय भारत का समीपवर्ती राज्य था, इसका उल्लेख "अलविलाजूरी" के विवरण से प्राप्त है, जिसमें इस प्रदेश को अरब राज्य की सीमा पर स्थित होना बताया गया है। अल-विला जूरी ने उल्लेख किया है कि जुनैद ने अपने अधिकारियों को माड़मड़ मंडल, बरुस, दानत्र तथा अन्य स्थानों पर भेजा था व जुर्ज पर विजय प्राप्त की थी। यहाँ पर माड़माउड का प्रयोग मरु प्रदेश माड़ व मंड मंडल (मारवाड़) के लिए किया गया है ये दोनों प्रदेश एक दूसरे के सीमांत प्रदेश हैं। जैसलमेर क्षेत्र का कुछ भाग त्रवेणी क्षेत्र का हिस्सा भी रहा है जिसका उल्लेख प्रतिहार बाऊक के जोधपुर अभिलेख से प्राप्त होता है। इन विवरणों से यह पता चलता है कि मरुमंडल के प्रतिहारों की राज्य सीमाओं पर वल्ल, माड़ एवं स्वेणी प्रदेश स्थित थे। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि मरुमंडल के पश्चिम में माड़ प्रदेश का जो कालान्तर में जैसलमेर क्षेत्र कहलाया। माड़ प्रदेश के पश्चिम-उत्तर में सौवीर प्रदेश था तथा दक्षिण-पूर्व में त्रवेणी और वल्ल प्रदेश था। इन सभी प्रदेशों की सीमाएँ राजनितिक दृष्टिकोण के कारण घटते-बढ़ते रहती थी। प्रतिहारों के चरमोत्कर्ष काल (७००-९०० ई.) में यह सारा प्रदेश जिसमें माड़ ही था, उनके सम्राज्य का अंग था। कालातंर में जब प्रतिहारों की शक्ति क्रमश: क्षीण हो ही गई तथा इस क्षेत्र में विभिन्न क्षत्रिय व स्थानीय जातियों जिनमें भूटा-लंगा, पुंवार, मोहिल आदि प्रमुख थे ने छोटे-छोटे क्षेत्रों पर अपना अधिकार जमा लिया। सातवीं सदी के आरंभ काल में इस क्षेत्र में पश्चिमोत्तर दिशा से भाटी जाति का आगमन प्रांरभ हुआ एवं इस जाति ने स्थानीय जातियों से संघर्ष कर धीरे-धीरे समूचे क्षेत्र को अपने अधिकार में करके भाटी राज्य की स्थापना की। यही भाटी राज्य कालांतर में जैसलमेर राज्य के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]