जैक प्रेगेर

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जैक प्रेगेर (जन्म 25 जुलाई 1930 को मैन्चेस्टर, इंग्लैंड के एक यहूदी परिवार में हुआ) एक ब्रिटिश डॉक्टर हैं जो चिकित्सा उपचार के साथ-साथ पेशेवर प्रशिक्षण सुविधा भारत के शहर कोलकाता और पश्चिमी बंगाल की गरीब जनता को 1972 से प्रदान करते आ रहे हैं। इसी लक्ष्य के तहत उन्होंने कोलकाता रेस्क्यू नामक संस्था भी बनाई है।

डॉ० जैक प्रेगेर जिन्होंने कोलकाता रेस्क्यू की स्थापना की थी

जैक ने छोटी-सी उम्र में न्याय का अर्थ समझ लिया था जब बालक अवस्था में उन्होंने अपनी फ़्रांस में जन्मी मौसी को हिटलर की सेना के हाथों जान गवाँते देखा था।

जैक ने सेंट एडमंड हॉल, ऑक्स्फ़ोर्ड से स्नतक की शिक्षा पूरी की। यहीं से स्नातकोत्तर में अन्होंने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र पढ़े। इसके पश्चात कुछ वर्षों के लिए वह वेल्स में किसान के रूप में काम करते रहे। फिर उन्होंने अपने खेत को बेचकर डॉक्टर बनने का निर्णय लिया।[1] 1965 में उन्हें डबलिन के रॉयल कॉलेज ऑफ़ सरजिन्स में प्रवेश मिला। उस समय उनकी आयु 35 वर्ष की थी।[2]

बांग्लादेश में कार्य[संपादित करें]

1972 में जैक ने अपनी इंटर्नशिप समाप्त करके दक्षिण या केन्द्रीय अमरीका के सेवा में अपने जीवन को लगाने का निर्णय लिया। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वह स्पैनिश भाषा भी सीखने लगे थे। तभी उन्हें रेडियो पर नवीनतम स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश में सहायता के लिए डॉक्टरों की आवश्यकता की सूचना मियली। वह तुरंत ही ढाका रवाना हुए।,[3]

यहाँ जैक प्रेगेर ने बहुत ही खराब हलतों में शरणार्थी शिविरों में उन लोगों के लिए काम कर रहे थे जो मूल रूप से उर्दू बोलते थे और पाकिस्तान लौटने के इच्छुक थे। जैक ने उर्दू और बंगाली सीखी। 1975 में जैक ने 90 पलंगों वाला क्लिनिक ढाका खोले और शहर के बाहरी भाग में दो खेत बनवाए। [4]

ढाका में जैक के कार्यों पर अचानक ही अंकुश लग गया जब उन्हें पता चला कि एक गैर-सरकारी डच संस्था तेर दे हॉम्स वहाँ पर बच्चों की तस्करी का जाल बिछा चुकी है। जैक ने इस मामले का परदा फ़ाश किया हालांकि वहाँ की सरकार ऐसा नहीं चाहती थी। जैक को देश से निकालकर 1979 में बैंकॉक भेज दिया। [1]

कोलकाता में कार्य[संपादित करें]

बांग्लादेश से निकाले जाने के पश्चात, जैक भारत आए और कोलकाता में छः महीने तक मदर टेरेसा की मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी के लिए काम किया। मदर टेरेसा ने जैक की सेवाओं को सराहते हुए कहा कि:

मैंने जैक के कार्य को बांग्लादेश में देखा है और पाया कि वह विशेष रूप से जनता और बच्चों के हित में है। मैं आशा करती हूँ कि वह वैसी ही सेवा कोलकाता के गरीब लोगों के लिए भी करेंगे।

इसके बावजूद जैक ने सोचा कि वह और भी अधिक प्रयास कर सकेंगे यदि उन्होंने अलग से कोशिश शुरू करें। इन्ही प्रयासों के अंतरगत उन्होंने हावड़ा ब्रिज के नीचे गरीबों के लिए एक क्लिनिक खोला। [1] उन्होंने एक कार्य अनुमति (work permit) की याचिका प्रस्तुत की जिसे आखिरकार नहीं दिया गया।[3]

आज, कोलकाता रेस्क्यू तीन क्लिनिक, तो स्कोल और दो पेशेवर प्रशिक्षण केन्द्र चलाती है। इसके लिए 150 स्थानीय तौर भर्ती लोग कार्यरत हैं। [5] जैक का एक और बहुचर्चित कार्य एड्स से पीड़ित व्यक्तियों के उपचार के लिए किए जाने वाले प्रयास हैं। [6] जैक के महान कार्यों को देखते हुए कई देशों में समर्थन समूह बन गए हैं। इसका मुख्य कारण विदेशी पर्यटक हैं जो भारत में जैक के स्वार्थरहित कार्यों के गवाह भी थे। यह पर्यटक इंग्लैंड, स्विटज़रलैंड, फ़्रान्स, जर्मनी, नॉरवे, नीदरलैंड, कैनडा और अमरीका से सम्बंधित हैं।

सरकार द्वारा हस्तक्षेप[संपादित करें]

1980 में पश्चिम बंगाल सरकार की विदेशियों के पंजीकरण कार्यालय (Foreigners' Registration Office- FRO) ने उल्लेख किया कि प्रेगेर ने एक मिशनरी संस्था से दान लिया जो अमरीका में स्थित थी। इसी को देखते हुए कार्यालय ने माँग कि जैक डॉक्टर होने के साथ-साथ एक मिशनरी कार्यकर्ता है। जैक इस मामले को तभी सुलझा सका जब वह दिल्ली के अधिकारियों को समझाया कि वह मिशनरी कार्यकर्ता नहीं है और कोलकाता रेस्क्यू पूर्णतः धर्म निरपेक्ष है।

जैक ने कोलकाता रेस्क्यू को 1991 में एक चैरिटी के रूप में पंजीकृत करवाया। उन्होंने कोलकाता में दो और क्लीनिक शुरू किए। उन्हें दान आठ यूरोपीय देशों से प्राप्त हुई। उन्हें भारत में निवास की अनुमति (resident's permit) भी प्राप्त हुई। [3] परन्तु सरकार ने उन्हें विदेशी दान स्वीकार करने के लिए आवश्यक मंजूरी प्रदान करने के लिए मना कर दिया था। जैक ने कोलकाता की अदालतों में सरकार पर मुकदमा दायर किया। आखिरकार अदालतों सरकार की अस्वीकृति को ठुकराया। जैक को दान के रूप में हर माह 15 लाख रुपिये स्वीकार करने के लिए अनुमति दी गई थी।

1999 से जैक को पुनः-प्रवेश वीज़ा (re-entry visa) विदेशियों के पंजीकरण कार्यालय (Foreigners' Registration Office- FRO) से भारत छोड़ने से पूर्व प्राप्त करना आवश्यक है, इसके लिए कारण चाहे कुछ भी हों। इनमें से अधिकांश याचिकाओं के सम्पन्न होने के लिए न्याय प्रणालि का सहारा लेना आवश्यक था। उसी वर्ष 23 फ़रवरी को विदेशियों के पंजीकरण कार्यालय ने जैक को सात दिनों के भीतर भारत छोड़ने का आदेश दिया था। उस समय कोलकाता उच्च न्यायालय ने तेजी से उन्हें एक वापसी का वीजा देने के लिए सरकार को आदेश देते हुए हस्तक्षेप किया। [1][4]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "What did Dr Preger do in Bangladesh?". रीडिफ. 15 मार्च 1999. अभिगमन तिथि 1 नवम्बर 2006.
  2. "Preger, Dr Jack". अभिगमन तिथि 1 नवम्बर 2006.
  3. "Dr Jack Preger, MBE". अभिगमन तिथि 1 नवम्बर 2006.
  4. Pritish Nandy (12 मई 1999). "The Story of Jack Preger". रीडिफ. अभिगमन तिथि 1 नवम्बर 2006.
  5. "TB Alert: Our work—Calcutta Rescue". अभिगमन तिथि 1 नवम्बर 2006.
  6. IANS (12 सितंबर 2006). "A British doctor is god to AIDS sufferers in Kolkata". Yahoo! News India. अभिगमन तिथि 1 नवम्बर 2006.[मृत कड़ियाँ]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]